जब भगवान परशुराम ने अपने माँ का सिर धड़ से अलग किया

भगवान विष्णु के कुल चौबीस अवतारों को वर्णन हमारे धर्म ग्रंथ में देखने को मिलते है। जिनमे दस अवतार को प्रमुख रूप से जाना जाता है।

जिनमे भगवान विष्णु के छठे अवतार भगवान परशुराम को तो हम सभी जानते है कैसे इन्होंने क्षत्रियों के हैहय वंश का 21 बार समूल विनाश किया था। इन्हे न्याय के देवता के रूप में भी जाना जाता है। 

भगवान परशुराम ने ही महाराज जनक को शिव धनुष उपहार स्वरूप दिया था और जो की सीता राम विवाह का साक्षी बना। राम सीता विवाह के समय शिव धनुष भंग के उपरांत लक्ष्मण परशुराम संवाद हम सभी को मालूम है।

भगवान परशुराम एक ब्राह्मण होते हुए भी उनके अंदर क्षत्रियों वाले गुण थे इसके लिए आप हमारे पूर्व में लिखे लेख महर्षि विश्वामित्र (Vishvamitra): एक प्रतापी राजा से महर्षि बनने की कथा को क्लिक कर पढ़ सकते है। जहां आप भगवान परशुराम में क्षत्रिय गुण होने का रहस्य जान सकते है।

मान्यता है कि भगवान परशुराम अकेले भगवान विष्णु के अवतार है जो आज भी इस पृथ्वी पर विचरण करते है। जिन्होंने अपने अवतारी जीवन का त्याग नहीं किया है। 

आज के इस लेख में हम इन्हीं भगवान परशुराम के जीवन की एक कथा का वर्णन करेंगे कि कैसे उन्होंने अपने परसे से अपनी ही मां का सिर धड़ से अलग कर दिया।

 और पुनः अपनी सूझबूझ से उनको जीवित भी करवा दिया। पिता की आज्ञा का पालन और माता से प्रेम दोनों के मध्य एक का चयन होते हुए भी दोनों की प्राप्ति की।

महर्षि जमदग्नि जिनकी पत्नी माता रेणुका थी और उनके चार पुत्र थे रुक्मवान, शुषेणवसु, विश्ववान और परशुराम। परशुराम महर्षि जमदग्नि के सबसे छोटे पुत्र थे। जो कि स्वयं विष्णु के छठे अवतार थे। 

एक बार की बात है किसी बात को लेकर महर्षि जमदग्नि और उनकी पत्नी रेणुका के मध्य विवाद हुआ। विवाद बहुत ही ज्यादा बढ़ गया था। 

और क्रोध वश महर्षि जमदग्नि ने अपने प्रथम पुत्र से अपनी मां का प्राण हरने को बोला। मां से लगाव होने के कारण रुक्मवान ने ऐसा करने से मना कर दिया।

इसी प्रकार महर्षि जमदग्नि ने एक एक कर अपने सभी पुत्रों से ऐसा करने को बोला लेकिन बाकी दो पुत्रों ने भी ऐसा करने से मना कर दिया। 

अंत में महर्षि जमदग्नि ने अपने सबसे छोटे पुत्र परशुराम को भी ऐसा करने को बोला एक बार को भगवान परशुराम इस दुविधा में पड़ गए कि क्या करे क्योंकि अपने मां के प्राण हरना गलत है। वहीं दूसरी तरफ पिता की आज्ञा की अवहेलना करना भी उचित नहीं।

और इस सोच विचार के जाल से परे होकर भगवान परशुराम ने अपना परसा उठाया और अपने मां रेणुका का सिर धड़ से अलग कर दिया। सभी भाई ये देखकर अचंभित और दुखी थे। 

परशुराम भी इससे बहुत ही दुखी हुए उनके ऊपर उनके मां की ही हत्या का पाप लगा था ये एक कलंकित करने वाला कृत्य था।

वहीं दूसरी तरफ भगवान परशुराम के पिता महर्षि जमदग्नि उनकी आज्ञा का पालन करने लिए उनसे प्रसन्न हुए और भगवान परशुराम से कोई भी वरदान मांगने को कहा।

वरदान मांगने की बात सुनते ही भगवान परशुराम बहुत हुए और उन्होंने अपनी बुद्धिमत्ता का प्रयोग करते हुए अपने पिता महर्षि जमदग्नि से अपनी मां को पुनः जीवित करने का वरदान मांग लिया। 

इस पर महर्षि जमदग्नि बहुत ही प्रसन्न हुए और अपनी पत्नी रेणुका को पुनः जीवित कर दिया। और फिर बताया कि ये एक परीक्षा थी कि कैसे तुम अपनी बुद्धिमत्ता का प्रयोग करते हो। 

परशुराम ने अपनी अपने पिता की आज्ञा का पालन भी किया और अपनी बुद्धिमत्ता का प्रयोग कर अपनी माता को पुनः जीवित भी करवा दिया। 

इस प्रसंग में भगवान परशुराम का अपने माता और पिता दोनों के प्रति प्रेम सम्मान का भाव बहुत ही अच्छे से दिखाया गया है। भगवान परशुराम के द्वारा हैहय वंश का समूल नाश करना भी अपने पितृ प्रेम का ही एक कारण था। 

उनके पिता के शरीर पर हुए इक्कीस घावों के प्रतिशोध के कारण ही उन्होंने ऐसा किया इसकी भी कथा हम अपने आने वाले लेखों के जरिए बताएंगे।

त्रेतायुग से लेकर द्वापरयुग तक बहुत सारे ऐसे प्रसंग है जिनमे भगवान परशुराम का संबंध है जिसमे भीष्म पितामह और परशुराम के मध्य द्वंद का प्रसंग बहुत ही प्रसिद्ध है। 

तो दोस्तों आप हमारे इस पेज से जुड़े रहे और ऐसे पौराणिक प्रसंग, धर्म और दर्शन के रहस्यों के संबंध में लेख का अनुभव लेते रहे।

धन्यवाद।

||इति शुभम्य||

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