देवगुरु बृहस्पति पुत्र कच और संजीवनी विद्या

bhagvan kahan hain

देवगुरु बृहस्पति पुत्र कच की कथा- असुरो के गुरु शुक्राचार्य ने अपने तप बल के जरिये देवाधिदेव शिव से संजीवनी विद्या प्राप्त की थी। जिसके कारण सुरासुर युद्ध में जब भी असुरों को शारीरिक क्षति होती थी गुरु शुक्राचार्य उन्हे पुनः स्वस्थ कर देते थे।

जिसके कारण देवता परेशान होने लगे और असुरो से युद्ध में पराजित होने लगे। इस परेशानी के उपाय हेतु सभी देवता देवगुरु वृहस्पति के पास उपाय हेतु गए। और यह निर्णय लिया गया कि अगर असुरों के गुरु से संजीवनी विद्या को प्राप्त किया जा सके तो कुछ सहायताअवश्य मिल सकती है।

लेकिन बात इस पर आकार रुक गई कि आखिर कौन शुक्राचार्य से संजीवनी विद्या प्राप्त करने जाएगा। अंत में निर्णय लिया गया की देवगुरु वृस्पति के पुत्र चक शुक्राचार्य के पास जाएँगे और संजीवनी विद्या प्राप्त करके आएंगे।

कच का शुक्राचार्य के गुरुकुल मे प्रवेश-

कच देखने में बहुत ही सुंदर और सुशील था। साथ ही साथ बहुत ही बुद्धिमान और समझदार था। अपने पिता की आज्ञा अनुसार वो शुक्राचार्य के आश्रम गया। और गुरु शुक्राचार्य से संजीवनी विद्या प्राप्त करने की आग्रह किया। कच के तेजबल को देखकर शुक्राचार्य उसे अपना शिष्य बनाने को तैयार हो गए।

और अपने साथ उनकेआश्रम में रह कर विद्याध्ययन करने को कहा। और पुराने गुरुकुल प्रणाली के नियमों के अनुसार आश्रम के दैनिक कार्यो में सहयोग करने कि आज्ञा दी।

शुक्राचार्य की पुत्री का कच पर मोह-

शुक्राचार्य के आश्रम में उनकी पुत्री भी उनके साथ रहती थी। जिसका नाम देवयानी था। कच के रूप रंग से मोहित हो कर देवयानी मन ही मन कच को अपना मानने लगती है। और उसके बगैर अपने जीवन के एक भी क्षण को भी सोचना व्यर्थ समझती है। कच भी देवयानी के प्रति आकर्षित होने लगता है। तथा देवयानी के साथ आश्रम के समस्त कार्यों में सहयोग करता रहता है। दोनों के मध्य प्रेम बढने लगता है।

असुरों का षडयंत्र-

इसी बीच राक्षसो को भी कही सूचना मिल जाती है कि देवगुरु वृहस्पति पुत्र कच उनके गुरु शुक्राचार्य से संजीवनी विद्या प्राप्त करने हेतु उनके आश्रम में रहता है। इस समाचार से असुर भयभीत हो गए और उन्होने कच के प्राण हरने का निर्णय कर लिया।

एक दिन देवयानी ने कच को वन से पूजन हेतु पुष्प लाने को भेजा। इस अवसर का फायदा उठाते हुए असुरों ने कच को मारने का निश्चय कर लिया। और वन में कच की हत्या कर उसके शरीर को जंगली पशुओं को खिला दिया।

बहुत समय बीतने के बाद भी जब कच आश्रम नहीं लौटता है। तो देवयानी चिंतित हो जाती है। और अपने पिता शुक्राचार्य को कच के आश्रम वापस न लौटने की सूचना देती है। गुरु शुक्राचार्य अपने संजीवनी विद्या का प्रयोग कर कच को पुनः जीवित कर देते है।

कच को पुनः जीवित होने का समाचार पाकर असुर बहुत ही क्रोधित होते है और पुनः कच की हत्या कर उसका शव समुद्र की गहराइयों में फेंक देते है। और सोचा की समुद्र में शव को फेंकने से शुक्राचार्य को उसके बारे में पता नहीं चलेगा और वो उसे पुनः संजीवनी विद्या के जरिये जीवित नहीं कर पाएंगे। लेकिन पुनः देवयानी के कहने पर शुक्राचार्य उसे जीवित कर देते है।

