नर सेवा करने वाला ही असली नायक (Real Hero)

मानवता के कुछ प्रमुख गुणो की बात की जाये तो उनमे सबसे प्रमुख कारक है सेवा भाव और सेवा भाव ही हमे असली मानव के स्वरूप को पहचान देती है। किसी साधु की बात हो या फिर कोई भी महापुरुष उसमे सबसे प्रमुख गुण रहा है सेवा भाव का गुण और इसीलिए एक असली नायक (Real Hero) की भी पहचान इसी से होती है कि उसमे सेवा भाव विद्यमान है या नहीं। आज हम बात करेंगे नर सेवा क्या है और और ये कैसे एक साधारण मनुष्य को भी जन मानस की नजरों मे भी असली नायक बना देता है।

[su_heading size=”22″]करुणा और दया सेवा भाव का मूल[/su_heading]

हम बात करे कि किसी मनुष्य मे सेवा भाव उत्पन्न कैसे होता है। कैसे कोई मनुष्य किसी जीव के प्रति सेवा करने को प्रेरित होता है तो इसके लिए सबसे प्रमुख कारक है करुणा और दया। जब भी हम किसी जीव को संकट या किसी परेशानी मे देखते है तो हमारे मानस पटल मे उनके प्रति करुणा एवं दया का उत्पन्न होना अति आवश्यक है। तभी हम सेवा भाव को अपने जीवन मे आत्मसात कर सकते है।
उदाहरण के तौर पर अगर कोई व्यक्ति किसी संकट मे घिरा हुआ रहता है। और उसकी परेशानी को देखकर आप द्रवित हो उठाते है और अपने सामर्थ्य के अनुसार उसकी हर संभव मदद करने को तत्पर रहते है उसकी परेशानियों को अपना मानकर उसका उपाय डुंधते है तथा उस परेशानी को हल करते है तो आपमे सेवा भाव कहीं न कहीं अवश्य है।

[su_heading size=”22″]नर सेवा ही नारायण सेवा- स्वामी विवेकानंद[/su_heading]

सेवा भाव के संबंध मे एक प्रसंग याद आता है। अपने किशोरावस्था मे स्वामी विवेकानंद एक नास्तिक व्यक्ति थे। स्वामी रामकृष्ण परमहंस के सानिध्य मे इन्हे दिव्यज्ञान के जरिये परमसत्ता के बारे मे जानने की इच्छा हुई। और इन्होने अपना नाम नरेंद्र से बदलकर विवेकानंद रखा और ईश्वर के ज्ञान की पिपाशा लिए हिमालय की तरफ चल दिये वहाँ पहुँचने से पहले इनके मन मे प्रश्न उठा। क्या ये सही मार्ग होगा या फिर समाज मे रहकर ही दीन दुखियों की सेवा करना उचित होगा और इन्होने हिमालय से वापस आने का निर्णय लिया और एक मूल मंत्र को गांठ बना ली कि नर सेवा ही असली नारायण सेवा है।

[su_heading size=”22″]असली साधु, महापुरुष की पहचान है सेवा भाव[/su_heading]

एक साधु अथवा सन्यासी कि बात करे तो ये अपना नाम तक त्याग चुके होते है। यहाँ तक कि सांसरिक मोह माया से इनका कोई लेना देना नहीं होता है लेकिन फिर भी एक साधु का परम कर्तव्य होता है। समाज मे जन मानस के दुखो का निवारण करना और उनकी परेशानियों को समाप्त करना। महापुरुष की पहचान भी इसी से बनती है जब कोई साधारण व्यक्ति लोगो के दुखो को समझे उनकी पीड़ा को महसूस करे और उनके हितों की बात करे तो उसमे करुणा कि भावना अवश्य होती है। और इसके फलस्वरूप जब वो व्यक्ति दुखियो की सेवा के लिए हर समय उपस्थित रहे तो वही व्यक्ति समाज मे महापुरुष की उपाधि धरण करता है। और असली नायक कहलाता है।

[su_heading size=”22″]ब्रह्मज्ञानी एवं तत्वज्ञानी का मूल सिद्धान्त सेवा भाव[/su_heading]

