तीर्थयात्रा: वानप्रस्थ आश्रम का आरंभ

तीर्थयात्रा: वानप्रस्थ आश्रम का आरंभ- संसार के सभी धर्मो में तीर्थ यात्रा का अपना महत्व है। लोग अपने इष्ट के अवतरण, उनके विचरण के स्थान इत्यादि पर जाते है और उसे तीर्थ यात्रा के रूप में मानते है। लोगो का मानना है तीर्थ यात्रा से हमे आत्मिक और मानसिक संतुष्टि प्राप्त होती है। सनातन धर्म की बात करें तो यहा भी तीर्थ यात्राओं का वर्णन मिलता है। जो हमे आध्यात्मिक मार्ग की ओर ले जाती है। तथा मोक्ष प्राप्ति हेतु सुलभता प्रदान करती है।

वैसे तो संतान धर्म में जीवन के हर चरण में तीर्थ यात्रा की बात की जाती है। लेकिन चार आश्रमों का पालन करते हुए जब हम वानप्रस्थ आश्रम में प्रवेश करते है। उसके लिए प्रमुख तीर्थ यात्रा करने का विवरण हमे मिलता है। आश्रम पद्धति पर हम किसी अन्य लेख में अवश्य विचार करेंगे। अभी हम जानेगे कि उस तीर्थ यात्रा के बारे में जो हमे वानप्रस्थ आश्रम में प्रवेश और सन्यास आश्रम की ओर अग्रसर करती है।

गया और पिंडदान- बिहार राज्य के गया जिला में पिंडदान का बहुत ही अलग महत्व है। वैसे तो पिंडदान कई और स्थानो जैसे हरिद्वार, बद्रीनाथ इत्यादि पर किए जाते है। लेकिन विष्णु पुराण में पिंडदान का अलग ही महत्व बताया गया है। और हामरे वानप्रस्थ आश्रम की तीर्थ यात्रा गया से ही आरंभ होती है।

गया का नाम गायसुर नमक राक्षस के नाम पर पड़ी जिसने तपस्या कर वरदान प्राप्त किया था कि उसके दर्शन मात्र से लोग सभी पापो से मुक्त हो जाएगा जिससे स्वर्ग में मुक्ति पाये लोगो की संख्या बढ़ने लगी इसके उपाय हेतु ऋषि मुनियों मे गयासुर से यज्ञ करने हेतु पवित्र भूमि की मांग की। जिसके लिए गयासुर लेटकर अपने शरीर को ही उस भूमि के रूप में उपयोग हेतु दे देता है लेकिन इसके बदले वो वरदान प्राप्त करता है कि जो भी उस शरीर रूपी पाँच कोश भूमि पर अपने फ़िटरों की मुक्ति हेतु आएगा उन्हे मुक्ति का वरदान प्राप्त होगा। इस प्रकार लोग कुंकुन नदी के तट पर विष्णुपाद मंदिर के निकट हर वर्ष की आश्विन मास में पित्र पक्ष में अपने पूर्वजो की मुक्ति हेतु गया श्राद्धदान अथवा पिंडदान हेतु जाते है।

जगन्नाथ पुरी और अन्नदान- गया के उपरांत हमारी तीर्थयात्रा उड़ीसा राज्य के पुरी जिले में जगनाथ पुरी के दर्शन को आगे बढ़ती है। जगनाथ पुरी का देवस्थान रहस्यों और चमत्कारों से भरा हुआ है। जगन्नाथ पुरी देव स्थान में कृष्ण, उनके बड़े भाई बलराम और उनकी बहन सुभद्रा की काष्ठ की प्रतिमा विद्यमान है। हर वर्ष यहाँ की रथयात्रा पूरे विश्व मे प्रसिद्धि लिए हुए है। कहते है एक बार भगवान कृष्ण ज्वर से संक्रमित हो जाते है और जब उनका ज्वर समाप्त हो जाता है तो वो भ्रमण हेतु निकलते है जिसे रथयात्रा के रूप में हर वर्ष मनाया जाता है।

अपनी तीर्थ यात्रा के समय हम जगन्नाथ पुरी वहाँ का प्रसिद्ध भोग प्रसाद ग्रहण करते जाते है और वहाँ भोग प्रसाद हेतु अपनी क्षमता अनुसार अन्नदान करते है। कहते है की भगवान जगन्नाथ का भोग सात तल के रूप में मिट्टी के बर्तनो मे पकाया जाता है तथा सबसे पहले सबसे ऊपरी तल का भोग पाक कर तैयार होता है। और भी रोचक रहस्य कथाएँ भगवान जगन्नाथ पुरी से जुड़ी है अन्य लेख में हम इसका विवरण अवश्य करेंगे। अपनी पुरी की यात्रा के अंत में हम भगवान जगन्नाथ की छड़ी का प्रतिरूप वह से लेकर आते है। और ये तीर्थ यात्रा का क्रम अगले पड़ाव की ओर अग्रसर होती है।

