सेवा धर्म क्या है सेवा धर्म मानवता की पहचान

sewa dharm- Kissa Kahani

मानव एक बहुत ही अद्भुत और बुद्धिमान प्राणी ही और मानव को परिभाषित करने के लिए हम मानवता, समाज और विधि इत्यादि जैसे शब्दों का प्रयोग करते है। लेकिन अगर इन सभी शब्दों सहयोग शब्द से ही पूर्ण रूप दिया जा सकता है। मानव प्रजाति के विकास और उसके सुचारु संचालन के लिए एक दूसरे का सहयोग बहुत ही आवश्यक है। कोई भी प्राणी ऐसा नहीं कह सकता की बिना किसी सहयोग के वो अपना सम्पूर्ण जीवन यापन कर सकता है।

अब बात करते है सेवा धर्म की तो ये सहयोग की भावना को एक नियम और विधि के रूप मे धरण करने के सूत्र को ही सेवा धर्म के रूप मे जाना जाता है। सेवा का तात्पर्य केवल किसी की मदद के रूप मे नहीं देखना चाहिए बल्कि इसे एक कर्तव्य के रूप मे अपने जीवन मे धरण करना ही असली सेवा धर्म है। मदद तो हम केवल भावना के अंतर्गत करते है। लेकिन कर्तव्य के रूप मे हमे उसका पालन करना ही हमारा उद्द्येश्य होना चाहिए।

सेवा धर्म का तात्पर्य उस प्रकार के सहयोग की भावना से जिसमे हम अपनी सेवा के बदले कुछ फल की भावना नहीं रखते है। नीति शास्त्र के नियम के अनुसार जब कभी हम अपनी सेवा के बदले किसी कामना की इच्छा रखते है तो उस सेवा का फल निष्क्रिय हो जाता है। साथ ही सेवा धर्म के निर्वहन के समय परिस्थितियों के अनुकूल और प्रतिकूल होने की भी इच्छा नहीं रखनी चाहिए। परिस्थियाँ भी हमारे सेवा धर्म की भावना को प्रभावित नहीं कर सकती है।

सेवा धर्म को और अच्छे से जानने के लिए मई एक कथा का वर्णन करता हूँ एक बार दो तपस्वी साधु यात्रा पर थे रास्ते मे एक नदी पड़ती है और दोनों साधु अपनी प्यास बुझाने के लिए उस नदी के तट पर जाते है और जल का पान करते है। तभी एक साधु को एक बिच्छू दिखता है जो पानी मे फंसा रहता है। वो साधु उस बिच्छू को बचाने हेतु अपने हाथों से उसे निकालने का प्रयास करता है।

जैसे ही साधु उस बिच्छू को उठता है वो बिच्छू उस साधु को डंक मार देता है और साधु के हाथों से छुट कर पानी मे फिर गिर जाता है। साधु पुनः उसे बचाने का प्रयास करता है और पुनः बिच्छू साधु को डंक मारता है। ये क्रम चलता रहता है और अंत मे साधु बिच्छू को बाहर निकाल देता है।

इस पूरे क्रम को दूसरे साधु ने देखा और उसने अपने मित्र साधु को पुच्छा की जब वो बिच्छू बार बार आपको डंक मार रहा था तो फिर भी आप उसे निकालने का प्रयास क्यों कए रहे थे इस पर पहले साधु ने जवाब दिया कि मित्र वो बिच्छू अपने स्वभाव का अनुशरण कर रहा था और मई अपने स्वभाव का। एक बिच्छू का स्वभाव है डंक मारना और एक मानव अथवा साधु का स्वभाव है किसी परेशानी मे फंसे जीव की सहता करना। इसलिए मैंने अपने स्वभाव का अनुशरण करते हुए अपने कर्तव्य का निर्वहन किया।

उपरोक्त कथा मे यही बताने का प्रयास किया गया है कि कैसी भी देश काल अथवा परिस्थिति हो हमे अपने सेवा धर्म के कर्तव्य का निर्वहन हमेशा करना चाहिए।

मेरा तो मानना है किसी भी धर्म समाज संस्कृति की बात की जाये एक दूसरे के सहयोग और सहायता के आधार पर ही उनके विस्तार या संचालन की कामना की जा सकती है। आज का समाज भले ही जताने का प्रयास करती है वो किसी भी रूप मे किसी पर निर्भर नहीं है लेकिन वास्तविक रूप मे एक दूसरे के सहयोग के बिना किसी समाज का निर्माण भी नहीं हो सकता।

आज के इस कोरोना काल मे सेवा धर्म के बारे मे बोलना बहुत ही जरूरी हो गया है। अभी हम देख रहे है कि किस प्रकार से लोगों को चिकित्सा सेवा, उपकरण, औषधि इत्यादि की आवश्यकता पड़ रही है। और कितने ही लोग अपने सेवा धर्म का पालन करते हुए एक दूसरे का पूर्ण सामर्थ्य के साथ सहयोग कर रहे है। वहीं दूसरी तरफ किटन्ने ही लोग है जो इस महामारी काल मे एक दूसरे का फायदा उठाते हुए कालाबाजारी करते है। और ठगने का कार्य कर रहे है। तो जो लोग पूरी निष्ठा के साथ लोगो का सहयोग कर रहे है असल मायने मे ये लोग ही पूर्ण धार्मिक और ईश्वर से जुड़े लोग है। वही जो लोग इसके उलट जो लोग कालाबाजारी और ठगने का कार्य कर रहे है। उनसे बड़ा अधार्मिक और नास्तिक व्यक्ति कोई नहीं और उनसे बड़ा पापी इंसान कोई नहीं हो सकता है।

नीति शास्त्र के विचारको के अनुसार लोगो की सेवा करने वाले लोग ही आस्तिक और पूर्ण धार्मिक व्यक्ति माने जाएंगे। क्योंकि कोई भी धर्म वो हमे यही बताते है कि हम सभी उस ईश्वर का अंश है और एक दूसरे की सेवा उनका सहयोग करने से त्ततपरया है हम अपने ईश्वर की सेवा या सहयोग कर रहे है। इस लिए हम अपने धर्म का पालन कर रहे है।

सेवा धर्म से विहीन व्यक्ति, भावना हीन और मानवता हीं माना जाएगा इसीलिए सेवा परमों धर्म: की भावना के साथ हमे इसका पालन करना चाहिए। अपनी क्षमता और सामर्थ्य के अनुसार बिना किसी इच्छा और चाह के बिना किसी कामना के हमे सभी जीवों की सेवा करनी चाहिए स्वामी विवेकानंद ने भी नर सेवा नारायण सेवा के उद्द्येश्य के साथ जीवन यापन करने को ही सही बताया है। तो अपने जीवन मे सेवा भाव को अपने कर्तव्य के रूप मे धारण करते हुए हम भी सेवा धर्म के पालन का निश्चय करे।

धन्यवाद।

||इति शुभम्य||

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