सफलता और संतुष्टि: जीवन में एक सिक्के के दो पहलू

सफलता और संतुष्टि: जीवन में एक सिक्के के दो पहलू- संसार का हर इंसान अपने जीवन के हर क्षेत्र में सफलता की प्राप्ति हेतु ही प्रयासरत रहता है। या ये भी बोला जा सकता है कि काल्पनिक सफलता के लिए प्रयासरत रहता है। सफलता मिलने से तात्पर्य ये नहीं आप के अपने जीवन में समस्त भौतिक संसाधनों को प्राप्त कर सकते हैं। बल्कि आप अपने जीवन से कितना संतुष्ट है यही सफलता का असली मानक है। प्रायः हम सफलता और संतुष्टि को एक रूप में देखने का प्रयास करते है। जो की हमारी मिथ्या है। सफलता और संतुष्टि में जमीन और आसमान का अंतर है। इस लेख के द्वारा हम जानने का प्रयास करेंगे की सफलता और संतुष्टि किस प्रकार एक दूसरे से भिन्न है। और संतुष्टि ही सफलता का वृहद और साकार रूप है।

भौतिकता में सफलता की खोज एक मिथ्या- मनुष्य हमेशा अपने लिए भौतिक सुख कि कामना करता है। जब कभी भी उसे इन भौतिक सुखों कि प्राप्ति होती है वो अपने आप को सफल मानता है। और जब भौतिक सुखों मे कमी देखता है तो अपने आप को असफल मानता है। पर अगर हम अपने आस पास देखे तो ऐसे लोग अवश्य दिख जाएँगे। जिनके लिए भौतिक सुखों को प्राप्त करना तो बहुत ही आसान है लेकिन वो अपने जीवन को किसी न किसी रूप में असफल जीवन के रूप में देखतेन है। उदाहरण के लिए इंसान अपना पूरा जीवन पैसे कमाने और उनका उपभोग करने मे लगा रहता है। और बहुत सारे भौतिक सुखों को प्राप्त कर लेने के बाद भी कहीं न कहीं उसे लगता है कि उसके जीवन में कहीं न कहीं कोई न कोई कमी है।

संतुष्टि और सफलता में अंतर- सही माने में संतुष्टि और सफलता एक दूसरे के पूरक है। लेकिन अगर वर्तमान परिपेक्ष्य में देखे तो हमने इन दोनों कि परिभाषा और स्वरूप को इतना भिन्न कर दिया है कि इनमे अंतर देखने को मिल रहा है। असल में सफलता का मार्ग हमें संतुष्टि के लक्ष्य तक ले जाता है। लेकिन आज के समय में भौतिक सुखों पर निर्भरता हमे संतुष्टि से विमुख कर रही है। और सफलता की परिभाषा भी बादल रही है। जब हम हमारे जीवन में आवश्यकताए तो महत्वपूर्ण है लेकिन इच्छाओं को हम महत्व नहीं देते। तब हम समझ सकते है हम संतुष्टि के लक्ष्य को प्राप्त कर सकते है। और इसे ही असली सफलता मानी जानी चाहिए। भौतिक सुखो कि चाह रखकर यदि हम सफलता की चाह रकेंगे तो ये हमारा बस एक मतिभ्रम होगा।

इच्छा और आवश्यकता में अंतर- मानव को क्या किसी भी जीव को अपना जीवन जीने के लिए उसकी कुछ आवश्यकताए होती है। जबकि इच्छायें मानव जीवन के लिए अनिवार्य नहीं है। प्रायः हम ये जानने में गलती करते है और इच्छा एवं आवश्यकता को एक ही श्रेणी में रख कर देखते है। उदाहरण के रूप में देखे तो हमे जीवन यापन हेतु भोजन, जल, वायु, छत एवं वस्त्र इत्यादि की आवश्यकता पढ़ती ही। अपवाद स्वरूप भले देख सकते है कि कुछ ऋषि मुनियों ने अपने ताप बल पर इन आवश्यकताओं की अनिवार्यता को खत्म कर दिया है।

लेकिन सामान्य जन समूह को इन आवश्यकताओं की पूर्ति की अनिवार्यता होती है। वही बात करें इच्छाओं की तो इसे ऐसे देख सकते है कि अगर दो वक्त की दाल रोटी, एक साधारण वस्त्र, एक छोटी कुटिया से हमारा जीवन अच्छे से निर्वाह हो सकता है। लेकिन हमे इसकी जगह पर कई तरह के पकवान, रेशमी वस्त्र और महल जैसे आवास इत्यादि की लालसा होती है तो इसे ही हम इच्छा के रूप में देखते है।

