महर्षि विश्वामित्र (Vishvamitra): एक प्रतापी राजा से महर्षि बनने की कथा

महर्षि विश्वामित्र (Vishvamitra): एक प्रतापी राजा से महर्षि बनने की कथा

महर्षि विश्वामित्र (Vishvamitra) को हम सभी जानते है। क्योंकि रामायण की कथा से इनका संबंध है। इन्होने ही महाराज दशरथ से राम और लक्ष्मण की मांग की जो उनके आश्रम मे उनके यज्ञ पूजन की रक्षा करेंगे।

और राम लक्ष्मण इनके साथ जाते है और राक्षसी ताड़का का वध करते है और मारिची नमक मायावी राक्षस को सबक सीखते है। इन्ही विश्वामित्र के साथ राम और लक्ष्मण जनकपुरी जाते है और राजा जनक की पुत्री से राम का विवाह होता है। 

लेकिन क्या आप जानते है महर्षि विश्वामित्र जन्म से एक महर्षि नहीं थे बल्कि राजा थे। तो आइये जानते है इसकी सम्पूर्ण कथा। 

राजा विश्वामित्र (Vishvamitra) का संक्षिप्त परिचय- 

राजा विश्वामित्र एक चंद्रवंशी राजा थे। ये महोदया नगर के राजा थे। महोदया नगर को वर्तमान मे उत्तर प्रदेश के कन्नौज शहर के रूप मे जाना जाता है। इनके दादा का नाम कुशनाभ था और इनके पिता का नाम गाधि था।

शुरू के समय मे महर्षि विश्वामित्र का नाम राजकुमार कौशिक था। और इनमे एक राजकुमार के समस्त गुण थे। लेकिन समय के कालक्रम मे इनके साथ ऐसा हुआ कि ये एक राजा से महर्षि बन गए। 

राजा विश्वामित्र से महर्षि बनने की कथा- 

एक समय की बात है राजा कौशिक (विश्वामित्र) प्रवास पर निकले। चलते चलते ये और इनके साथ चलने वाली हजारो सिपाहियों इत्यादि का दल बल जंगल मे पहुँच जाता है। और ये बहुत थके हुए रहते है।

जिससे ये कोई उचित स्थान प्रवास के लिए ढूँढने लगते है। पास ही मे इन्हे एक आश्रम मिलता है। जो कि महर्षि वशिष्ठ का आश्रम रहता है। राजा कौशिक महर्षि वशिष्ठ को प्रणाम करते है और उनके आश्रम मे विश्राम करने हेतु आग्रह करते है। 

देव गौ नंदिनी का चमत्कार- 

महर्षि वशिष्ठ उनकी आग्रह को मान लेते है लेकिन चिंतित हो जाते है कि इतनी बड़े लाव लश्कर  का आथित्य कैसे करेंगे। और अपने आश्रम के चमत्कारी गौ नंदिनी के पास जाते है। नंदिनी गाय महर्षि वशिष्ठ को उपहार स्वरूप देवलोक से मिलता है।

जो कि कामधेनु की पुत्री होती है। नंदिनी वशिष्ठ की समस्या को भाँप लेती है। और महर्षि वशिष्ठ को अपने चमत्कार से ढेर सारे पकवान मिष्ठान इत्यादि प्रदान करती है। 

जिसके बाद महर्षि वशिष्ठ लोगो का सत्कार करते है। लेकिन इस बात पर राजा कौशिक चकित होते है और महर्षि से पुछते है कि एक सन्यासी हो कर उन्होने इतनी बड़ी सेना को कैसे तृप्त किया जिसपर महर्षि वशिष्ठ नंदिनी के चमत्कार के बारे मे बता देते है।

और ये सुनकर राजा कौशिक उनसे नंदिनी गाय की मांग कर देते है। और इसके बदले लाख गाय उन्हे देने को बोलते है।

लेकिन महर्षि वशिष्ठ उन्हे नंदिनी को देने से यह कहते हुए मना कर देते है कि ये गाय स्वयं ब्रह्मा ने उन्हे दिया है।

