पितृ पक्ष का महत्व एवं तर्पण विधि- पितरों को समर्पित एक पखवाड़ा

पितृ पक्ष का महत्व एवं तर्पण विधि

सनातन धर्म में आश्विन मास के कृष्ण पक्ष को पूरी तरह पितरों को समर्पित किया गया है। इस वर्ष 01 सितंबर से 17 सितंबर तक पितृ पक्ष का आयोजन किया जायेगा। सनातन धर्म मे संतानोत्पत्ति का मूल उद्द्येश्य ही यही होता है कि संतान तीन तरह के ऋणों से उन्हे तथा अपने पूर्वजों को मुक्ति प्रदान करेगा।

आज हम बात करेंगे पितृ पक्ष का महत्व एवं तर्पण विधि की तथा पितृ पक्ष के आयोजन की क्यों आवश्यकता है इसके बारे मे। सनातन धर्म मे पूर्वजों की शांति के लिए इस पखवाड़े का अलग से प्रावधान है और अगर हम इस पखवाड़े मे अपने पितरों का आह्वान करके उनका सही रूप से तर्पण करे तो हमारे पूर्वज प्रसन्न होते और घर मे खुशहाली आती है।

सनातन धर्म मे वर्णित तीन ऋण-

सनातन धर्म मे हर मनुष्य तीन तरह के ऋणों से बंधा हुआ होता है। और हमारे शास्त्रों मे भी इन ऋणों से मुक्ति की बात की गए है। जिनमे मुक्त होने के पश्चात ही हम अपने जीवन मे उऋण होते है और मुक्ति की ओर प्रसत होते है।

आत्मा परमात्मा का सबसे सटीक वर्णन सनातन धर्म मे दिया गया है और और जीवन का मूल उद्द्येश्य ही आत्मा का परमात्मा से मिलन करना है और इस उद्द्येश्य की पूर्ति हमे तीन प्रकार के ऋणों से मुक्ति प्राप्त करके ही मिल सकती है। ये तीन ऋण इस प्रकार से है।

देव ऋण, ऋषि ऋण और पितृ ऋण प्रथम के दो ऋणों की पूर्ति तो मनुष्य स्वयं ही कर देता है। देव ऋण के अंतर्गत हमारे जीवन प्रदान करने और ईश्वर द्वारा हमारे पालन पोषण के संबंध मे ऋण की पूर्ति की बात कही गई है।

वहीं दूसरी तरफ ऋषि ऋण का अर्थ उस ऋण से है जिसके अंतर्गत हमे अपने कर्तव्यों का अनुभव प्राप्त हुआ और जीवन के सही मार्ग का परिचय हुआ। लेकिन सबसे अंत मे आता है पितृ ऋण की पूर्ति की बात और इसके अंतर्गत हम अपने पितरों के ऋण का भुगतान करते है और हमारी आने वाली पीढ़ी हमारे ऋण की पूर्ति करेगी। इसी पितृ ऋण से जुड़ा है पितृ पक्ष का आयोजन।

कैसे करें पितरों का तर्पण-

पितरों के तर्पण की मुख्यतः दो विधियाँ शास्त्रों मे वर्णित है। जिसमे से प्रथम है किसी देव स्थान पर जाकर जो कि पूरी तरह से पूर्वजों के तर्पण हेतु समर्पित स्थान हो वहाँ पर पिंड दान करना तथा द्वितीय है अपने निवास पर ही पितृ पक्ष मे अपने पूर्वजों का तर्पण करना।

प्रथम विधि के अनुसार देश के भिन्न भिन्न स्थानो पर पिंड दान हेतु पूजा का प्रबंध किया गया है। जिनमे काशी, हरिद्वार, उज्जैन इत्यादि कई सारे प्रमुख स्थान है लेकिन गया का महत्व पिंड दान हेतु बहुत ही अधिक है। सनातन धर्म के अनुसार गया मे पिंडदान अपने समस्त पूर्वजों की मुक्ति के लिए बहुत ही विशेष महत्व रखती है।

गया मे प्रति वर्ष दूर दूर से लोग इस पितृ पक्ष के पखवाड़े मे अपने पूर्वजों की मुक्ति हेतु आते है। और वहाँ के विशेष पुरोहितों द्वारा उनका पिंडदान करते है। हमारे सनातन धर्म मे किसी भी प्रकार की बाध्यता नहीं की जाती है। अतः किसी का सामर्थ्य एक बार भी उपरोक्त स्थानो पर जाकर पिंड दान करने का नहीं है तो वो अपने गृह निवास पर भी इसका आयोजन कर सकते है।

