पांडवों की मृत्यु कैसे हुई और उनकी स्वर्ग यात्रा का वृतांत

महाभारत एक महाकाव्य है और इसमे बहुत सारी कहानी और कथाओं का संग्रह है। इसी क्रम मे आज के प्रसंग मे हम जानेंगे कि पांडवों की मृत्यु कैसे हुई। तथा तथा उनकी मृत्यु से पहले कौन कौन सी घटनाएँ घटी।

और उनकी स्वर्ग की यात्रा मे उनके साथ क्या हुआ। धर्मराज युधिष्ठिर की परीक्षा किसने ली तथा युधिस्थिर के साथ चलने वाला कुत्ता कौन था। द्रौपदी और अन्य पांडवों की मृत्यु कैसे हुई और किस कारण से वो जमीन पर गिरते चले गए और इसके पीछे युधिष्ठिर ने क्या कारण बताया।

इन्ही सभी प्रमुख प्रसंगों को आज हम इस लेख मे समाहित करने का प्रयास करेंगे।

महाभारत युद्ध समाप्ति के उपरांत-

बात तब की है जब महाभारत का युद्ध समाप्त हो गया था। तथा हस्तीनपुर के राजगद्दी पर युधिष्ठिर सम्राट बनकर विराजमान हो गए थे।

बहुत समय तक इन्होने वह पर राज किया। कालक्रम मे भगवान कृष्ण ने अपने अलौकिक शरीर का त्याग कर दिया था। (श्री कृष्ण के मृत्यु की कथा जानेने के लिए क्लिक करें) इसकी सूचना मिलने के उपरांत पांडवों का मन भी विचलित रहने लगा।

और उन्होने अपना राज पाट अभिमन्यु के पुत्र परीक्षित को राजतिलक करके हिमालय पर्वत पर जाने का निर्णय किया। और यहीं से शुरू होती है इनके स्वर्ग यात्रा का वृतांत और यही पर इनकी मृत्यु का रहस्य भी उजागर होता है।

पांडवों की मेरु पर्वत की यात्रा-

अपना राजपाट सब कुछ त्याग कर पांडव और द्रौपदी मेरु पर्वत की यात्रा की लिए निकलते है। मेरु पर्वत हिमालय पर्वत शृंखला मे स्थित पवित्र पर्वत है। मान्यता है इस पर्वत से होकर स्वर्ग का मार्ग निकलता है कई पौराणिक ग्रन्थों मे इसके बारे मे बताया गया है।

पांडव सन्यासी का भेष धरण कर अपनी यात्रा की शुरुवात करते है। उनकी यात्रा मे उनके साथ एक कुत्ता भी उनके साथ साथ चलता है।

इस यात्रा मे चलते हुए सभी बहुत ज्यादा थक जाते है लेकिन फिर भी ये अपनी यात्रा चालू रखते है। चलते चलते रास्ते मे द्रौपदी गिर जाती है।

और वो अपना प्राण त्याग देती है इस पर भीम युधिष्ठिर से इसका कारण पुछते है क्यों आखिर अपनी यात्रा पूर्ण करने से पूर्व ही द्रौपदी ने अपने प्राण त्याग दिये इस पर युधिष्ठिर बोलते है। द्रौपदी हम सबकी पत्नी होने के बावजूद केवल अर्जुन से अत्यधिक प्रेम करती थी। इसी कारण से उसके साथ हुआ।

इसी क्रम मे थोड़ा और आगे बढ़ने के बाद सहदेव भी भूमि पर गिर जाते है और अपने प्राण त्याग देते है। पुनः भीम युधिष्ठिर वही प्रश्न पुछते है। इस पर युधिष्ठिर बोलते है। सहदेव बहुत बुद्धिमान व्यक्ति था और उसे अपने बुधही तर्क कौशल पर अभिमान था।

और इस यात्रा मे वही अभिमान बाधक बना और उसने अपनी यात्रा नहीं पूरी कर पाया। और मध्य मार्ग मे ही गिर कर अपने प्राणों का त्याग कर दिया।

आगे चलते हुए नकुल के साथ भी यही हुआ वो भी चलते चलते भूमि पर गिर पड़े और अपने प्राण त्याग दिये इस पर भीम के द्वारा पुनः वही प्रश्न पुछने पर युधिष्ठिर ने जवाब दिया कि नकुल संसार मे बहुत ही सुंदर पुरुष था।

कोई भी उसकी सुंदरता को देखकर मोहित हो सकता था। अतः उसे अपनी इस सुंदरता पर अभिमान व्याप्त हो चुका था। और इसी कारण से वो अपनी यात्रा पूर्ण नहीं कर सका।

