श्रावण मास (savan maas)- शिव आराधना को समर्पित सावन महीना

भारतीय पंचांग के श्रावण मास (savan maas) का बहुत ही महत्वपूर्ण स्थान है। वर्षा ऋतु का आनंद और धान के फसल की रोपाई के साथ सावन के झूले और शृंगार रस के गीतों का अनमोल समागम देखने को मिलता है।

लेकिन इन सब के साथ साथ श्रावण महीने का सबसे महत्वपूर्ण इसलिए है कि इस माह में भगवान भोलेनाथ, आदिदेव महादेव की आराधना को समर्पित माना गया है। और इस माह में शिव की आराधना का सबसे ज्यादा महत्व है।

इस वर्ष श्रावण मास का आरंभ 06 जुलाई 2020 को हो रहा है और रक्षा बंधन के दिन श्रावण पुर्णिमा के दिन मास समाप्त हो रहा है। आइये अब जानते है श्रावण मास का लाभ कैसे उठाए कैसे करे शिव कि वंदना और आराधना।

शिव को प्रसन्न करना सबसे आसान-

मान्यता है कि भगवान शिव को प्रसन्न करना सबसे आसान है। वो अपने भक्तो को कभी निराश नहीं करते इस संबंध में कई ऐसी कथाएँ प्रचलित है जिसके अनुसार शिव ने अपने उन भक्तों पर भी कृपा की है।

जो बगैर किसी बोध के अज्ञानता वश उनका ध्यान पूजन किया उनपर भी शिव ने अपनी कृपा बना कर रखी है। अतः अपनी श्रद्धा और सच्चे मन से यदि हम शिव की आराधना से शिव का ध्यान पूजन करे तो बहुत ही आसानी से भोले की कृपा हम पर बरस सकती है।

बाबा भोलेनाथ केवल भक्ति के भूखे है बहुत सारे विद्वान, पंडित आपको पूजन का तरीका बताएँगे लेकिन यदि सच्चे मन से हम उन्हे केवल जल का भी अर्पण करे तो शिव अपने भक्तों से प्रसन्न हो जाते है। भंग धतूरे का भोग उन्हे पसंद है।

जो ऐसे पौधो की श्रेणी मे आते है जो अनायास ही कही भी उग आते है और श्रवण का मास भी इसी लिए शिव को समर्पित है क्योंकि इस मास में वर्षा के द्वारा जल की भी कोई कमी नहीं रहती है।

हमे खुद ही सोचना चाहिए जब हमारे शिव जी को ऐसी छीजे पसंद है जो बड़ी आसानी से मिल जाती है। और जिनका चढ़ावा कोई अन्य नहीं ग्रहण करता। तो फिर इससे सिद्ध है कि शिव केवल भक्त की भक्ति और उसकी सच्चे मन की श्रद्धा की चाह रखते है।

श्रावण मास पूजन की कुछ प्रचलित प्रथाएँ-

वैसे तो हर आराध्य के पूजन के लिए सच्ची श्रद्धा और भक्ति की आवश्यकता है लेकिन श्रावण मास में शिव की आराधना के लिए कुछ प्रथाएँ या तरीके प्रचलित है जो विशेष पूजन के रूप में जानी जाती है। जो इस प्रकार से है।

कावड़ यात्रा- कावड़ यात्रा एक तरह का व्रत होता है जिसमे भक्त किसी एक पवित्र नदी से जल को कावड़ में भरकर दूसरे स्थान तक पैदल जाकर किसी प्रमुख शिवलिंग पर अर्पित करता है। कावड़ यात्रा पूरे देश में भिन्न भिन्न स्थानो पर देखने को मिलता है।

और एपूरे सावन महीने में हर जगह केशरिया वस्त्र धारण किए हुए भक्त दिख जाएँगे। लेकिन कावड़ यात्रा सबसे प्रमुख रूप से देवघर, झारखंड में स्थित बाबा बैद्यनाथ धाम में बड़े धूम धाम से मनाया जाता है। इन्हे स्थानीय लोग बाबा बैजनाथ के नाम से भी पुकारते है। इस धाम की गणना 12 ज्योतिर्लिंगों में होती है।

