यात्रा (अथातो घुमक्कड़ जिज्ञासा): दार्शनिक प्रासंगिकता

यात्रा (अथातो घुमक्कड़ जिज्ञासा): दार्शनिक प्रासंगिकता

उपरोक्त शीर्षक में दी गई लाइन अथातो घुमक्कड़ जिज्ञासा महान दार्शनिक, लेखक राहुल सांकृत्यायन जी के एक निबंध से लिया गया इस निबंध को जब मैंने सर्वप्रथम पढ़ा था तब से ही मैंने इसे अपने जीवन शैली का एक अभिन्न अंग मान लिया।

देखा जाये तो यह सही ही है किसी क्षेत्र विशेष, उनकी संस्कृति, उनका लोक व्यवहार, जीवन शैली को जानना है या अनुभव करना है तो सबसे अच्छा तरीका यही होगा कि हम उस क्षेत्र मे जाकर वहाँ कि जीवन को अनुभव करें।

यात्रा की उपयोगिता इसी से सिद्ध की जा सकती है कि किसी व्यक्ति, वस्तु, स्थान का सही ज्ञान जितना उसके दर्शन या व्यक्तिगत अनुभव से हो सकता है उतना किसी व्यक्ति द्वारा बताए जाने से या किसी ग्रंथ मे पढ़ने से नहीं होगा।

यात्रा के विभेद

यदि हम भारतीय परिपेक्ष्य में यात्रा के विभेदों की बात करें तो ये मूलतः 2 प्रकार के होंगे

1. धार्मिक यात्रा अथवा तीर्थ यात्रा

2. मनोरंजक यात्रा

जिसका विवरण इस प्रकार से है।

धार्मिक यात्रा- भारतवर्ष एक धर्म प्रधान देश है। अन्य देशों की तुलना में यहा की संस्कृति बहुत ही व्यापक है हर 60 से 70 किलोमीटर के अंतर पर यहाँ की रीति रिवाजों और संस्कृति में कुछ न कुछ नयापन देखने को मिलता है। धार्मिक यात्राओं का तो एक विशाल रूप इस देश में देखने को मिलता है।

उत्तर से दक्षिण एवं पूर्व से पश्चिम हर दिशा में, हर राज्य में किसी न किसी धर्म के तीर्थ का नाम अवश्य सुनने को मिलता है उदाहरण स्वरूप खुद आदि शंकराचार्य ने चरो दिशाओं में चार धाम कि स्थापना की जो प्रमुख तीर्थ की श्रेणी में आती है।

इसके साथ ही साथ सप्तपुरियों का भी वर्णन हमे विभिन्न धार्मिक ग्रन्थों मे देखने को मिलता है। इसके अलावा कई अन्य स्वरूपों के विचरण एवं जन्म स्थान को भी तीर्थ यात्रा के रूप में देखा जाता है। निकट भविष्य में हम लेख के द्वारा इन तीर्थों एवं धार्मिक स्थानो का अनुभव करने का प्रयास करेंगे।

मनोरंजक यात्रा- सामान्य शब्दों में देखा जाये तो वे सभी यात्राएं जो धार्मिक यात्राओं से भिन्न है मनोरंजक यात्रा की श्रेणी में आ सकती हैं। वैसे मनोरंजक यात्रा के भी दो आंतरिक विभेद हो सकते है। पहला साहसिक (Adventurous) यात्रा तथा दूसरे अन्य मनोरंजक यात्रा।

भारत देश में मनोरंजक यात्रा के स्थानो कि बहुत ही विविधता देखि जा सकती। यहाँ विभिन्न ऋतु, प्राकृतिक विविधता का अनुभव किया जा सकता है।

वास्तुकला के क्षेत्र में भी भारतीय परीतान बहुत समृद्ध है। भारत वर्ष के कई स्थान वास्तुकला एवं प्राकृतिक दोनों ही क्षेत्र मे संयुक्त राष्ट्र द्वारा विश्व धरोहर कि श्रेणी में आते है।

आगे के लेखो के जरिये मैं अवश्य आपको इन स्थानो का अनुभव करने का पूर्ण प्रयास करूंगा। (

यात्रा अथवा पर्यटन की दार्शनिक प्रासंगिकता-

महापंडित राहुल सांकृत्यायन ने हमेशा से अपने ज्ञान अनुभव के लिए यात्रा को ही मुख्य कारण माना है उनके अनुसार ज्ञान का अर्जन अनुभव के द्वारा ही प्राप्त किया जा सकता है। और साक्षात अनुभव ही पूर्ण ज्ञान दे सकता है यात्रा भी हमे साक्षात अनुभव करने के लिए बहुत ही प्रमुख सहायक की भूमिका निभाती है।

अगर देखा जाए पूर्व के महान विचारक विभिन्न स्थानो का विचरण करके ही ज्ञान का अर्जन एवं वितरण करते थे।

एक यात्रा ने ही राजकुमार सिद्धार्थ को महात्मा बुद्ध बनने के लिए प्रेरित किया। उनके ज्ञान का प्रचार प्रसार भी यात्रा के द्वारा ही हुआ। किसी समाज की जीवन शैली एवं लोक संस्कृति का ज्ञान अर्जन के लिए यात्रा के साधन द्वारा प्राप्त कर सकते है।

किसी समस्या के समाधान हेतु हमे विभिन्न उपायों को जानना होगा अगर यात्रा का कोई विषय वस्तु हमारे समाज में न हो और हम दूसरी दुनिया का अनुभव न रखे तो हम उसका समाधान ढूँढने में कठिनाइयों का सामना करेंगें।

मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है और समाज से जुड़े रहना उसके लिए अति आवश्यक है जिसके लिए यात्रा ही एक मात्र साधन है जो हमे अन्य समाज से जोड़कर रखता है। अतः अंत में हम कह सकते है कि यात्रा की दार्शनिक प्रासंगिकता आज भी है।

!इति शुभम्!

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