शास्त्रार्थ और धर्म के नियमों की व्याख्या मे इसका महत्व- दार्शनिक विवेचना

भारतीय सनातन धर्म मे शास्त्र और शास्त्रार्थ का बहुत ही अधिक महत्व है धर्म के नियम उनके अवयव की विवेचना का कार्य इन्ही की जरिये की जाती है। लेकिन आज के समय मे शास्त्रार्थ को वाद विवाद के रूप मे जाना जाता है जो इसकी व्याख्या को दूषित करता है।

तो आज के इस लेख मे हम समझने का प्रयास करेंगे की शास्त्र और शास्त्रार्थ के बारे मे जानने का प्रयास करेंगे और ये भी समझने का प्रयास करेंगे कि किस प्रकार से शास्त्रार्थ के जरिये धर्म की व्याख्या की जा सकती है।

धर्म-

सबसे पहले समझने का प्रयास करेंगे कि धर्म क्या होता है। धर्म का शाब्दिक अर्थ देखे तो इसका मतलब होता है धरण करने योग्य या फिर धारणा अथवा विचार जो हमारे जीवन का मूल और सार्वभौम सत्या होती है। अतः वे विचार और जीवन के मूल अवयव जो जिनहे हम अपने जीवन मे समाहित करते है उन्हे धर्म के रूप मे देखा जाता है।

शास्त्र-

सामान्य शब्दों मे हम शास्त्र को बस कुछ श्लोक के संग्रह के रूप मे जानते है लेकिन शास्त्र का मूल अर्थ होता है नियमो और अनुशासन से संबन्धित विशिष्ठ संग्रह और ये वही नियन और अनुशासन का संग्रह होते है जो हमे हमारे धर्म के अनुशरण के लिए बहुत ही आवश्यक होता है।

शास्त्रार्थ-

अब बात आती है शास्त्रार्थ की। तो शास्त्रार्थ दो शब्दों के युग्मोन से मिलकर बना है जिसका संधि विच्छेद होता है शास्त्र और अर्थ यानि कि वो प्रक्रिया जो शास्त्र के अर्थ को प्रदर्शित करती है उसे शास्त्रार्थ के रूप मे जाना जाता है। शास्त्रार्थ के जरिये हम धर्म के नियमों और उसके अनुशासन को जानने का प्रयास करते है।

वाद विवाद से परे है शास्त्रार्थ-

शास्त्रार्थ को वाद विवाद के तुच्छ अर्थ के रूप मे जानना हमारी नासमझी है वाद विवाद का अर्थ है कि अपने किसी विचार को किसी पर जबर्दस्ती आरोपित करना लेकिन शास्त्रार्थ का मूल रूप है धर्म के नियम अथवा शास्त्र मे लिखित नियमों की सही और उचित व्याख्या करना।

शास्त्रार्थ की आवश्यकता-

अब प्रश्न उठता है कि शास्त्रार्थ की क्या आवश्यकता है तो धर्म एक ऐसा विषय है जिसे कोई व्यक्ति उसके आदर्श के रूप मे मानता है और जब तक उसके आदर्शों की व्याख्या नहीं की जाये तब तक कोई भी किसी धर्म का अनुशरण नहीं करेगा। इसीलिए किसी उपयुक्त व्यक्ति द्वारा उसका जन सामान्य के शब्दों मे अर्थ स्पस्थ करना अति आवश्यक हो जाता है।

शास्त्रार्थ के जरिये धर्म के नियमों व्याख्या-

मानव जीवन मे हम विधि और कानून के तहत अपना जीवन यापन करते है यही एक सभ्य समाज की पहचान है लेकिन धर्म एक ऐसा संस्थान है जो सबसे पहले किसी समाज के लिए कुछ नियमों का निर्माण करता है। मूलतः शास्त्रार्थ के जरिये विशेष धर्मविद इस कार्य को निष्पादित करते है।

व्याख्या देश काल से बाध्य-

शास्त्रार्थ की सबसे प्रमुख आवश्यकता इसीलिए है कि इसके जरिये हम हर देश काल परिस्थिति के अनुरूप इसकी अलग व्याख्या की आवश्यकता होती है। और यही इसके जरूरत को दर्शाती है।

उदाहरण के लिए कोई भी धर्म कहता है कि हमे कभी भी असत्य का प्रयोग नहीं करना चाहिए। लेकिन शास्त्रार्थ के जरिये हम इसकी व्याख्या को जब समजहते है तो पता चलता है कि यदि हमारे असत्य बोलने से किसी व्यक्ति विशेष या समाज के हित ई बात होती है तो फिर असत्य बोला जा सकता है लेकिन असत्य को जीवन मे पूर्ण रुपेन धरण नहीं किया जा सकता है।

शास्त्रार्थ धर्म पालन मे सहायक-

धर्म मे नियमों का संग्रह है तथा इसके द्वारा जीवन नीति अनीति के बारे मे बताया है लेकिन किन नियमों का सही अथवा मूल अर्थ क्या है उसे शास्त्रार्थ के रूप मे जाना जा सकता है। उदाहरण के लिए हमारी जीवन शैली समय के साथ बहुत परिवर्तित हो चुकी है तो इसका मतलब ये नहीं कि जो नियम पूर्व मे जैसे व्याख्या हुई उसका पालन उसी रूप मेकीय जाये इसके लिए समय समय पर शास्त्रार्थ के जरिये हम इसकी व्याख्या के द्वारा उन नियमों का सही अर्थ जान सकते है और उसी प्रकार उसका पालन कर सकते है।

सार-

उपरोक्त लेख को लिखने का मेरा उद्देश्य बस यही है कि शास्त्रार्थ के जरिये हमे धर्म को समझेने की आवश्यकता है धर्म का पालन आँख बंद करके नहीं किया जा सकता है। देश काल परिस्थिति के अनुरूप इसका स्वरूप परिवर्तित होता रहता है। आज जब समाज के स्वरूप मे इतने त्वरित परिवर्तन देखने को मिल रहा है फिर हमे इसकी सही व्याख्या जानना जरूरी है।

धर्म कभी भी किसी को रूढ़िवादी बनना नहीं सिखाता है। नियमों का पालन करना अति आवश्यक है लेकिन परिस्थिति अनुसार उसके परिवर्तित स्वरूप के अनुरूप शास्त्रार्थ के जरिये ही हम धर्म के पालन मे सही मार्ग का चयन कर सकते है। और उसकी व्याख्या के सही स्वरूप को जान कर सही मैने मे जीवन को धर्मानुरूप यापन कर सकते है।

||इति शुभम्य||

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