यहा पर प्रत्येक वर्ष भागलपुर जिले के सुल्तानगंज से उत्तरवाहिनी गंगा से जल भरकर पैदल यात्रा करते हुए बाबा बैद्यनाथ धाम तक पहुँच कर प्रसिद्ध ज्योतिर्लिंग को समर्पित किया जाता है।

इसके साथ ही अन्य कई स्थानो पर भी स्थानीय पवित्र नदी से जल भरकर निकटतम प्रसिद्ध शिव मंदिर में कावड़ यात्रा के जरिये जल चड़ाने की मान्यता का हर वर्ष निर्वहन किया जाता है।

सोमवार व्रत- सावन मास पूजन की द्वितीय विधि सोमवार व्रत है। जो दो प्रकार से होते है कुछ लोग सावन मास के प्रथम सोमवार से व्रत आरंभ करते है और अंतिम सोमवार या फिर 5 सोमवार पूरा होने पर व्रत पूर्ण करते है।

और द्वितीय कुछ लोग प्रथम सोमवार से लेकर 16 सोमवार तक इस व्रत का मन से निर्वाह करते है। 16 सोमवार का व्रत कन्याओं और महिलाओं में बहुत ही ज्यादा प्रचलित है। वे अपने दाम्पत्य जीवन के अच्छे शुरुवात एवं निर्वहन हेतु इस व्रत का अनुष्ठान करती है।

सुबह शौच स्नान इत्यादि उपरांत शिव लिंग पर जल, बेलपत्र, भांग, धतूरा इत्यादि का चढ़ावा प्रदान कर व्रत आरंभ करते है। और दिन भर शिव का नाम जपते हुए बिना किसी छल कपट के मानसिक और शारीरिक विकारों का त्याग करके सम्पूर्ण दिन व्रत का पालन करते है।

शिव का अभिषेक- तीसरा सबसे प्रमुख पूजन विधि है शिव का अभिषेक जिसमे किसी दिन अपनी क्षमता अनुसार भक्त शिव के लिंग का वैदिक मंत्रों के द्वारा अभिषेक करता है। जिसे रुद्राभिषेक के नाम से भी जाना जाता है।

मुख्यता तो शिव का अभिषेक जल से किया जाता है लेकिन कुछ मान्यता और किसी प्रमुख सिद्धि हेतु लोग, नारियल पानी, दुग्ध, गन्ने के रस इत्यादि से भी अभिषेक पूजन करते है। अपनी क्षमता सामर्थ्य एवं मान्यता के अनुसार अभिषेक की वस्तु का निर्धारण होता है।

अभिषेक के समाया रुध्राष्टाध्यायी के मंत्रों का उच्चारण पुरोहित द्वारा किया जाता है तथा मंत्र उच्चारण के समय जल या जिस वस्तु से अभिषेक हो रही है उसका धार बनी रहनी चाहिए जिसके लिए विशिष्ट रूप से अभिषेक हेतु बने विशेष पात्र शृंगी से जल अर्पण किया जाता है।

जो मूलतः तो गाय के सींग से बना खोखला पात्र होता है या फिर पीतल एवं अष्टधातु से बना पात्र। इस प्रकार से अपने मनोकामना की पूर्ति हेतु श्रावण मास में रुद्राभिषेक पूजन सम्पन्न कराया जाता है।

निष्कर्ष-

श्रावण मास हरियाली का महिना होता है लोगो के मन में वर्षा ऋतु के कारण शृंगार व्याप्त रहता है लोग श्रावण मास में पेड़ो पर झूले डालते है। और विभिन्न लोकगीत का गायन करते हुए झूले का आनंद लेते है। सावन मास की सबसे प्रमुख गीत शैली कजरी होती है।

हर्षोल्लास के साथ श्रावण मास में शिव की आरध्ना करके हम अपनी समस्त मनोकामनाए पूरी कर सकते है। शिव को भोलेनाथ के नाम से भी जाना जाता है जिसके अनुसार उनके सामान्य पूजन और आराधना से हम उन्हे प्रसन्न कर सकते है।

उपरोक्त बताई विधियों के अलावा भी यदि हम सम्पूर्ण सावन के महीने में सच्चे मन से शिव को याद करे उनका नाम जप करे एवं श्रद्धा के साथ उन्हे प्रतिदिन स्नान के उपरांत एक लोटा शुद्ध जल का भी अर्पण करे तो भोले की विशिष्ट कृपा हमे प्राप्त होगी।

||इति शुभम्य||

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