योग से योगा: दार्शनिक युग से आधुनिक युग तक की यात्रा

योग से योगा: दार्शनिक युग से आधुनिक युग तक की यात्रा- योग भारतीय संस्कृति की प्राचीनतम विधाओं में से एक है। भारतीय आस्तिक षड्दर्शन में योग का बहुत ही महत्वपूर्ण है। योग दर्शन का विचार महर्षि पतंजलि द्वारा प्रतिपादित किया गया है। योग दर्शन का मूल उद्द्येश्य भौतिक जगत में रहते हुए अलौकिक जगत का अनुभव करना है द्वितीय हमारी आत्मा को उस परमात्मा का साक्षात्कार कराना है। लेकिन अगर देखा जाये तो प्राचीन काल के योग दर्शन का रूप आज के योगा में परिवर्तित हो चुका है। और इस परिवर्तन में केवल नाम ही नहीं बल्कि इसका उद्द्येश्य और परिचय भी बादल गया है। इस लेख के द्वारा हम यही बताने का प्रयास करेंगे कि किस प्रकार दार्शनिक योग क्रिया और वर्तमान योगा की क्रिया और शैली में क्या अंतर है।

पातंजल्य कृत योग दर्शन की अवधारणा

हम योग को तब तक नहीं समझ सकते जब तक हम महर्षि पतंजलि कृत योग दर्शन को न समझें। योग का शाब्दिक अर्थ देखा जाये तो इसका अर्थ जुडने से है। योग का उद्द्येश्य आत्मा का उस परमात्मा से जुड़ाव या उसमें जुड़ जाने से है। और इस के लिए सर्व प्रथम साक्षात्कार होना आवश्यक है। इसलिए योग की सम्पूर्ण क्रिया एक प्रक्रिया के अधीन है। जिसके लिए पातंजल्य कृत योग दर्शन में अष्टांग योग का वर्णन किया गया है। जैसा की नाम से ही विदित होता है अष्टांग योग, योग के आठ अंगो को इंगित करता है। यही आठ अंग ही योग को निम्न स्तर से उच्चतम स्तर की ओर ले जाते है। इन आठ अंगों में ही सम्पूर्ण योग दर्शन समाहित है। तो आइये जानते है योग दर्शन के आठ अंगो को।

1. यम- मनुष्य एक समजाजीक प्राणी है। तथा जब तक हमारा जीवन है तब तक हमें किसी विधि के तहत ही समाज में रहना होता है। यम से तात्पर्य उन विधियों से है, जिसके अनुशरण द्वारा ही हम योग दर्शन की प्रथम सीढ़ी की ओर अग्रसर हो सकते है। जिस प्रकार जब हम किसी संस्था से जुडते है तो उस संस्था में जुडने हेतु हममे कुछ प्राथमिक सिद्धांतों का पालन करना होता है। उसी प्रकार योग दर्शन के लक्ष्य को प्राप्त करने हेतु भी हमे कुछ सिद्धांतो को पालन करना होता है। यम उन सिद्धांतो की प्रथम श्रेणी है। जिसके पाँच तत्व है। जिंका विवरण इस प्रकार से है।

i. सत्य- प्रथम यम सिद्धान्त है सत्य। हमे अपने सम्पूर्ण जीवन में सत्य का पालन करना चाहिए। चाहे कोई भी परिस्थिति हो सत्य का साथ हमें नहीं छोडना चाहिए। सत्य उस परमात्मा का पर्यायवाची है। ईश्वर ही पूर्ण सत्य माना गया है और सत्य के अनुसरण द्वारा ही हम उस परमात्मा का साक्षात्कार कर सकते है। सत्य का कोई अन्य पर्याय नहीं हो सकता है। और न ही कोई विकल्प। किसी भी देश काल एवं परिस्थिति में सत्य के अलावा अन्य किसी उक्ति का कोई स्थान नहीं। सत्य ही किसी विषय वस्तु का सम्पूर्ण रूप दिखा सकता है। अतः जब तक हम सत्य का अनुसरण नहीं करेंगे तब तक किसी भी विषय का सही स्वरूप नहीं जान सकते। और अगर परमात्मा साक्षात्कार करना है तो सत्य का अनुसरण सत्य को आत्मसात करना अति आवश्यक है।