कच को पुनः जीवित होने की सूचना पाकर असुर बहुत ही चिंतित होते है। और कच को समाप्त करने हेतु कोई दूसरा मार्ग सोचने लगते है। और पुनः कच की हत्या कर देते है और उसके शव को अग्नि मे जला देते है एवं प्राप्त राख़ को भोज्य पदार्थ में मिलाकर स्वयं अपने गुरु शुक्राचार्य को खिला देते है। अनभिज्ञता वश गुरु शुक्राचार्य कच को अपने उदर में समाहित कर लेते है।

देवयानी का वियोग-

देवयानी कच को न पाकर विचलित हो जाती है। और अपने पिता को कच के गायब होने की सूचना देती है। शुक्राचार्य अपने पुत्री को कच हेतु विचलित देखकर अपनी दिव्यदृष्टि का प्रयोग कर उसे ढूँढने का प्रयास करते है।

और जान जाते है कि असुरो ने छल का प्रयोग कर कच के शव भस्म को उनके उदर में भेज देते है। जिसे वापस संजीवनी विद्या से जीवित करना असंभव है। वो अपनी पुत्री से बताते है की अगर वो कच को जीवित करने का प्रयास करेंगे तो वो स्वयं जीवित नहीं रह पाएंगे।

लेकिन देवयानी कच के बिना अपना जीवन ही व्यार्थ मानती है। और अपने पिता से किसी भी प्रकार जीवित करने को आग्रह करती है। चक के बिना अपने जीवन को समाप्त करने की बात करती है।

शुक्राचार्य द्वारा कच को संजीवनी विद्या मिलना-

गुरु शुक्राचार्य अपने पुत्री का कच के बगैर वियोग को देखकर कच को पुनः जीवित करने का उपाय सोचने लगते है। और कच को अपने उदर में ही संजीवनी विद्या देने का निर्णय लेते है। और कच को बोलते है मैं जानता हूँ तुम मेरे उदर में उपस्थित हो,

अब मै तुम्हें संजीवनी विद्या प्रदान करूंगा उसके उपरांत तुम मेरा उदर चीरकर मेरे शरीर से बाहर आ जाना और उसके उपरांत प्राप्त संजीवनी विद्या से मुझे जीवित कर देना। इस प्रकार कच गुरु शुक्राचार्य के उदर से बाहर आकर उन्हे भी जीवित कर देता। और संजीवनी विद्या भी प्राप्त कर लेता।

शिक्षा

इस कहानी से बहुत सारी शिक्षाएं हमे प्राप्त होती है। जिस प्रकार कच देवताओं का सहायक होकर असुरों के गुरु से शिक्षा प्राप्त करने जाता है। उससे हमे शिक्षा मिलती है कि ज्ञानार्जन हेतु हमे किसी को भी गुरु बनाने में संकोच नहीं करना चाहिए।

द्वितीय देवता के सहयोग हेतु संजीवनी विद्या प्राप्त करने आए कच को शुक्राचार्य निःसंकोच विद्या प्रदान करने हेतु तैयार हो जाते है। इससे यह शिक्षा मिलती है कि ज्ञान को देने हेतु हमे किसी में भी भेद नहीं देखना चाहिए।

तृतीय जिस प्रकार कच को न पाकर देवयानी विचलित होती है उससे शिक्षा मिलती है कि अपने प्रेम के बल पर हम किसी को भी अपने वश में कर सकते है। और उसी प्रेम के कारण कच को पुनः अपना जीवन प्राप्त होता है।

चतुर्थ अगर गुरु कोई विद्या आपके प्रतिद्वंदी को प्रदान करते है तो उस पर प्रश्न नहीं होना चाहिए जैसा असुरों ने किया और शुक्राचार्य के शिष्य कच का वध करने का प्रयास किया। गुरु कभी भी आपका अहित नहीं होने देगा उसपर इतना विश्वास अवश्य होना चाहिए।

||इति शुभम्य||

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