जब टूटा युधिष्ठिर का घमंड- युधिष्ठिर और नेवले की कहानी

युधिष्ठिर और नेवले की कहानी- घमंड अहंकार ये ऐसा शब्द है जिसके वश मे होने के बाद अच्छे से अच्छा आदमी भले ही वो कितना भी बुद्धिमान ही क्यों न हो उसकी मति उसका साथ नहीं देती है। इसी संबंध मे आज हम कहानी सुनेंगे युधिष्ठिर और नेवेले की कहानी। जिससे हम जानेंगे कि जब युधिष्ठिर को अभिमान ने अपने वश मे किया तो किस प्रकार से श्री कृष्ण ने अपने लीला के जरिये एक नेवेले के द्वारा उनके अभिमान का नाश किया। और सीख भी दी कि दान, तप, भक्ति इत्यादि का महत्व तभी तक होता है जब तक हम पूरे सच्चे मन से उसका आह्वान करते है। यदि तनिक भी हमारे मन मे छल कपट या मान का भाव आता है तो इन अच्छे कर्मो का कोई महत्व नहीं रहता है।

बात उस समय की है जब महाभारत का युद्ध समाप्त हो चुका था और पांडवों को कौरवों पर विजय प्राप्त हो चुका था। युधिष्ठिर का राज्याभिषेक हो चुका था और युधिष्ठिर ने अपने राज्य के विस्तार और गरिमा को बढ़ाने हेतु अश्वमेघ यज्ञ का आयोजन किया। और उसके जरिये धर्म कर्म दान पुण्य भी बहुत ही खुलकर किया। जीतने भी राज्य के निवासी थे, ब्राह्मण, ऋषि मुनियों इतड़ी के लिए भोज का आयोजन किया। सभी जनो को भोज के जरिये तृप्त किया किसी को भी किसी प्रकार के दान इत्यादि से कमी नहीं रहने दी। संपृर्ण आयोजन मे किसी भी प्रकार की कमी नहीं देखि जा सकती थी।

सम्पूर्ण आयोजन को देखकर युधिष्ठिर के मन मे अभिमान का भाव आ गया। और मन मे कई विचार आने लगे। उन्हे लगा उन्होने ऐसे आयोजन का आह्वान किया जिससे हर कोई तृप्त है। उनके जैसा आयोजन कोई भी नहीं कर सकता है। युधिष्ठिर के इन विचारो का एहसास श्री कृष्ण को हो गया और उन्होने युधिष्ठिर के अभिमान का नाश करने हेतु एक लीला किया।

जब सभी लोग भोज करके जाने लगे। तो भंडार मंडप मे एक नेवला आया। नेवला बहुत ही अजीब था उसका आधा शरीर सोने का था और आधा शरीर सामान्य था। वो पूरे भंडार क्षेत्र मे घूम घूम कर सभी पत्तलों से एके एक दाने चुन रहा था। और फिर दूसरे पत्तल की ओर बढ़ जाता है। इस पर सभी को आश्चर्य हुआ कि आखिर नेवला कर क्या रहा है। युधिष्ठिर ने जिज्ञासा वश स्वयं श्री कृष्ण से पूछा कि केशव ये नेवला आखिर कर क्या रहा है। इस पर श्री कृष्ण ने बोला धर्मराज तुम स्वयं ही उस नेवले से क्यों नहीं पूछ लेते हो।

इस पर अपनी जिज्ञासा की पूर्ति हेतु उस नेवले से पुच्छ लिया कि वो आखिर क्या कर रहा है। तो उस नेवेले ने जवाब दिया कि हे युधिष्ठिर मई उस अन्न को ढूंढ रहा हूँ जिससे मेरा आधा शरीर जो कि सोने का नहीं है वो भी सोने का हो जाये। इस पर युधिष्ठिर और बाकी भाइयो ने पुच्छा कि आप विस्तार से बताओं ऐसा कौन सा अन्न है जिससे आपका शरीर सोने का हो जाएगा। इस पर नेवेले ने कहा कि एक समय की बात है मेरा पूरा शरीर तब सामान्य था लेकिन मैंने ऐसा शुभ अन्न का भोग किया जिससे मेरा आधा शरीर सोने का हो गया। इसका प्रसंग इस प्रकार से है।

