धर्मानुसार राम, रावण विभीषण का चरित्र चित्रण।

रामायण की कथा पूरे विश्व मे विख्यात है। और बात अगर भारतवर्ष की हो तो रामायण की कथा जन जन के मानस मे कंठस्थ है। हम सभी के मन में राम, रावण, विभीषण आदि समस्त रामायण के किरदारों के चरित्र का चित्रण हो रखा है। लेकिन प्रायः देखा जाता है कई अवसरों पर राम को उनके धर्म के पालन करने के रास्ते पर प्रश्न उठाया जाता है। रावण को लेकर भी यही भावना लोगो के मन में है। पापी होने के उपरांत भी रावण का महिमामंडन किया जाता है। विभीषण द्वारा सत्य और धर्म का पालन करने के उपरांत भी उनके व्यावहारिक जीवन के बारे में बहुत सारी अनर्गल बाते की जाती है। यहा तक उनके नाम पर लोकोत्ति घर का भेदी लंका ढाये एवं विभीषण जैसे अधर्मी भाई की बात की जाती है। इसी के कारण इस लेख को लिखने का विचार आया। वर्तमान समय में रामायण के प्रति नई पीढ़ी की पुनः रुचि उत्पन्न होने के कारण (lockdown और COVID-19 महामारी के दौर मे) पुनः धर्म के आधार पर इनके चरित्र के बारे मे अपने विचार प्रकट करने का मन हुआ।

धर्म

सर्वप्रथम हम बात करेंग धर्म की उपरोक्त लिखित शीर्षक के आधार पर जो भी लेख प्रस्तुत होगा उसको जानने समझने के लिए सर्वप्रथम आपको धर्म की परिभाषा को समझना पड़ेगा। अब धर्म को समझने के लिए हम किसी श्लोक का प्रयोग कर सकते है। महाभारत जैसे महाकाव्य में धर्म को परिभाषित करने के लिए कई श्लोको का प्रयोग किया गया है। कहीं कर्म के पालन को धर्म की परिभाषा दी गई है। कहीं उदारता को धर्म के रूप मे परिभाषित किया गया है। काही दंड को धर्म के रूप में परिभाषित किया जा सकता है। ऐसे कई खंडों में धर्म को परिभाषित किया जा सकता है। लेकिन यदि पृथक पृथक रूप में इन परिभाषाओं को लेकर हम धर्म को सिद्ध करने का प्रयास करेंगे तो उसकी मूल अर्थ व्यक्त नहीं होगा। इसलिए धर्म को परिभाषित करने के लिए व्याकरण के आधार पर इस देखेंगे। व्याकरण के अनुसार धर्म का मूल अर्थ है। धारण करने योग्य। अब उपरोक्त महाभारत की परिभाषा को इसके साथ जोड़कर देखेंगे। कर्म जो धारण करने योग्य हो, उदारता जो धारण करने योग्य हो, और दंड की प्रक्रिया जो धारण करने योग्य हो। तो प्रश्न ये उठता है क्या धारण करने योग्य है। तो धारण करने योग्य विषय वस्तु को हम सत्य, नीति, क्षमा, विद्या, दान, ज्ञान के आधार पर आकलन करेंगे और उन्हे ही धर्म के रूप मे अनुग्रहण करेंगे।