ii. अहिंसा- हिन्दी व्याकरण में जब भी किसी शब्द के आगे अ वर्ण का प्रयोग किया जाता है। तो उसका अर्थ मूल शब्द का एकदम विपरीत हो जाता है। अहिंसा शब्द भी हिंसा शब्द के आगे अ वर्ण लगाकर बना है। हिंसा न करने के प्रवृत्ति को ही अहिंसा के रूप में देखा जाता है। हिंसा हमे उस मार्ग की ओर प्रसस्त करता है जिससे हमारे मनस पर हमारा कोई भी अधिकार नहीं रह जाता है। हिंसा किसी भी रूप में या किसी भी परिपेक्ष्य में मान्य नहीं है। अगर हिंसा का भाव हमारे मन में है तो इसका अर्थ है हममे कहीं न कहीं काम, क्रोध इत्यादि अशुद्ध अवययो की भी उपस्थित है। अगर हम परमात्मा की शक्ति को मानते है तो ये भी हमे मानना पड़ेगा की इस सृष्टि में व्याप्त सभी जीव उस परमात्मा का ही अंश है। अतः हिंसा का अनुसरण करते हुए हम किसी भी रूप में योग दर्शन द्वारा प्रतिपादित योग के मूल उद्द्येश्य की प्राप्ति नहीं कर सकते है।

iii. ब्रह्मचर्य-ब्रह्म शब्द के कई अर्थ होते है ब्रह्म से तात्पर्य पूर्ण सत्ता से है। और पूर्ण से ही व्यक्त होता है ऐसी सत्ता जिसके बगैर किसी विषय वस्तु की कल्पना करना ही व्यर्थ है। और उस ब्रह्म के द्वारा प्रसस्त आचरण का अनुसरण करना ही ब्रह्मचर्य है। ब्रह्म का एक अर्थ उस जीव से है जिसमे किसी भी प्रकार का व्यभिचार व्याप्त न हो। उसका आत्म और मनस संतुलित हो। संयमित जीवन के लिए एक मनुष्य में पाँच तत्वो पर संयम होना अति आवश्यक है और इन्ही पाँच तत्वों, विषय वस्तुओं प र संतुलन बना कर रखना ही ब्रह्मचर्य है। ये पाँच तत्व है। काम, क्रोध, लोभ, मोह और माया। अगर मनुष्य अपने जीवन में इन पाँच विषयों को सीमित करके रखता है। तथा इन पाँच विषयों के वश में नहीं रहता है तो वह ब्रह्मचर्य के मार्ग पर प्रसस्त होता है।

iv. अस्तेय- अस्तेय का शाब्दिक अर्थ चोरी न करने से है। मनुष्य को चोरी की प्रवृत्ति से हमेसा दूर रहना चाहिए चोरी एक ऐसी प्रवृत्ति है जो हमारी इच्छाओं को बड़वा देती है। किसी अन्य के वस्तु या विषय को पाने की चाह और न मिलने की उपस्थित में बिना किसी के संज्ञान में आए उस विषय वस्तु को ले लेना ही चोरी है। चोरी की प्रवृत्ति हमें लोभ के भाव और दूसरों के प्रति ईर्ष्या के भाव को बढ़ावा देता है। चोरी की प्रवृत्ति हमारे मनस और आत्म को अशुद्ध बनाता है। हमे इस प्रवृत्ति से दूर रहना चाहिए। तभी हम अपने मनस में शुद्धता बना कर रख पाएंगे। जो हमे परमात्म साक्षात्कार मे सहयोग करेगी।

v. अपरिग्रह- अपरिग्रह संग्रह न करने की प्रवृत्ति को आदेशित करता है। संग्रह करना चाहे वो किसी चीज का भी हाओ वो पूरी तरह से अमान्य है। संग्रह की प्रवृत्ति हमसे कहीं न कहीं संतुष्टि को समाप्त करता है। और जब तक संतुष्टि की प्रवृत्ति नहीं होगी विषयों के प्रति आसक्ति से ही हम मुक्त नही हो पाएंगे। और इस आसक्ति से मुक्त नहीं होंगे तब तक उस परमात्मा में सच्ची आसक्ति को जन्म नहीं दे पाएंगे। मनुष्य को उतने से ही संतुष्ट होना चाहिए जितने की उसे आवश्यकता हो। लेकिन ये भी नहीं कि अपनी आवश्यकताओं पर काबू न किया जाये। अपनी आवश्यकताओं पर अंकुश रखना भी कहीं न कहीं अपरिग्रह की प्रवृत्ति की ओर अग्रसर करता है।

