मनोभाव (Thoughts) भी तय करते है आपका कर्मफल- एक प्रसंग

कहते है हम जैसा सोचते है वैसा हमारे साथ होता है। लेकिन साथ ही साथ ऐसा भी है कि हम यदि कुछ करते हुए जैसा मनोभाव (Thoughts) रखते है, उसे के अनुरूप हमे कर्म फल प्राप्त होता है। भले ही हम कुछ अच्छा ही क्यों न कर रहे हो लेकिन यदि हमारे मन मे उसके प्रति कुछ कमी के भाव उत्पन्न होते है तो वो अच्छा कर्म भी हमे अच्छे फल प्रदान नहीं करता है। इसी पर आधारित एक पौराणिक महाभारत का प्रसंग हम आपको आज बताने जा रहे है।

महाभारत युद्ध के उपरांत- बात उस समय की है जब महाभारत का युद्ध समाप्त हो चुका था। पांडवों को साम्राज्य मिल चुका था। हस्तिनापुर राज्य मे वो बड़े खुशहाल रूप मे रह रहे थे। परंतु एक बात युधिस्थिर और अन्य भाइयों के मन मे बहुत ही परेशानी उत्पन्न कर रही थी। उनके मन मे रहता था कि जिस प्रकार से महाभारत के युद्ध मे इतने लोग उनके हाथों मारे गए तो अवश्य ही उन्हे इसका प्रायश्चित करना चाहिए। भले ही ये एक धर्म युद्ध था लेकिन कहीं न कहीं उनके मन मे इसके प्रति ग्लानि की भावना व्याप्त है।

भगवान कृष्ण की शरण- इस समस्या के समाधान हेतु पांडव श्री कृष्ण की शरण मे पहुँचते है। और अपनी समस्या उनके समक्ष प्रस्तुत करते है। और इसके समाधान के लिए उनसे आग्रह करते है। इसपर श्री कृष्ण बोलते है कि इतने बड़े युद्ध की समाप्ती के बाद ग्लानि की भावना का उत्पन्न होगी ही। और रही बात इसके प्रायश्चित की तो मई तुम्हें उपाय बताता हूँ। श्री कृष्ण ने उन्हे एक घण्टा प्रदान किया और बोला इसे अपने महल मे लगा दो। और उसके उपरांत अपने राज्य के समस्त जन को एक भोज का निमंत्रण दो और जब सभी कोई तुमहरे भोज से संतुष्ट हो जाएँगे तभी ये घण्टा स्वयं से बज उठेगा और तुम लोगा प्रायश्चित पूर्ण माना जाएगा।

भोज का आयोजन- श्री कृष्ण से आदेश मिलने के उपरांत पांडव वो घण्टा लेकर अपने राज्य पहुँचते है। और उसको उचित स्थान पर टांग देते है। उसके उपरांत एक भव्य भोज का आयोजन करते है। और राज्य के समस्त नागरिकों को कई तरह के मिष्ठान इत्यादि के द्वारा भोज करवाते है। इनका भोज का आयोजन कई डीनो तक चलता रहता है सभी नगरों और गाँव से सारे स्त्री, पुरुष और बच्चे उस भोज मे शामिल होते है। हर व्यक्ति को ढूंढ ढूंढ कर उस भोज मे शामिल किया जाता है और उन्हे संतुष्ट किया जाता है।

घंटे का न बजना- राज्य के सभी लोगो को भोज करने के उपरांत पांडव उस घंटे के पास आते है लेकिन उस घंटे से कोई ध्वनि नहीं होती है। और पांडव चिंतित होकर केशव के पास जाते है। और उन्हे समस्या बताते है। इसपर श्री कृष्ण अपने दिव्य दृष्टि से पता करते है और पांडवों को बताते है की उनके राज्य की ही सीमा मे एक जंगल मे एक संत रहते है उन्हे अभी तक भोज नहीं कराया गया है इसीलिए घंटे से ध्वनि नहीं हुआ उन्हे बुलाकर पूरे सत्कार से जब भोज करा दिया जाएगा तभी घंटे से ध्वनि होगी।

