सनातन और समाज- 1 आज और सनातन समाज मे विद्यार्थी जीवन

sanatan aur samaj bhag 1- Kissa Kahani

दोस्तों मैंने अपने इस ब्लॉग के जरिए एक नया अध्याय प्रारंभ किया है जिसके अंतर्गत मैं सनातन धर्म में वर्णित जीवन शैली और आज के समाज मे उसी जीवन शैली के मध्य का अंतर बताने का प्रयास करूंगा। तो आज का विषय है विद्यार्थी जीवन दोनों ही देश काल मे किस प्रकार से था।

सनातन धर्म के अंतर्गत लोगों का जीवन चार प्रमुख आश्रमों मे विभाजित किया गया था- ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और सन्यास जिसमे प्रथम ब्रह्मचर्य आश्रम मे विद्यार्थी जीवन की व्याख्या की गई थी। बच्चे के 8 वर्ष होने के उपरांत उन्हे गुरुकुल शिक्षा के लिए भेज दिया जाता था जहां रहकर उन्हे शिक्षा ग्रहण करनी होती थी। अब हम जानेंगे कि गुरुकुल शिक्षा प्रणाली मे क्या क्या खूबियाँ थी।

1- सबसे पहला गुण था गुरुकुल शिक्षा प्रणाली मे किसी भी प्रकार का व्यवसायीकरण नहीं था सभी जन को शिक्षा निःशुल्क प्रदान की जाती थी। उनसे किसी भी प्रकार का शुल्क नहीं लिया जाता था। उनका भरण पोषण रोज विद्यार्थियों द्वारा मांगी गई भिक्षा एवं राज्य द्वारा प्रदान की गई अनुदान राशि के द्वारा की जाती थी।

2- दूसरा प्रमुख गुण था सभी विद्यार्थी अपने निवास से दूर गुरुकुल मे रहकर ही शिक्षा ग्रहण करेंगे। जिससे उनके मध्य स्वावलंबी बनने के गुण आए सभी विद्यार्थी अपना सभी कार्य स्वयं करेंगे तथा गुरुकुल की देखरेख सब मिलकर करेंगे। आज भी जापान के कुछ स्कूल मे ऐसी शिक्षा दी जाती है जहां सभी विद्यार्थी ही मिलकर अपने कक्ष और स्कूल की साफ सफाई इत्यादि का कार्य करते है।

3- तीसरा गुण था विद्यार्थियों मे किसी भी प्रकार का विभेद नहीं होता था सभी विद्यार्थी राज्य के गुरुकुल मे शिक्षा ग्रहण करेंगे और गुरुकुल मे रहते हुए अपने गुरु के कहे अनुसार ही सभी कार्य करेंगे चाहे विद्यार्थी राज्य का बेटा ही क्यों न हो इससे विद्यार्थियों के मध्य किसी भी प्रकार की हीं भवन नहीं उत्पन्न नहीं होती थी।

4- चौथा गुण था सभी विद्यार्थियों को उनके रुचि के अनुसार शिक्षा प्रदान की जाती थी जैसे जिसे युद्ध कला मे रुचि हो उसे युद्ध कला की शिक्षा दी जाती थी कुछ को दर्शन कुछ को राजनीति सबकी अपनी अपनी रुचि के अनुसार शिक्षा प्रदान की जाती थी प्राचीन काल मे विद्याओं को 16 भागों मे बांटा गया था और सभी विद्याओं का बढ़ते क्रम मे शिक्षा प्रदान की जाती थी।

और अब अगर आज के समय की बात की जाए तो आज के समय मे शिक्षा का व्यवसायीकरण बहुत तेजी से हो रहा है किसी रुचि से नहीं बल्कि मोटी मोती रकम के आधार पर शिक्षा प्रदान की जाती है।

विद्यार्थियों मे इतना विभेद है की वर्ग के आधार पर स्कूल और कॉलेज का निर्माण किया गया है। लोग अपनी आय के आधार पर स्कूल कॉलेज का चयन कर रहे है।

पहले की शिक्षा मे किसी भी प्रकार की प्रतियोगिता नहीं होती थी गुरु शिष्य के व्यवहार को जानकार उसे उसके अनुरूप शिक्षा देता था और जिस विषय मे उसकी रुचि हो उसमे पारंगत कर देता था। लेकिन आज के समय मे शिक्षा मे प्रतियोगिता का बहुत महत्वपूर्ण स्थान हो चुका है। लोग किसी विषय की ओर आकर्षित हो रहे है बच्चे को माँ बाप भी जोर देकर उस खास विषय को जबरदस्ती पढ़ने को मजबूर कर रहे है चाहे उसकी रुचि हो या न हो।

जिस विषय के द्वारा एक अच्छी आय या फिर आरामदायक जीवन शैली प्राप्त हो सकती है केवल उसी तरफ लोगों का रुझान बढ़ रहा है। जिससे अन्य शिक्षा गौड़ रूप धरण कर रही है।

निष्कर्ष- अगर कहे तो लोग सनातन का इतना व्याख्या करते है लेकिन देश काल परिस्थिति के अनुरूप उसे ग्रहण करने मे हिचकिचाएंगे। क्योंकि भौतिक जगत उनके लिए प्रथम है। ऐसा नहीं कहता कि कोई एक काल खंड अच्छा ही था या कोई काल खंड बुरा ही था अच्छाई बुराई सब जगह होती है लेकिन बुराई को छोड़कर अच्छाई को ग्रहण करना भी तो आवश्यक है। और सनातन काल और आज मे जो अंतर दिखता है उसे देखने के बाद ये कहना पड़ेगा कि कुछ अच्छाई थी सनातन समाज के शिक्षा प्रणाली मे जिसकी आज कमी थी। प्रतिस्पर्धा की राह को छोड़कर केवल शिक्षा ग्रहण करने पर ज्यादा ध्यान देना ही सही होगा आज की और आने वाले पीढ़ी के लिए।

॥इति शुभम॥

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