रामायण के कुछ प्रेरणादायक प्रसंग भाग 1- राम की शालीनता (दार्शनिक विवेचना)

Ramayan- Kissa Kahani

भारतीय सनातन परंपरा मे जीतने भी शास्त्र या धार्मिक ग्रंथ है वो हमे धर्म मे निहित नियमो और निर्देशों के साथ साथ कई प्रसंगों के जरिये भी कई प्रेरणादायक बातें बताते है जो हमे जीवन के सही मार्ग के अनुशरण करने मे बहुत ही सहयोगी साबित होते है।

आज हम इसी के अंतर्गत रामायण के कुछ प्रसंग की बात करेंगे जो हमे जीवन आदर्शों के बारे मे बताएँगे और हमे अच्छे जीवन यापन के प्रति प्रेरित करेंगे। इस विषय को हम किसी एक लेख के जरिये नहीं बता सकते इसलिए इसके कई अन्य लेख भी आपको समय के साथ देखने को मिलेंगे। चलिये अब हम अपने विषय पर आते है।

राम की शालीनता-

रामायण की कथा मे यदि बात की जाये राम के चरित्र की तो हम एक बात देखेंगे कि कैसी भी परिस्थिति हो राम ने अपने स्वभाव से नियंत्रण कभी भी नहीं खोया। चाहे वन गमन की बात हो या फिर रामायण से युद्ध या फिर लंका पर विजय की हर जगह उन्होने अपनी शालीनता का परिचय दिया है। उनमे से कुछ प्रसंग इस प्रकार से है।

निषाद राज गुह से गंगा पर करने हेतु अनुरोध-

जब राम को 14 वर्ष के वनवास का आदेश हुआ तो उन्होने बिना किसी विरोध के जंगल जाने के लिए तैयार हो गए उनके साथ यूने छोटे भाई लक्ष्मण और उनकी पत्नी सीता भी जाने को तैयार हुई। राजा दशरथ के मंत्री सुमंत पूरे साजो समान के साथ उनके साथ गए लेकिन राम ने उनको और अन्य अयोध्या वासियों को भेज दिया और अपने मित्र निषाद राज गुह के यहाँ रात्रि प्रवास कर अगले दिन गंगा उस पार जाने हेतु उनसे अनुरोध किया।

यहाँ ये बात समझने वाली है कि साकेत के महाराज दशरथ के पुत्र राम किसी को भी आदेश दे सकते थे अपने क्योंकि वो सम्पूर्ण साम्राज्य के मुखिया के पुत्र थे लेकिन उन्होने निशादराज गुह को आग्रह किया कि वो उन्हे उस पार पहुंचाए। ये सच मे बहुत ही अच्छा व्यक्तित्व है की अपनी पद प्रतिष्ठा का अभिमान त्याग कर हर किसी को सम्मान प्रदान करना जो कि राम ने निषाद राज गुह को दिया।

समुद्र से अनुरोध-

सुंदर कांड का ये प्रसंग मुझे बहुत ही अच्छा लगता है कि एक सर्व शक्तिशाली समस्त सृष्टि के पालनहार के अवतार प्रभु श्री राम को जब समुद्र पार जाना होता है तो वो विभीषण की आग्रह को मान कर समुद्र से मार्ग मांगने के लिए उनसे अनुरोध करते है। इस बात से उनके भाई लक्ष्मण दुखी भी होते है और प्रभु श्री राम से कहते है कि समुद्र से प्रार्थना करना व्यर्थ है। इससे अच्छा होगा कि आप धनुष उठाए और इसके जल को सोख ले।

लेकिन श्री राम ने लक्ष्मण को समझाया पहले हमे समुद्र से प्रार्थना करके ही उनसे मार्ग मांगना चाहिए। और यदि उसके बाद भी मार्ग नहीं प्रपट होता है तब हम तुम्हारे कहे अनुसार करेंगे। और तीन बीतने के बाद भी जब समुद्र से कोई जवाब नहीं मिला तब प्रभु ने धनुष उठाया। इससे ये सीख मिलती है कि हमे सर्वप्रथम शालिन भाव से ही अपने मार्ग मे आगे बढ्न चाहिए हमेशा आवेश मे रहना उचित नहीं।

रावण से अनुरोध-

अगर हम रामायण की कथा को ध्यान से देखेंगे तो पाएंगे कि राम ने एक नहीं बल्कि कई बार रावण से युद्धह के बगैर सीता को वापस करने को कहा सर्वप्रथम स्वयं हनुमान जी ने रावण से अनुरोध किया उसके बाद बालि पुत्र अंगद को भी भेजा गया दूत बना कर और जब इन प्रयासों के उपरांत भी रावण ने अपने हठ को नहीं छोड़ा। तब जाकर उन्होने युद्ध किया हम सभी जानते है कि स्वयं भगवान विष्णु के अवतार जिनके लिए कुछ भी असंभव नहीं फिर भी उन्होने रावण से सीता के वापसी का रावण से अनुरोध किया।

शत्रु के प्रति भी भावना-

मानवता की सम्पूर्ण मूरत के रूप मे राम को माना जाए तो ये कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी उन्होने सभी को बहुत ही निश्छल भाव और प्रेम पूर्वक व्यवहार किया चाहे शत्रु हो क्या कोई और उन्होने भावनाओं का बहुत ही ज्यादा ध्यान दिया।

जब विभीषण रावण के द्वारा भगाये जाने के उपरांत प्रभु श्री राम के शरण मे आते है तो सुग्रीव ने कहा कि शत्रु के भाई का कोई भरोसा नहीं तो इस पर श्री राम कहते है कि वो कोई भी हो अगर मेरे शरण मे आए है तो मुझे उन्हे अपनाना ही पड़ेगा। मुझे अपने व्यवहार मे कोई बदलाव नहीं लाना चाहिए।

वही दूसरे प्रसंग मे जब मेघनाद का वाढ हो जाता है तो उसकी पत्नी सुलोचना अपने पति के सिर की मांग करने आती है तो श्री राम बड़े ही सम्मान के साथ मेघनाद का सिर उसकी पत्नी को वापस कर देते है। ऐसे कई प्रसंगों पर राम ने अपनी शालीनता का परिचय दिया है।

सार-

आज के समाज मे हम अगर देखें तो पाएंगे थोड़े से शक्ति और पद प्रतिष्ठा के प्राप्त होने के उपरांत ही लोगो के स्वभाव और उनके व्यवहार मेपरिवर्तन देखने को मिलने लगता है। आज के समय मे इस प्रकार के प्रसंग बहुत ही प्रासंगिक है। और इनसे हमे सीख लेने की आवश्यकता है।

रामायण की कथा मे उपरोक्त के अलावा भी कई अन्य जगहों पर भी राम की शालीनता का परिचय देखने को मिला है। राम सीता के विवाह के समय भी जब परशुराम के क्रोधित होने के उपरांत भी राम ने अपने व्यवहार मे कोई परिवर्तन नहीं किया या फिर उनके वन जाने के वचन की पूर्ति करने के समय भी उन्होने खुशी खुशी इस वचन की पूर्ति की। जो कि आज के समय मे कई भी देखने को नहीं मिलेगा। आने वाले लेखों मे भी हम और भी ग्रन्थों धार्मिक कहानियों के जरिये प्रेरणादायक प्रसनों की चर्चा करेंगे।

||इति शुभम्य||

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