संतुष्टि की आवश्यकता- भौतिक जगत हमे अपनी ओर आकर्षित करता है। जिसके कारण हमारी इच्छाएं हमेशा बढ़ती रहती है। एक इच्छा पूरी होते ही हमारी लालसा और बढ़ जाती है। तथा दूसरी तत्काल प्रभाव से दूसरी इच्छा का जन्म हो जाता है। तथा ये प्रक्रिया अनवरत रूप में बढ़ती ही रहती है। जिसके फलस्वरूप हमे अपने जीवन में दुखी ही रहते। हमारे जीवन में कितने भी भौतिक सुख क्यों न हो लेकिन हमारे जीवन में असंतोष हमेशा बना रहता है। जो दुख का सबसे प्रमुख कारण है। इसी असंतोष को खत्म करने के लिए हमे संतुष्टि की आवश्यकता होती है जो हमे एक सुखी और आदर्श जीवन प्रदान करे।

असंतोष ही सभी बुराइयों का मूल- अगर हम दूसरे नजरिए से देखें तो असंतोष ही हमारे जीवन में बुराइयों को जन्म देता है। जब हमारी इच्छाएं पूर्ण नहीं होती तो किसी न किसी रूप में हमारे मन में असंतोष की भावना उत्पन्न होती है। और उस इच्छा की पूर्ति हेतु हम किसी भी मार्ग को अपनाने को तैयार हो जाते है। उदाहरण रूप में देखे मान लीजिये हमने अपने पड़ोसी के पास कोई वस्तु को देखकर हमारे मन में वो वस्तु को प्राप्त करने की इच्छा उत्पन्न हुई। और हम जानते है की उस वस्तु को पाना हमारे क्षमता से परे है। तो उस इच्छा की पूर्ति हेतु हम आपे आप क्गलत मार्ग को अपना लेते है जो हमे आदर्श जीवन से विमुख करके बुराइयों के मार्ग के ओर ले जाता है।

संतुष्टि की प्राप्ति कैसे हो- अब बात आती है की संतुष्टि अगर इतना आवश्यक है तो इसकी प्राप्ति कैसे किया जाये। तो इसके लिए कोई तप करने की आवश्यकता नहीं बल्कि हमे अपने जीवन शैली में एक स्थिरता लाने की आवश्यकता है। दूसरे विषय वस्तु को देखकर अपने जीवन शैली को बदलने की इच्छा नहीं रखना चाहिए और न ही दूसरे की जीवन शैली का आप पर प्रभाव पड़ना चाहिए। आदर्श जीवन का स्वरूप भी इसी प्रकार होता जो हमारे पास है वही हमारा है। जो हमारे पास नहीं उसके बगैर हमारा जीवन व्रत नहीं है। बल्कि ये विचार होना चाहिए कि उसके बगैर भी हमारा जीवन बहुत ही खुशहाल है। उपरोक्त से ये अनुमान बिलकुल नहीं होना चाहिए की आप कर्महीन हो जाये बल्कि आप गीता में बताए आदर्शों जैसे कर्म करें फल की चिंता न करें, को अपने जीवन में अनुसरण करना चाहिए।

निष्कर्ष

उपरोक्त तथ्यों के आधार पर हम कह सकते है कि सफलता को हम संतुष्टि से अलग करके नहीं देख सकते। लेकिन आधुनिक जीवन शैली, आधुनिक परिवेश के कारण ये दोनों हमे दो कारक लगते है। जबकि जीवन में संतुष्टि ही असली सफलता कि द्योतक है। अगर हम अपने जीवन में संतुष्ट है तभी हमें मानना चाहिए कि यही हमारे जीवन की असली सफलता है। वरना तो इंसान का सम्पूर्ण जीवन केवल तीन पाँच में खत्म हो जाता है। प्रायः हम देखते है आर्थिक रूप से समृद्ध इंसान अपना पूरा जीवन सुखों की खोज में भटकता रहता है और अंत में उसे उसकी प्राप्ति नहीं होती और दूसरी तरफ साधारण जीवन यापन करने वाला भौतिक संसाधन न होने के बावजूद भी अपना सम्पूर्ण जीवन खुशी खुशी व्यतीत करता है। इन दोनों के मध्य केवल संतुष्टि ही एक कारक है जो इन्हे खुशहाल और दुखी जीवन अनुभव करती है।

!इति शुभम्!

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