और इसके द्वारा वो जनकल्याण का कार्य करते है। जिसके बाद उनके मध्य संघर्ष होता है। लेकिन पुनः नंदिनी गौ के चमत्कार से जिसमे नंदिनी के शरीर के बालो से लाखो सैनिक उत्पन्न हो जाते है। और उनसे युद्ध करते हुए राजा कौशिक हार जाते है।

और तभी से प्राण करते है कि राज पात छोडकर सन्यास धारण कर लेते है। और घोर तपस्या के द्वारा महर्षि की उपाधि धरण करते है। 

राजा से महर्षि बनने का कारण- 

हमारे पौराणिक ग्रंथो मे ये भी बताया गया है कि क्यों आखिर विश्वामित्र राजा होते हुए एक महर्षि बने। ग्रंथो के अनुसार महर्षि विश्वामित्र के पिता गाधि को पहले एक पुत्री रहती है जब विश्वामित्र का जन्म नहीं नहीं हुआ रहता है। और उनकी पुत्री जिसका नाम सत्यवती था।

उनका स्यंवर का आयोजन होता है। और स्वमवार का शर्त रहता है कि जिसके पास भी एक लाख गाये होगी उसके साथ सत्यवती का विवाह किया जाएगा।

और इस स्वयंबर मे महर्षि जमदग्नि अपनी एक लाख गायों के साथ पहुँचते है और उनका विवाह सत्यवती से हो जाता है। 

चूंकि जमदग्नि एक महर्षि होते है। इसलिए राजा गाधि उनसे अनुरोध करते है की कोई उपाय बताए जिससे उनको पुत्र की प्राप्ति हो।

इसपर महर्षि जमदग्नि दो विशेष पेय का निर्माण करते है। एक अपनी पत्नी सत्यवती के लिए और दूसरा राजा गाधि के पत्नी के लिए । 

लेकिन राजा गाधि की पत्नी के मन मे विचार आता है कि यदि वो पेय बदल दे तो तो शायद उनका पुत्र और भी प्रतिभाशाली होगा क्योंकि शायद महर्षि जमदग्नि ने अपनी पत्नी के लिए और बेहतर पेय तैयार किया हो। और वो दूसरा पेय पेय लेती है। और अपनी पुत्री को अपना पेय दे देती है। 

इसीलिए मान्यता है कि राजा गाधि के पुत्र एक राजा होते हुए भी महर्षि का जीवन व्यतीत किए और महर्षि जमदग्नि के पुत्र, जिन्हे हम भगवान परशुराम के नाम से जानते है। वो एक महर्षि के पुत्र होते हुए भी उनमे एक क्षत्रिय राजा के गुण रहे। 

निष्कर्ष-

उपरोक्त दो कथानक से हम देख सकते है कि कैसे एक चमत्कारिक गाय नंदिनी होते हुए भी महर्षि वशिष्ठ ने उसके चमत्कार का दुरुपयोग नहीं किया और आवश्यकता होने पर ही उनसे सहायता मांगी।

दूसरी तरफ इतना सत्कार पाते हुए भी अपने आतिथेय (Host) से उनकी संपत्ति की मांग कर दी और जब नहीं मिला तो उनसे संघर्ष भी किया और अंत मे हार का मुह देखना पड़ा।

वहीं दूसरे कथानक मे राजा गाधि की पत्नी ने अपने शुभचिंतक का विश्वास ना करते हुए पेय बदल दिया और बदले मे उनका ही पुत्र सन्यासी हो गया जो कहीं न कहीं उन्ही की चतुराई का फल था। 

अतः हमे कभी भी अतिरिक्त की चाह नहीं रखनी चाहिए मन मे संतोष होना चाहिए। जो हमारे ऊपर उपकार करे या हमारा भला करे उसका अहित नहीं सोचना चाहिए तथा कभी भी हम पर सहयोग करने वाले पर अविश्वास नहीं होना चाहिए। 

||इति शुभम्य||

 

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