2. नियम- नियम योग के आठ अंगो में से द्वितीय प्रमुख अंग है। यम और नियम में देखा जाये तो दोनों पारिभाषिक रूप से एक ही है। दोनों का अर्थ है योग सूत्र को धारण करने के लिए प्रतिपादित विधियों का पालन करना है। लेकिन दोनों का अर्थ दो विशेष कार्यक्षेत्रों से संबन्धित है। जहां यम में प्रतिपादित नियम हमें समाज में रहने लायक बनाते है वही नियम हमें हमारे शारीरिक और मानसिक जीवन को शुद्ध करने लिए विधि प्रस्तुत करता है। नियम के भी पाँच तत्व होते है। और इन्ही पाँच तत्वों के आधार हम अपने मनस और शरीर को योग सूत्र के मार्ग पर चलने लायक बनाते है जो इस प्रकार से है।

i. शौच- शौच शब्द सुनते ही लोग शारीरिक शुद्धि से इतना तात्पर्य रखते है। लेकिन योग सूत्र के अनुसार शारीरिक शुद्धि के साथ साथ मानसिक शुद्धि, शौच शब्द की सिद्धि के लिए अति आवश्यक है। जिस प्रकार स्नान इत्यादि के द्वारा अपने शरीर को शुद्ध करते है। उसी प्रकार हमारे आत्म और मनस को भी शुद्ध रखना अति आवश्यक है। और इसके लिए हमें शुद्ध चिंतन, आचरण और शुद्ध व्यवहार कि आवश्यकता होती है। जब हम शारीरिक और मानसिक दोनों तरह से शुद्ध हो जाएँगे तभी योग सूत्र की क्रियाओं की तरफ अग्रसर हो सकते है।

ii. संतोष- संतोष का प्राय संतुष्टि से है। हमे हमारी क्षमता और सामर्थ्य से ही प्राप्त चीजों में संतुष्टि का एहसास होना चाहिए तथा अपना सम्पूर्ण जीवन उन्ही संसाधनो पर निर्वाह करना चाहिए। हमे न तो दूसरो की वस्तुओं के प्रति आसक्ति होना चाहिए और न ही दूसरे के पास उपलब्ध विषयों से ईर्ष्या या असंतुष्टि की भावना रखनी चाहिए। संतोष ही वह हथियार है जिससे हम अपने मन, आत्मा और शरीर को संयमित रख सकते है एवं योग सूत्र के मार्ग की ओर अग्रसर हो सकते है।

iii. तप- तप से तात्पर्य उस क्रिया से है जिससे हम समस्त व्याधियों को सहने कि शक्ति रखते हों। हम किसी भी परिवेश में रहे, या फिर किसी भी देश काल परिस्थिति में हो हमे संयम के साथ उस माहौल या देश काल परिस्थिति में निर्वाह करना चाहिए तथा उनसे विचलित नहीं होना चाहिए। तप के द्वारा ही हम अपने मन होने वाले विचलन को रोक सकते है। और योग सूत्र के लिए अति आवश्यक तत्व संयम को धारण कर सकते है तथा तप ही हमे समस्त प्रकार के विचलन से दूर रख सकती है।

iv. स्वाध्याय- सीखने की स्थिति और स्वयं के द्वारा अध्ययन की प्रवृत्ति को ही स्वाध्याय के रूप में देखा जा सकता है। योग सूत्र के अनुसार स्वाध्याय, भौतिक और अलौकिक विधाओं का ज्ञान प्राप्त करने को कहा गया है। अगर हमें किसी मार्ग कि ओर अग्रसर होना है या फिर उस क्षेत्र में सफलता पाना है तो उस मार्ग का ज्ञान और लक्ष्य का ज्ञान होना अति आवश्यक है। इसी प्रकार योग सूत्र के अनुसार परमात्म साक्षात्कार और आत्म के परमात्म से मिलन हेतु हमें स्वाध्याय का अनुसरण करना अति आवश्यक है।

v. ईश्वर प्राणिधान- जब भी हम किसी व्यक्ति विशेष के प्रति आसक्ति या आदर रखते है तो उनके बताए आदर्शों बातों का हम अनुसरण करते है। और उनके बताए निर्देशों का पालन करते है। ईश्वर प्रणिधान से तात्पर्य ईश्वर के प्रति श्रद्धा रखते हुए उसके बताए मार्ग का अनुसरण करना तथा उसकी बनयी विधि विधानों के अनुसार जीवन यापन करने से है। चूंकि योग सूत्र का लक्ष्य परमात्मा से मिलन या उसके साक्षात्कार से है तो हमे उनके बताए मार्ग और विधियों का अनुसरण करना अति आवश्यक होगा।

