सफलता के मूल मंत्र, सफल व्यक्ति की पहचान- दार्शनिक विवेचना

सफलता के मूल मंत्र- मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। और इस समाज मे हर कोई एक भाग दौड़ मे रहता है वो है, सफलता प्राप्ति की दौड़। इंसान पूरी उम्र इस दौड़ मे लगा रहता है। लेकिन उसको शायद समाज तो सफल मान सकता है लेकिन प्रतिस्पर्धा और ज्यादा पाने की चाह मे इंसान की ये दौड़ मरते दम तक लगी रहती है।

दरअसल यहाँ परेशानी सफलता की प्राप्ति मे नहीं बल्कि सफलता की पहचान मे है। वो जिस सफलता की प्राप्ति मे दौड़ रहा होता है, असल मे वो एक काल्पनिक सफलता है। क्योंकि सफलता का मूल लक्ष्य होता है। एक मुकाम की या फिर परिणाम की प्राप्ति।

और जहां आपको एक परिणाम प्राप्त हो जाएगा वहाँ तो सफलता की यात्रा समाप्त हो जानी चाहिए लेकिन फिर भी हम क्यों जीवन पर्यंत उस दौड़ मे लगे रहते है। इसका तात्पर्य है हम असली सफलता को न पहचानते हुए नकली सफलता की दौड़ मे लगे हुए है। तो आज हम बात करेंगे दर्शन शास्त्र के अनुसार एक सफल व्यक्ति कौन है।

1. ईमानदार-

एक सफल इंसान का सबसे प्रमुख गुण है उसमे ईमानदारी का भाव। चाहे कोई भी देश काल या परिस्थिति हो उसकी ईमानदारी के भाव मे बिलकुल भी परिवर्तन संभव न हो। न तो कोई लोभ या कोई भाय उसे ईमानदारी के मार्ग से विचलित कर सके।

आप बोल सकते है कि ईमानदारी किसी सफलता की पहचान नहीं हो सकती लेकिन एक ईमानदार व्यक्ति कभी भी अति की चाह नहीं रखता है।

अतः उसमे इच्छाओं पर काबू करने की क्समता होती है। इस प्रकार से वो अपने जीवन मे आनंद का अनुभव करता है। और उसे किसी अन्य सफलता की दौड़ मे भाग लेने की आवश्यकता नहीं।

2. कर्म मे विश्वास-

जिस किसी व्यक्ति को कर्म मे विश्वास होगा और जो कर्तव्यनिष्ठ होगा उसे एक सफल इंसान के रूप मे जाना जा सकता है। क्योंकि वो सपनों की या कल्पना की दुनिया मे विचरण नहीं करता है बल्कि अपने आप को अपने कर्तव्यों के पालन करने मे तत्पर रखता है।

लेकिन यहाँ ध्यान रखने वाली बात ये है कि एक कर्तव्यनिष्ठ व्यक्ति को ध्यान रखने की आवश्यकता है कि वो अपने कर्म को अपना फर्ज़ समझ कर उसका पालन करे। जैसा कि गीता मे कर्म की परिभाषा दी गई है, जिसके अनुसार कर्म मे विश्वास और उसके परिणाम या फल की चिंता किए बगैर अपने कर्म का पालन करना ही परम कर्तव्य हो।

इसका अनुशरण करने वाला व्यक्ति केवल अपने कर्तव्यों के लक्ष्य की ओर आगे बढ़ता है और परिणाम की चाह नहीं करता है अतः वह काल्पनिक सफलता की दौड़ का हगीदार नहीं रहता है।

3. सकारात्मकता –

जो व्यक्ति हर देश काल परिस्थिती मे सकारात्मक रहते है उन्हे भी सकारात्मक व्यक्ति के श्रेणी मे रखा जाता है। सकारात्मक व्यक्ति कभी भी किसी के सुख समृद्धि को देखकर उसके भौतिक संसाधनो को देखकर कुंठित नहीं होता है।

ऐसे व्यक्ति के मन मे समाज को देखकर कोई नकारात्मकता नहीं आती है जिससे वो अपने आपको एक सफल इंसान मानता है। जो कुछ भी उसे पाने की चाह होती है उसे वो अपनी क्षमता पर विश्वास रखकर पाने के प्रयास मे लग जाता है।

और सकारात्मक दृष्टिकोण के कारण उसके मन मे निराशा का भाव कभी उत्पन्न नहीं होता है इसलिए उसे सफल इंसान माना जा सकता है।

4. विस्तृत दृष्टिकोण-

विस्तृत दृष्टिकोण वाला व्यक्ति कभी सीमित सोच या विचारों के मकडजाल मे नहीं फँसता है। और अपने लक्ष्य की प्राप्ति के लिए तब तक लगा रहता है जब तक उसे वो प्राप्त नहीं हो जाता है।