इस विधि के अंतर्गत हम तिल जौ और जल से हम देवों, ऋषियों और पित्रों को जल अर्पित करते है। यदि आपको मंत्र श्लोक इत्यादि का सही उच्चारण करने मे कठिनाई हो तो भी ये विधि सम्पन्न की जा सकती है।

इसके अंतर्गत स्नान उपरांत हम पूर्व दिशा मे मुख कर सबसे पहले जल से अपने माथे मे त्रिपुंड रूपी तिलक लगते है, और कुश की बनी पैंती धारण करते हैं। तत्पश्चात सर्वप्रथम देवों को याद कर उनकी प्रार्थना कर उन्हे एक बार जल अर्पित करते है और उनसे शुभता की कामना करते है एवं जीवन के लिए आभार व्यक्त करते है।

तत्पश्चात उत्तर मुख करके ऋषियों का ध्यान करके और अपने गुरुओं का ध्यान करके उन्हे दो बार जल अर्पित करते है एवं जीवन का सही मार्ग प्रदर्शित करने के लिए उन्हे आभार व्यक्त करते है। सबसे अंत मे जौ तिल और जल के द्वारा तीन बार अपने पूर्वजों का आह्वान करते है एवं उन्हे जल अर्पित करते है।

एवं उनसे अपने कुल परिवार की सुख समृद्धि की कामना करते है। ये क्रिया पूरे पितृ पक्ष मे प्रत्येक दिन की जाती है।

इसके पश्चात जिस दिन भी हम पित्रों के श्राद्ध का आयोजन करते है। वो कोई थिति हो सकती है और यदि आपको अपने पित्रों की तिथि का अनुमान न हो तो नवमी के दिन मातृ नवमी का श्राद्ध करते है एवं अमावस्या के दिन जिसे पितृ विसर्जन के रूप मे भी जाना जाता है।

उस दिन पित्रों का श्राद्ध का आयोजन करते है उस दिन हम किसी गरीब या फिर अपने पुरोहित ब्राह्मणो को भोज प्रदान करते है और उनसे पित्रों की शांति और उनके आशीर्वाद की कामना करते है।

निष्कर्ष

उपरोक्त क्रिया केवल सामान्य रूप से बताई गई है जिसके अंतर्गत कोई भी जन सामान्य अपने पुरुखों को समर्पित इस पक्ष मे उनका आह्वान कर उनके तर्पण और श्राद्ध की क्रिया को पूर्ण कर सके और उनके शांति और कुल परिवार की सुख समृद्धि की उनसे कामना कर सके।

हमारे धर्म मे अपने पूर्वजों को हर विशेष अवसरों पर उनके आशीर्वाद की कामना हेतु याद किया जाता है। मान्यता है कि उनके आशीर्वाद से ही कुल की बढ़ोत्तरी और सुख समृद्धि निर्धारित होती है। अतः इस आयोजन का महत्व भी बहुत ही अधिक है इसीलिए सनातन धर्म के अनुसार एक पक्ष ही पुरुखों के समर्पित किया गया है।

जिन के जीवन मे पितृ दोष देखा जाता है उन्हे विशेष रूप से पिंडदान और श्राद्ध के लिए बोला जाता है। अगर हमे अपने पूर्वजों का सही ज्ञान न भी हो तब ही इस पखवाड़े मे उन्हे याद कर प्रथम दिन उनका आह्वान किया जाना चाहिए और उनकी श्राद्ध क्रिया और भोज का आयोजन करना चाहिए।

पितृ विसर्जन के दिन उन्हे सकुशल आशीर्वाद की कामना के साथ वापस जाने हेतु अनुमोदन करना चाहिए। तो आइये इस पित्रों के विशेष पखवाड़े मे हम उनको याद करे उनका तर्पण करे और उन्हे एवं खुद को पितृ ऋण से मुक्त करे तथा जीवन के इस उद्द्येश्य की पूर्ति करे। तभी हमे उनका आशीर्वाद मिलेगा एवं हमारे परिवार एवं कुल मे सुख समृद्धि का विस्तार होगा।

||इति शुभम्य||

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