धर्मानुसार राम का चरित्र

वैसे तो हम सभी राम को मर्यादा पुरुषोत्तम के रूप में देखते है। लेकिन कई प्रसंगों में हमारी मति उनके किए व्यवहार पर प्रश्न खड़ा कर देते है। जैसे जब बात बालि के वध का प्रसंग आता है तो हम ये प्रश्न कर सकते है। तो यहाँ ये प्रसंग को जानना आवश्यक है कि बालि के द्वारा भी ये प्रश्न श्रीराम से पूछा जाता है की ये मामला दो भाइयों की आपसी शत्रुता का है और आप के द्वारा छल द्वारा मुझे मृत्यु प्रदान करना कहाँ तक उचित है। तो इसका जवाब स्वयं प्रभु देते है कि जो व्यक्ति अधर्म का पालन कर रहा हो उसे अपने ऊपर आए विपत्ति के समय धर्म की बाते करना उचित नहीं है। अनुज की पत्नी को अपहरण कर लेना, भाई के राजपाट से अलग कर देना कोई धर्म का पालन नहीं किया गया है इस प्रकार तुम यदि धर्म का पालन करने की बात करते हो तो मै अयोध्या के राजा का अग्रज हूँ और समस्त पृथ्वी इक्ष्वाकु वंश के शासन के अधीन है। अतः मुझे दंड देने का पूरा अधिकार है। तो इस प्रसंग मे राम ने धर्मानुसार अपने कर्तव्यों का और मित्र धर्म का पालन किया है। दूसरा प्रसंग वनवाश उपरांत अयोध्या के राजा बनने के उपरांत उनके राज्य के लोगो के द्वारा सीता पर किए गए प्रश्न के उपरांत राम के द्वारा सीता को त्याग करने का प्रसंग भी कई प्रश्न आपके बुद्धि द्वारा सृजित होते है। इस प्रश्न का जवाब दिया जाये तो तो यहा प्रसंग करना चाहूँगा उस समय का जब महर्षि विश्वामित्र राम लक्ष्मण को अपने साथ ले जाने के लिए आते है तब एक बारगी राजा दशरथ द्वारा उन्हे भेजने के लिए मना कर दिया जाता है। तो स्वयं विश्वामित्र द्वारा राजा होते हुए केवल प्रजा के बारे में सबकुछ सोचना चाहिए, राजा होते हुए किसी भी रूप में राजधर्म का परित्याग कर कुटुंब आसक्ति दिखाना धर्म के विरुद्ध मना जाता है। अतः जब प्रभु श्रीराम द्वारा अपने प्रजा के प्रश्नो को उचित उत्तर देना मुनासिब नहीं हुआ तो राज धर्म का पालन करते हुए अपने पत्नी सीता का परित्याग करना पड़ा। अगर प्रश्न बंता है तो उस प्रजा पर जो अपने राजा के कुटुंब पर राशन उठाता है जिससे प्रजा को न तो कोई हानी हो रही है और न ही उसके कारण राजा द्वारा राजधर्म के पालन मे कोई अडचन आ रही है।

धर्मानुसार रावण का चरित्र

वैसे तो हर वर्ष दशहरा के दिन रावण के विशालकाय पुतले का दहन हम करते है और असत्य पर सत्य की विजय के रूप में इस पर्व को हर्षोल्लास के साथ मनाते है। लेकिन जब बात हमारे बुद्धि की आती है तो हम रावण के प्रति भी थोड़ी सहानुभूति पैदा कर लेते है और उसके द्वारा किए गए कृत्यों को उसके चरित्र के आधार पर छुपाने का प्रयास करते है। लोग कहते है रावण एक महान ज्ञानी पंडित था। तो इसके संबंध में हम श्री मदभगवद्गीता के अध्याय 4 श्लोक 19 का वर्णन करना चाहूँगा।

यस्य सर्वे समारम्भाः कामसङ्कल्पवर्जिताः। ज्ञानाग्निदग्धकर्माणं तमाहुः पण्डितं बुधाः।।

अर्थात सामान्य शब्दों मे कहे तो जो व्यक्ति बगैर किसी कामना के और और निम्न संकल्पों से विरक्त होकर ज्ञान रूपी अग्नि में अपने सर्वस्य को समर्पित करता है वही असली पंडित होने का उत्तराधिकारी है। अतः हम कह सकते है कि रावण भले ही समस्त प्रकार के ज्ञान से परिपूर्ण हो लेकिन उसने हमेशा ही किसी कामना के तहत ही अपनी बुद्धि ज्ञान का प्रयोग किया। एक पापी को किसी भी रूप मे धर्मानुसार पंडित की श्रेणी मे नहीं रखा जा सकता है। भले ही रावण का जन्म एक ऋषि के घर हुआ था लेकिन उस पर प्रभाव उसकी माता का था जो की एक राक्षस की कुल से संबंध रखती है। और व्यक्ति के वर्ण का अनुमान उसके कर्म के आधार पर करना चाहिए न कि उसके जन्म के आधार पर। खुद वाल्मीकि रामायण के आधार पर कई प्रसंगो के द्वारा रावण के त्याचारों का वर्णन किया गया है। यहा तक की उसने अपने स्वार्थ की पूर्ति हेतु अपने समस्त परिवार के हितों का भी ध्यान नहीं रखा। अतः किसी भी रूप में हम रावण के चरित्र को अच्छा बताने का प्रयास करते है। तो ये हमारे बुद्धि के तुच्छ स्वरूप को ही प्रदर्शित करता है।