3 एवं 4 आसन और प्राणायाम- योग सूत्र का तृतीय और चतुर्थ अंग शारीरिक और मानसिक स्वस्थता से है। अगर हम मानसिक और शारीरिक रूप से स्वस्थ रहेंगे तभी हम योग सूत्र वर्णित लक्ष्य को प्राप्त कर सकते है। और जिसके लिए महर्षि पतंजलि ने दो सूत्र आसान और प्राणायाम के रूप में दिया है। आसन जहां हमें शारीरिक रूप से स्वस्थ रखे हेतु आवश्यक है वही प्राणायाम हमें मानसिक एकाग्रता प्रदान करता है। जिसके कारण हम मानसिक रूप से स्वस्थ होते है। वर्तमान समय में जो योगा का प्रारूप हमें देखने को मिलता है वो केवल आसन तक ही सीमित रह गया है। योग दर्शन में वर्णित जिन मुद्राओं को हम धारण करते है वो आसान के ही अंग होते है। और अपने स्वांस के जरिये जो हम अपने ऊपर ध्यान हेतु नियंत्रण प्राप्त करते है उसे प्राणायाम के द्वारा प्राप्त किया जाता है।

5. प्रत्याहार- मनुष्य का मन चंचल प्रवृत्ति का होता है। और हमारे शरीर की पाँच इंद्रियाँ ही इस चंचलता का कारण होती है। प्रत्याहार का उद्द्येश्य इंद्रियों पर काबू रख कर मन को चंचलता से बचाया जा सकता है। हमारी शरीर कि इंद्रियाँ हमें स्वाद, स्पर्श, सुगंध, श्रवण और दृश्य के द्वारा हमे संसार का अनुभव कराती है लेकिन जब इन इंद्रियों पर हमारा काबू नहीं रह जाता है। तो इस संसार के विषयो की आसक्ति में फँसकर हम संसार के माया जाल में फंस जाते है और ईश्वर साक्षात्कार से विमुख हो जाते है। इसलिए प्रत्याहार के जरिये हम अपने इंद्रियों पर काबू रखते है और विषय आसक्ति से दूर रहने का प्रयास करते है।

6. धारणा- धारणा का मूल उद्द्येश्य केन्द्रित होना है। जब भी हम किसी विषय वस्तु को अनुभव करना चाहते है तो हमे अपने मन और मस्तिष्क तथा अपने शरीर को एक स्थान पर केन्द्रित करना होता है। धारणा के जरिये हमें अपने शरीर और मस्तिष्क को एक स्थान पर केन्द्रित करना होता है जिससे योग सूत्र में वर्णित ध्यान और समाधि की प्रक्रिया की ओर अग्रसर हो सके।

7 एवं 8 ध्यान एवं समाधि- महर्षि पतंजलि कृत योग सूत्र में अंतिम दो चरण ध्यान और समाधि है। बोल चाल की भाषा में कहे तो पहले 6 चरण तैयारी मात्र है। परमात्मा और आत्मा के मिलन की और ईश्वर साक्षात्कार की। और सप्तम और अष्टम चरण में हम क्रमशः मार्ग पर चलने और लक्ष्य पर पहुँचने ही अवस्था को प्राप्त करते है। ध्यान के जरिये हम ईश्वर को ढूँढने की क्रिया करते है एवं जब हम समाधि की ओर पहुँच जाते हैं तो परमात्म साक्षात्कार हो जाता है और हमारी आत्मा का कोई इतर अस्तित्व नहीं रह जाता और हम उस परमात्मा में समाहित हो जाते है।

निष्कर्ष

उपरोक्त विवरणों से हम जान सकते है की प्राचीन काल में योग कि परिभाषा और उसका परिपाटी कैसी होती थी। और अब अगर आज के योगा की बात की जाये तो, आज के समय का योगा प्राचीनतम योग के सामने नगण्य है। आज के समय में योगा केवल शारीरिक व्यायाम तक ही सीमित रह गया है। और इसको केवल कुछ मुद्राओं के जरिये अपने शरीर को स्वस्थ रखने हेतु प्रयोग किया जाता है। जबकि प्राचीनतम योग सूत्र हमे आत्म ज्ञान जीवन के अलौकिक लक्ष्य का अनुभव करता है। जिसका विस्तार आज के योगा की तुलना में बहुत ही अधिक है। योग को जिस तरह से आज के समय में उसकी परिभाषा और शैली बदली गई है वो हमारे लिए बिलकुल भी उचित नहीं है। और हमारे जीवन को केवल भौतिक रूप तक ही सीमित रखता है। अतः आज फिर से हमे उस प्राचीनतम दार्शनिक योग सूत्र को पुनः आत्मसात और समझने कि आवश्यकता है।

||इति शुभम्य||

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