ब्रह्मज्ञानी और तत्वज्ञानी उन्हे कहते है जो संसार के समस्त पदार्थ जीव इत्यादि को किसी एक परम तत्व की सत्ता मानते है अथवा उन्हे परम सत्ता का अभिन्न अंग मानते है। जैसे आदि शंकरचार्य के अनुसार हम सभी उसी परम ब्रह्म के की अंश है जो माया एवं अज्ञानता के कारण उनसे विरक्त महसूस करते है। इनके लिए हर जीव जन्तु और पदार्थ उसी परम सत्ता का ही अभिन्न अंश है अतः इनके प्रति दया और करुणा का भाव उत्पन्न होना अति आवश्यक है। और इनकी सेवा करना ही उस परम सत्ता की सेवा के बराबर माना जाएगा।

[su_heading size=”22″]सभी कर्मो से उच्च सेवा भाव[/su_heading]

सेवा भाव अथना नर सेवा को सभी कर्मो मे उच्च माना गया है। श्रीमद्भगवद्गीता के अनुसार भी निष्काम कर्म ही सर्वश्रेष्ठ कर्म है और यही हमारे ईश्वर कृपा के लिए आवश्यक तत्व है। और जब किसी मनुष्य मे सेवा भाव, करुणा और दया की भावना होती है तो वो अपने स्वार्थ की चिंता नहीं करता बल्कि निस्वार्थ भाव से जीव की सेवा का कर्म करता है इसलिए सेवा भाव सभी कर्मो मे सर्वश्रेष्ठ है। और इसका अनुशरण करना ही मानव का परम धर्म होना चाहिए। इससे अधिक पुण्य की प्राप्ति कहीं और नहीं प्राप्त हो सकती है।

[su_heading size=”22″]वर्तमान समय मे सेवा भाव की महत्ता[/su_heading]

अगर तटस्थ रूप मे देखा जाये तो वर्तमान समय मे सेवा भाव की बहुत कमी दिखती है। और इसका मूल कारण है। मनुष्य मे स्वार्थ भाव का अधिकाधिक प्राभव होना। स्वार्थ और केवल अपने हितों की परवाह करने से हम सेवा भाव की भावना से विमुख होते जा रहे है। बहुत सारे लोग बोलेंगे की आज भी वो गरीबो की सेवा करते है और उनका सहयोग करते है। दीन दुखियों का सहयोग करते है लेकिन उनसे मेरा सिर्फ एक ही प्रश्न है। कि जब वो किसी गरीब या दीन दुखी की सेवा करते है तो उनके मन मे किस प्रकार के भाव अथवा विचार रहते है।
आज के समय मे जन सेवा करते समय आपके भाव अथवा विचार ही तय करते है कि आप सच मे सेवा भाव का नौशारण कर रहे है या फिर ये सिर्फ एक आडंबर मात्र है। देखिये दो तरह के विचार हमारे मन मे होते है जब हम किसी की सेवा करते है। प्रथम हम अमुक का भला करेंगे तो मेरे साथ ये अथवा कुछ अच्छा होगा और दूसरा भाव जब हम किसी को दुखी अथवा असहाय देखते है तो स्वाभाविक रूप से ही हमारा मन द्रवित हो जाता है। और हम बिना कुछ विचार उत्पन्न किए ही उस जीव की सेवा और सहयोग को प्रेरित होते है।

निष्कर्ष-

इस संसार मे कोई भी पूर्ण रूप से न तो सुखी है और न ही पूर्ण रूप से दुखी सबमे सुख दुख बराबर बराबर रूप से विद्यमान है। फिर भी लोगो को सामाजिक तौर पर ही समाज मे एक रहने के लिए एक दूसरे के हित अहित उनके सुख दुख को समझना आवश्यक है। हम अपने स्वार्थ मे पूरी तरह से तललेन हो जाएँगे और यदि हर प्राणी भी ऐसा ही विचार रखने लगे तो समाज बिखर जाएगा लोग एकाकी जीवन की ओर अग्रसर हो जाएँगे और एकाकी जीवन जीना किसी भी जीव के लिए संभव नहीं है। सेवा भाव की भावना हमे मिलनसार बनती है। किसी की सेवा करने के उपरांत मन मे एक संतुष्टि मिलती जो हमे आंतरिक रूप से आनंदित करती है। अतः सेवा भाव को अपनाए और नर सेवा को ही नारायण सेवा मानकर जीवन को आनंदित बनाएँ।

||इति शुभम्य||

Leave a Comment