संत के लिए भोज का आयोजन- पुनः पांडव उन संत की खोज करते है और उन्हे भोज के लिए आग्रह करते है और अपने राजमहल मे उन्हे अमतरित करते है। उचित समय पर संत उपस्थित होते है। और स्वयं द्रोपदी उनके लिए छपन्न भोग प्रसाद का निर्माण करती है। और बड़े प्रेम से भिन्न भिन्न पात्रों मे कई सारे पकवान उन्हे ग्रहण करने को परोसती है। वो संत सभी पकवान को एक ही पात्र मे रख कर उन्हे एक मे मिलाकर खाने लगते है इसे देखकर द्रोपदी के मन मे रोष आ जाता है कि इतने मेहनत से पकवान बनाए गए है और उन संत ने सभी पकवान को एक ही पात्र मे मिला लिया। और इस बात से द्रोपदी को रोष उत्पन्न हुआ। संत भोज ग्रहण करके चले जाते है फिर भी घण्टा ध्वनि नहीं करता है और पुनः पांडव श्री कृष्ण के पास जाते है और सारा वाक्य बताते हुए पुछते है सभी के भोज करने के उपरांत भी घंटे से ध्वनि नहीं हुई ऐसा क्यों हुआ।

द्रोपदी का मनोभाव- इस पर केशवने बोला कि तुम लोगो ने सभी को तो भोज करा दिया यहा तक उन संत को भी बड़े मन से भोज प्रदान किया लेकिन भोज के समय जब उन संत ने सभी पकवान को एक पात्र मे मिलाकर ग्रहण किया तो द्रोपदी के मन मे उनके प्रति रोष का भाव उत्पन्न हुआ इसलिए इस भोज को पूर्ण नहीं माना जाएगा और उस घंटे ने भी ध्वनि नहीं हुआ। अतः पुनः उन संत को बुलाओ। दुबारा उन्हे भोज ग्रहण कराओ और जैसे भी उसे ग्रहण करे मन मे किसी प्रकार की विकृति नहीं आणि चाहिए।

इसके उपरांत पुनः उन संत को भोज के लिए आमंत्रित किया जाता है और पुनः सारे पकवान उन्हे परोसा जाता है और वो संत अपने तरीके से ही उसे ग्रहण करते है लेकिन इस बार द्रोपदी को उनके भोजन ग्रहण करने के तरीके से कोई परहेज नहीं होता है। और जैसे ही संत भोजन ग्रहण करके अपने को तृप्त महसूस करते है उस घंटे से दिव्य ध्वनि का प्रवाह होता है। और पांडवों के प्रायश्चित की पूर्णाहुति होती है। इस प्रकार से उनका लक्ष्य प्राप्ति पूर्ण होती है।

निष्कर्ष

उपरोक्त प्रसंग हमे बताता है कि हमारे कर्म के साथ साथ हमारे विचार भी हमारे लिए अति आवश्यक होते है। कभी भी जब हम कुछ कर रहे हो तो सबसे पहले तो हमारे कर्म बहुत ही अच्छे मार्ग से प्रेरित हो साथ ही साथ उनके प्रति हमारे मनोभाव भी स्वच्छ और बिना किसी विकृति के होनी चाहिए। मन के भाव ही हमारे सही चारुतर को दर्शाते है। भले ही हम सोचते हो की हमारे मन के भाव कोई और नहीं जनता और इसे केवल मेरे अंदर होने के कारण कोई समझ नहीं सकता लेकिन हमारे कर्म फल का निर्धारण हमारे मनोभाव के आधार पर ही सुनिश्चित होता है। अतः जितना हो सके हमे हर क्षण अपने मन के भाव पर हमारा नियंत्रण होना चाहिए। और इसमे आने वाली विकृति को रोकने का प्रयास हमे करते रहना चाहिए। ये विचार ही हमारे आदर्श जीवन का निर्धारण करते है।

||इति शुभम्य||

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