बद्रीनाथ और उत्तराखंड के चार धाम- हमारा अगला पड़ाव उत्तराखंड राज्य में स्थित बद्रीनाथ धाम और उत्तराखंड राज्य के चार धाम से जुड़े हुए है। जगन्नाथ पुरी से लायी छड़ी को हम बद्रीनाथ धाम में अर्पित करते है जो हमारी यात्रा के क्रम को बनाए रखती है। बद्रीनाथ धाम भगवान विष्णु के प्रमुख देवस्थानों में देखा जाता है। आदि शंकराचार्य द्वारा स्थापित चार धामो में बद्रीनाथ धाम प्रमुख है। साथ ही साथ उत्तराखंड में भी बद्रीनाथ, केदारनाथ, गंगोत्री एवं यमुनोत्री के रूप में छोटे चारधाम अथवा उत्तर के चारधाम भी बहुत महत्वपूर्ण है इस यात्रा के लिए। बद्रीनाथ की यात्रा के तुरंत उपरांत हम केदारनाथ (शिव स्थान) और गंगोत्री (गंगा का उद्गम स्थल) एवं यमुनोत्री (यमुना का उद्गम स्थल) की यात्रा भी करते है। तथा अगली यात्रा हेतु गंगोत्री से गंगा जल को किसी पात्र में लेते हैं।

रामेश्वरम और दक्षिण भारत की यात्रा- उत्तराखंड की यात्रा के उपरांत हम रामेश्वरम की यात्रा की ओर बढ़ते है। रामेश्वरम की बी पुनोरोद्धार आदि श्ंकरचार्य में चार धामो में एक धाम के रूप में किया था। वियसे तो रामेश्वरम देवस्थान की स्थापना प्रभु श्रीराम ने समुद्र पर सेतु निर्माण से पूर्व किया था तथा भगवान शिव से रावण पर विजय की प्रथना की थी। गंगोत्री से लाये गंगा जल को हम यहाँ रामेश्वरम मे अर्पित करते है। रामेश्वरम की यात्रा के साथ साथ दक्षिण भारत के अन्य तीर्थों की भी यात्रा कर सकते है। जिसमे तिरुपति तिरुमला देवस्थान और अन्य दक्षिण भारतीय देवस्थानों की यात्रा भी करते सकते है।

द्वारकापुरी- रामेश्वरम की यात्रा के उपरांत हम अगली यात्रा द्वारकापुरी की ओर बढ़ते है। द्वारकापुरी का निर्माण प्राचीनतम काल में प्रभु श्रीक़ृष्ण ने किया था। प्राचीन काल मे भगवान कृष्ण ने अपनी राजधानी मथुरा से स्थान्तरित करके द्वारका ले जाने का निर्णय लिया। और कहा जाता है कि भगवान विश्वकर्मा ने एक रात्रि में द्वारकापुरी का निर्माण किया था। और प्राचीनतम द्वारकापुरी समुद्र मे समाहित हो चुकी है।

अभी जिस द्वारकापुरी स्थान है वो पुनर्निर्माण द्वारा स्थापित किया गया है। प्राचीन कथाओं में वर्णित है। भगवान श्री कृष्ण अपने भोजन हेतु जगन्नाथ पुरी स्थान जाते है जहां उन्हे 56 भोग ग्रहण कराया जाता है तथा शयन हेतु वो द्वारकापुरी धाम जाते है। द्वारकापुरी धाम के साथ ही हमारी यात्रा एक पड़ाव लेती है। तथा इस यात्रा के समापन हेतु हम अपने गृह स्थान में दिव्य देवपुजन और भंडारे का आयोजन कर अपने यात्रा की पूर्णाहुति करते है। तथा सन्यास आश्रम के अनुरूप जीवन यापन करना आरंभ करते है।

निष्कर्ष

सनातन धर्म में जीवन मरण को को दुख का कारण माना गया है तथा मोक्ष को ही अंतिम पड़ाव माना गया है। एवं उसके अनुसार हमे अपना सम्पूर्ण जीवन केवल अपने आत्म की मुक्ति हेतु व्यतीत करना चाहिए। तीर्थ यात्रा हमे मुक्ति की ओर अग्रसर करती है। तथा आध्यात्मिक जीवन व्यतीत करने हेतु तीर्थ यात्रा का एक अलग ही महत्व है। आदि शंकराचार्य ने देश के चारो दिशाओं में चार धाम की स्थापना कर एक देश की एकता को बनाए रखने का भी प्रयास किया है। तीर्थ यात्रा का अंतिम लक्ष्य आपको मानसिक शांति प्रदान करना तथा परम शक्ति की सत्ता का साक्षात्कार करना होता है। तीर्थयात्रा हमे इस जीवन मरण के बंधन से मुक्त कर परम सत्ता के शरण मे जाने का मार्ग प्रदान करता है।

!इति शुभम्!

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