एक समय की बात है। एक ग्राम मे एक दरिद्र ब्राह्मण रहता था। उसके साथ उसकी पत्नी उसका पुत्र और पुत्रवधू रहती थी। ब्राह्मण बहुत ही धर्मात्मा व्यक्ति था। अपने द्वार से कभी भी किसी भिक्षुक अथवा अतिथि को बिना सत्कार किए नहीं जाने देता था। एक बार की बात है उसके राज्य मे बहुत बड़ा अकाल पड़ा और अभी लोगो को दो जून का अन्न भी नसीब नहीं हो रहा था। ब्राह्मण का परिवार भी करीब 6 दिन से एक अन्न का दना नहीं खाया हुआ था। किसी तरह उन्होने कुच्छ भोजन की व्यवस्था की और जैसे ही खाने के लिए बैठे उनके द्वार आर एक भिक्षुक आ गया। उसने उनसे कहा कि तुम तो किसी भी भिक्षुक को अपने द्वार से खाली नहीं भेजते हो। मै कई दिनों से भूखा हूँ बहुत आशा के साथ तुम्हारे द्वार पर आया हूँ। मुझे भोजन दो।

उस ब्राह्मण ने निःसंकोच अपने हिस्से का भोजन उस भूखे भिक्षुक को दे दिया। उसे खाने के बाद भी वो भिक्षुक तृप्त नहीं हुआ। और उसने और भोजन की मांग की इस पर उस ब्राह्मण की पत्नी ने भी अपना भोजन उस आगंतुक को दे दिया। इसे खाने पर भी उसे तृप्ति नहीं हुई और उसने और भोजन की मांग की। इस पर ब्राह्मण के बेटे और उसकी पत्नी ने भी एक एक कर अपना भोजन उस आगंतुक को दे दिया। इस प्रकार से सभी सदस्यों ने अपना पेट न भरकर अपने हिस्से का भोजन उस भूखे भिक्षुक को दे दिया।

भोजन समाप्त करने के बाद उस भोखे भिक्षुक ने अपना असली स्वरूप दिखाया वो स्वयं धर्मराज थे। जो उस ब्राह्मण की धर्मात्मा होने की परीक्षा लेने आए थे। और उन्होने बोला कि हे ब्राह्मण श्रेष्ठ आप के सत्कार से मै प्रसन्न हुआ और आपके इस सेवा भाव से मुझे इतनी प्रसन्नता हुई कि मै आप को ब्रह्मलोक का निवास वरदान स्वरूप प्रदान करता हूँ। और उनके अंतर्ध्यान होने के बाद मैंने उनके पत्तल के बचे भोजन को जैसे ही ग्रहण किया मेरा आधा शरीर सोने का हो गया। यहाँ आपके यज्ञ के बारे मे सुनकर मै यहाँ इसी उद्द्येश्य से आया था कि ये भोज भी ऐसा धर्म भोज होगा जिसके खाने से मेरा बचा शरीर भी सोने का हो जाएगा लेकिन मै गलत था। यहा का भोजन ग्रहना करने से मेरे शरीर पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा। और इतना कहकर नेवला गायब हो गया।

इस सारे वाकये के उपरांत युधिष्ठिर को अपनी गलती का एहसास हुआ और उन्होने केशव से बोला हे प्रभु मुझमे अहंकार का भाव विद्यमान हो गया था। और मेरे अहंकार का नाश करने हेतु ही आपने मुझे ये लीला दिखाई। कृपा करके मुझे क्षमा करे। मै भूल गया था कि कोई भी यज्ञ, पूजन, भोज इत्यादि तब तक धर्म अनुसार नहीं माना जाएगा जब तक उसमे सत्य, श्रद्धा इत्यादि का भाव न हो। और अहंकार इत्यादि के उत्पन्न होने से ऐसी कोई भी विशाल भोज या आयोजन किसी काम का नहीं है। मुझे अपने गलती का एहसास हो गया है।

निष्कर्ष- 

उपरोक्त प्रसंग मे ईश्वर ने पांडवों के अभिमान का नाश किया और साथ ही साथ हमे सीख प्रदान की कि कोई भी आयोजन या यज्ञ इत्यादि या फिर कोई भी धार्मिक कृत्य तभी ईश्वर द्वारा ग्रहण किया जाता है। जब उसमे सच्ची श्रद्धा, समर्पण, और निष्ठा इत्यादि जैसे भाव विद्यमान रहते है। हम भले ही कितने विशाल भंडारे या भोज इत्यादि का आयोजन करले लेकिन यदि तनिक भी हमारे मन मे अहंकार या किसी प्रकार के कुरीति का भाव आता है तो वो आयोजन असफल ही माना जाएगा।

||इति शुभम्य||

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