आगे चलते चलते हुए अर्जुन भी बीच यात्रा मे ही भूमि पर गिर गए और अपने प्राणो का त्याग कर दिया। और इस पर युधिष्ठिर ने बताया अर्जुन की धनुर्विद्या सभी जानो मे श्रेष्ठ थी ईश्वर का सानिध्य होने के उपरांत भी इसने अपने अभिमान का त्याग नहीं किया।

इसीलिए ये अपनी यात्रा पूरी नहीं कर पाया। और भूमि पर गिरकर अपने प्राणों का त्याग कर दिया।

और इसी क्रम मे अंत मे भीम भी जमीन पर गिर गया और उसने अपने गिरने का कारण भी युधिष्ठिर से पूछा तो युधिष्ठिर ने बोला इस यात्रा को अपने शारीरिक बल या शक्ति के आधार पर पूरी नहीं की जा सकती है।

और तुमने अपने शारीरिक बल और शक्ति भी इतना अभिमान था कि तुम इसके द्वारा अपनी यात्रा पूरी करना चाहते थे इसलिए तुम भूमि पर गिर गए, अपना जवाब प्रपट होने के पश्चात भीम ने भी अपने प्राण रास्ते मे ही त्याग दिये।

अब केवल युधिष्ठिर और उनके साथ चलने वाला कुत्ता ही इस यात्रा मे शेष बचे थे। वो अपनी यात्रा को आगे बढ़ाने लगे तभी स्वयं देवराज इंद्र विमान लेकर युधिष्ठिर के सामने प्रकट हुए और उन्हे आपे साथ स्वर्ग ले चलने के लिए आमंत्रित किया।

इस पर युधिष्ठिर ने कहा कि उनका साथ देना वाला कुत्ता भी उनके साथ जाएगा। देवराज ने बहुत समझाया लेकिन युधिष्ठिर बगैर कुत्ते के जाने को तैयार नहीं थे। इसपर उस कुत्ते ने अपना असली स्वरूप दिखाया वो स्वयं धर्मराज थे।

तभी उन्होने बोला हे युधिष्ठिर आप अपने धर्म से बिलकुल भी अडिग नहीं हुए आप इस परीक्षा मे सफल हुए अब चलिये आप स्वर्ग मे अपना स्थान ग्रहण करे। और युधिष्ठिर उस विमान मे बैठ गए।

युधिष्ठिर का स्वर्ग प्रवास-

जब युधिष्ठिर स्वर्ग पहुंचे तो उन्होने सबसे पहले अपने भाइयों और द्रौपदी के बारे मे पुंछा तो उन्हे बताया गया कि वो अपने नियत स्थान पर पहुँच चुके है। युधिष्ठिर ने उन्हे देखने की इच्छा प्रकट की।

उन्हे उनके भाइयों के पास ले जाया गया। जहां बहुत ही अधिक अंधकार था। और और वहाँ नर्क जैसे वातावरण का अहसास हुआ था। उनसे मिलके बाद युधिष्ठिर से बोला गया कि वो वापस स्वर्ग चले वही उनका नियत स्थान है।

इस पर युधिष्ठिर ने कहा कि मुझे स्वर्ग की चाह नहीं बल्कि मेरे भाई बंधु जहां है मई उनके साथ ही रहूँगा। और पुनः वापस जाने को माना कर दिया। इसके बाद वहाँ प्रकाश हो गया और सभी देवी देवता आए और उन्होने बताया कि अश्वस्थामा की गलत मृत्यु का समाचार बताकर उन्होने पाप किया इसी लिए उनके कुछ समय के लिए नर्क का अनुभव करना पड़ा।

अब वो अपने भाई बंधुओं के साथ स्वर्ग मे आराम से प्रवास कर सकते है।

निष्कर्ष

वैसे तो महाभारत के हर प्रसंग से हमे कोई न कोई सीख मिलती है। लेकिन इस प्रसंग ने हमे कई बातें सीखने का प्रयास किया है। कैसे हमारा बल, कौशल, सुंदरता इत्यादि हमारे अंतिम यात्रा मे हमारे काम नहीं आती।

भले हम कितने भी इस लोक मे समृद्ध हो लेकिन इसका कोई उपयोग नहीं रह जाता है। वही दूसरी तरफ ये भी शिक्षा मिलती है कि हमे आफ्नो का साथ कितना आवश्यक है।

तथा अपने धर्म, नैतिकता, सच्चाई इत्यादि जैसे अच्छे गुण ही हमे मुक्ति के मार्ग की ओर प्रसस्त कर सकते है। और यही हमारे जीवन के बाद की यात्रा के लिए उपयोगी साबित हो सकते है। जैसा कि युधिष्ठिर के साथ आया।

||इति शुभम्य||

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