विभीषण का चरित्र

रामायण का इकलौता पात्र है विभीषण जिसने जीवन पर्यंत सत्य, नीति और धर्म का पालन किया उसे आज का समाज निम्न कोटि के व्यक्ति के रूप में देखता है। हम बात करेंगे उन प्रसंगो का जिसके आधार पर विभीषण के चरित्र का हनन करने का प्रयास किया गया है। सर्वप्रथम बात की जाये तो देखेंगे लगभग सभी लोग विभीषण को भ्राता धर्म के विरुद्ध होने की बात करते है। तो अगर सम्पूर्ण रामायण के प्रसंग की बात की जाये तो विभीषण से अच्छा भ्राता हो ही नहीं सकता क्योंकि अनीति अधर्म के रास्ते में होने के उपरांत भी रावण को विभीषण ने धर्म के आधार पर सीता को ससम्मान राम को लौटने की बात की विभीषण ने अपने प्राणो की परवाह किए बगैर भी रावण के समक्ष धर्म पालन की बात काही अब इससे अच्छा भाई कहा हो सकता है जो अपने शक्तिशाली भाई के सामने बिना किसी भय से उसे धर्म के पालन के लिए कहा। दूसरी बात विभीषण स्वयं राम के पास नहीं गए बल्कि रावण द्वारा उन्हे राज्य से भगा दिया गया उसके उपरांत ही वो राम के शरण मे गए। हमारे समाज मे बड़ी आसानी से विभीषण को बहुत ही गलत रूप मे प्रदर्शित कर दिया जाता है। लेकिन एक बार समाज को देखना चाहिए कि यदि एक व्यक्ति आज के समय मे कोई कार्य विधि विरुद्ध करता है और यदि उसके परिवार का सदस्य उसका बचाव भी करता है तो उसे हम गलत मानते है। आप कोई भी घटना को लेकर इस उदाहरण को रख कर देख सकते है। और फिर अपने बुद्धि से पुछे यदि विभीषण भी अपने अधर्मी भाई का साथ देते तो क्या हम उसे ज्यादा अच्छा भाई मानते। हमे खुद समझना चाहिए विभीषण जब सर्वप्रथम श्रीराम के शरण मे जाते है तो स्वयं हनुमान जी उनके धर्म गामी होने की वकालत करते है अतः विभषण को अधर्मी और अच्छे भाई न होने की व्याख्या करना व्यक्ति के अुच्छ मानसिकता का उदाहरण देती है।

निष्कर्ष

हमारी बुद्धि है जैस्पर किसी भी प्रकार का नियंत्रण लगाना संभव नहीं है। लेकिन कुतर्क का त्याग कर तर्क और नीतियों को संज्ञान मे लेते हुए हम अपने बुद्धि को सही मार्ग पर रख सकते है। इसी प्रकार इस लेख के द्वारा ये बताने का प्रयास किया जा रहा है कि एक समाज मे सबसे महत्वपूर्ण मानवता है। पुरुष और प्रकृति पर आधारित हमारी संस्कृति हमेशा सर्वसमाज को लेकर ही उचित और अनुचित का निर्माण करती है। और केवल कुछ तथ्यों के आधार पर हम अनुचित को उचित सिद्ध नहीं कर सकते। ये किसी भी रूप मे मान्य नहीं होनी चाहिए यहा पर तर्क का प्रभाव न होकर इन तथ्यों पर कुतर्क ही हावी होता है। किसी का पक्ष भावनात्मक रूप मे लेने से पहले नीति, उचित-अनुचित, और धर्म के बारे सोचना अति आवश्यक है तभी हम किसी सही निर्णय पर पहुँच सकते है।

||इति शुभम्य ||

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