उदाहरण के तौर पर यदि एडिसन के बल्ब बनाने के प्रयोग एक दो बार असफल होने के उपरांत वो अपने विचारो को विस्तृत स्वरूप नहीं प्रदान करते तो आज वो इस महान अविषकार को सफल नहीं बना सकते थे।

लोगो की निराशा को अपने जीवन से दूर रखते हुए अपने विस्तृत दृष्टिकोण के जरिये उन्होने ये सफलता अर्जित की और आज भी उनकी पहचान कायम है।

5. नीर क्षीर विवेक-

स्वामी विवेकनद का एक प्रसंग बहुत ही प्रसिद्ध है एक बार किसी विदेशी ने उनसे पूछा कि आपके यहाँ धन की देवी माता लक्ष्मी की सवारी उल्लू और विद्या की देवी सरस्वती की सवारी हंस क्यों है क्या इसके पीछे कोई कारण है।

तो इसका जवाब स्वामी विवेकानंद ने इस प्रकार से दिया कि उल्लू से तात्पर्य है कि लक्ष्मी अथवा धन वैभव को प्राप्त करना बहुत आसान है। इसे कोई भी आसानी से प्राप्त कर सकता है। लेकिन बुद्धि विवेक ज्ञान वही व्यक्ति पा सकता है जो हंस की तरह बनेगा।

क्योंकि हंस मे एक गुण होता है जिससे वो दूध मे मिले हुए पानी को अलग कर केवल दूध को ग्रहण करने की क्षमता रखता है। जिसे नीर क्षीर विवेक के नाम से जानते है।

उसी प्रकार ज्ञान विवेक शील व्यक्ति मे अच्छे और बुरे को अलग करने उनमे अंतर करने का गुण व्याप्त होता है। और वही व्यक्ति सही मायने मे सफल व्यक्ति है।

6. आत्म संतुष्टि-

और एक सफल इंसान का सबसे प्रमुख गुण ये होता है कि वो व्यक्ति आत्म संतुष्ट हो लेकिन आत्म संतुष्टि को इस रूप मे नहीं देखना चाहिए कि कोई व्यक्ति निकर्मण्य हो।

बल्कि आत्म संतुष्ट व्यक्ति अपने कर्म से कभी विचलित नहीं होता है, वो अपने कर्तव्यों का पालन बड़ी ही निष्ठा से करता है। और जो भी परिणाम उसके कर्म के उपरांत प्राप्त होता है उस परिणाम से वो व्यक्ति संतुष्ट महसूस करता है।

उसने निराशा का बिलकुल भी नामो निशान नहीं रहता है। यदि कोई कमी का एहसास भी होता है तो वो बस उनमे सुधार करने का प्रयास करता है। और दूसरों के जीवन शैली को देख कर विचलित नही होता है।

7. समय का सम्मान-

जो भी व्यक्ति समय के साथ चलता है। उसका सम्मान करता है वो व्यक्ति जीवन मे बहुत ही सफल होता है। समय का सम्मान से तात्पर्य है कि नियमित दिनचर्या मौसम देश काल परिस्थिती इत्यादि भी उसके संयमित जीवन मे बदलाव न कर सके।

वही व्यक्ति समय का असली अनुयायी माना जा सकता है। और ऐसे व्यक्ति जानते है कि समय एक निर्बाध गति से चलने वाला अवयव है और हमे इसके अनुसार ही जीवन यापन करना चाहिए न कि इसे टालने का प्रयास करना चाहिए। ऐसे व्यक्ति ही अपने जीवन मे सफल व्यक्तियों की श्रेणी मे आते है।

निष्कर्ष

सफलता को जब तक हम प्रतिस्पर्धा के रूप मे देखेंगे तब तक हम असल मायने मे सफल नहीं हो सकते और उपरोक्त मूल तत्वों के अनुशरण के द्वारा जीवन मे सफलता का अनुभव करते रहेंगे।

सफलता का मूल अर्थ ही है एक निर्धारित लक्ष्य की प्राप्ति करना है न कि एक लक्ष्यहीन परिणाम के पीछे बिना किसी दिशा के दौड़ लगते रहना है। सफलता को आप नहीं चुन सकते बल्कि आपकी जीवन शैली ही आपको जीवन मे सफल बनाती है।

हमारा प्रयास बस इतना होना चाहिए कि उपरोक्त तत्वो के अनुसार हम अपने कर्तव्यों का निर्वहन करे और एक सदचरित कर्मशील जीवन का निर्वहन करे। जब आप इसके जरिये एक सफल व्यक्ति के श्रेणी मे आएंगे तब लोग आपका आपके जीवन शैली का अनुशरण करेंगे।

||इति शुभम्य||

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