क्यों किया वानर सेना ने प्रभु श्री राम का सहयोग जानिए इसके पीछे का प्रसंग

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हम सभी जानते है रामायण की कथा मे भगावन श्री राम की जीवन लीला में बजरंग बली हनुमान और सम्पूर्ण वानर सेना का बहुत ही ज्यादा योगदान है। माता सीता की खोज से लेकर रावण की विशाल राक्षसी सेना से युद्ध मे उसे हराने तक वानर सेना ने अपना सम्पूर्ण योगदान दिया। और महावीर हनुमान की श्री राम के प्रति महान भक्ति को हम सभी जानते है।

लेकिन क्या आप जानते है कि भगवान श्री राम को रावण पर विजय पाने के लिए वानर सेना के सहयोग के पीछे का प्रसंग क्या है। तो आज हम आपको वो प्रसंग बताएँगे वैसे तो हमारे शास्त्रों और धार्मिक पुस्तकों मे बहुत सारे प्रसंग है लेकिन आज दो प्रमुख प्रसंगों की व्याख्या हम करेंगे।

एक बार की बात है देवर्षि नारद घोर तपस्या और विष्णु आराधना मे तल्लीन थे। उनकी तपस्या को देवराज इंद्र के आदेश पर कामदेव ने भंग करने का प्रयास किया कई सारी अप्सराओं इत्यादि के सहयोग से भी कामदेव उनकी तपस्या भंग नहीं कर सके।

इसके बाद देवर्षि नारद को अभिमान हुआ कि उनके ब्रह्मचर्य को कोई भी भंग नहीं कर सकता। भगवान विष्णु को इस बात का अनुमान हो गया और उन्होने देवर्षि नारद के अभिमान को भंग करने का विचार बनाया। और अपनी योगमाया के जरिये एक नए नगर का निर्माण कराया और वहाँ के राजा की पुत्री जो कि बहुत ही सुंदर थी उसका स्वयंवर करने का समाचार चारो ओर फैला दिया।

समाचार देवर्षि नारद के कानों तक भी पहुंची और उनके मन मे भी उस कन्या से विवाह करने का विचार उत्पन्न हुआ। और देवर्षि नारद भगवान विष्णु के पास पहुंचे और उनसे निवेदन किया कि उन्हे इतना सुंदर बना दे जिससे वो कन्या उनपर मंत्रमुग्ध हो जाये और उनका स्वयंवर उस कन्या से हो जाये।

चूंकि भगवान विष्णु को केवल देवर्षि नारद का अभिमान को भंग करना था तो उन्होने देवर्षि नारद के चेहरे को वानर रूप प्रदान कर दिया। वानर रूप लेकर नारद मुनि उस स्वयंवर मे पहुँचते है और उस कन्या के सामने जैसे ही पहुँचते है भरी सभा मे सभी उनको देखकर हंसने लगते है उनका उपहास उड़ाया जाता है।

इसके प्रसंग से नारद मुनि बहुत ही आहात होते है और बहगवान विष्णु के पास आते है। और उन्हे क्रोध वश श्राप देते है कि जिस वानर स्वरूप का आपके कारण उपहास उड़ाया गया है वही वानर से आपको सहयोग लेना पड़ेगा तभी आप अपने शत्रु पर विजय प्राप्त कर पाएंगे।

जब भगवान विष्णु नारद मुनि को बताते है ये सारा वाकया उनके अभिमान का नाश करने के लिए हुआ तब नारद मुनि बोलते है प्रभु आपके श्री राम्म अवतार के समय वानर के सहयोग से ही आप अपने शत्रु पर विजय प्राप्त करेंगे जो कि विधि का विधान है।

एक और प्रसंग है। इसके अनुसार एक बार रावण विहार करने के लिए निकला और चलते चलते वो कैलाश पर्वत के पास पहुंचा। कैलाश पर्वत पर पहुँचते हुए उसने अपने इष्ट भगवान शिव के दर्शन करने का विचार बनाया। लेकिन उस समय भगवान शिव ध्यान मग्न थे और अपने वहाँ नंदी को आदेश दिया था कि कोई भी अंदर आने न पाये।

और जैसे ही रावण द्वार पर घुसना चाहा उसे नंदी ने रोक लिया और रावण से अनुरोध किया कि अभी अंदर जाने की मनाही है। लेकिन रावण बहुत ही हठी और दंभी स्वभाव का था और वो नंदी से अंदर जाने की जिद करने लगा। बात इतनी बढ़ गई तो दोनों के मध्य युद्ध की स्थिति बन गई। और बात बढ़ते बढ़ते रावण ने नंदी को बोला कि मई शिव का भक्त हूँ और तुम जैसे पशु मुझे रोकने का प्रयास भी न करो।

वानर के जैसे तुम्हारी उछाल कूद मत कारों बल्कि मुझे अंदर जाने दो भगवान शिव ने तुम पशु को अपना गण बना रखा है इसका मतलब तुम लंकाधिपति को रोक सकते हो और न जाने कौन कौन सी बाते नंदी को बोला।

इस पर नंदी को क्रोध आ गया और उन्होने बोला हे रावण मई बस अपने प्रभु शिव की आज्ञा का पालन कर रहा हूँ। और तुम्हें अंदर जाने नहीं दे रहा हूँ। और यदि तुम भी भगवान शिव के इतने बड़े भक्त हो तो उनके आदेश की अवहेलना करना तुम्हारे ल्ये उचित नहीं।

और जो यौम पशु को तुच्छ घोषित कर रहे हो या फिर मुझे वानर कह रहे हो तो मै तुम्हें बता दूँ। भगवान शिव का एक नाम पशुपति नाथ है और वो हम पशुओं के बहुत प्रिय है। और मै तुनहे श्राप देता हूँ एक वानर ही तुम्हारे सोने की लंका को जलाकर भष्म कर देगा। और पशुओं के सामने ही तुम पराजित होगे। और उनके कारण ही तुम्हारा नाश होगा।

इस प्रकार से ये दो प्रमुख प्रसंग है जिसमे बताया गया है कि किस निमित्त वानरों और रीक्षों इत्यादि की सेना के सहयोग से भगवान श्री राम ने रावण को पराजित कर अपनी अर्धांगिनी माता सीता को वापस पाया। और वानर रामायण जैसी महान कथा के अभिन्न अंग बन गए।

तो आप लोगो को आज का प्रसंग कैसा लगा हमे बताए, तथा और ऐसी कथा प्रसंग, दार्शनिक विचारों को पढ़ने के लिए हमारे इस पेज से जुड़े रहे।

!!इति शुभम्य!!

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