ओरछा के रामराजा की अद्भुत कथा- महल मे विराजमान ओरछा के राजाराम

Orchha ke rajaram

ओरछा के रामराजा की अद्भुत कथा- महल मे विराजमान ओरछा के राजाराम- प्रभु श्री राम का नाम आते ही हम पावन नागरी अयोध्या के बारे मे सोचते है। लेकिन क्या आप जानते है कि मध्य प्रदेश राज्य के निवाड़ी (Niwari) जिले मे स्थित ओरछा (Orchha) नामक स्थान प्रभु श्री राम को लेकर बहुत प्रसिद्ध है। महल मे विराजमान राजराम की महिमा विश्वविख्यात है। उनको राजा की उपाधि के साथ वहाँ विराजमान किया गया है। दूर दूर से राजराम के दर्शन और उनके महल की भव्यता देखने लोग आते रहते है तो आज हम बात करेंगे इन्ही ओरछा के श्रीराम की जिनके अयोध्या (Ayodhya Ram Nagari) से ओरछा पहुँचने की कथा जो कि बहुत ही अद्भुत है।

रामभक्त ओरछा महारानी-बात उस समय की है जब ओरछा में राजतंत्र हुआ करता था। ओरछा नरेश का राज्य बहुत ही सम्पन्न और खुशहाल था। उनकी पत्नी कुंवरि वृषभान बहुत ही धार्मिक प्रवृत्ति की थी। उनका राम के भक्ति के प्रति बहुत ही ज्यादा लगाव था। वो हमेशा प्रभु श्रीराम के बहकती मे तल्लीन रहती थी। राजा और उनकी पत्नी बहुत ही खुशहाल जीवन व्यतीत कर रहे थे।

ओरछा नरेश अपनी महारानी की भक्ति को देखकर सोचते रहते थे कि कैसे उनकी पत्नी भगवान श्रीराम के प्रति कितना श्रद्धा रखती है। इसे देखते हुए एक दिन सहसा उन्होने महारानी से प्रश्न किया कि जब तुम भगवान श्री राम की भक्ति मे इतना तल्लीन रहती हो तो क्या प्रभु तुमहरे आग्रह से हमारे राज्य मे आएंगे और वास करेंगे। ओरछा नरेश की बाते सुनकर महारानी दुविधा मे पड़ गई और सोचने को मजबूर हो गई कि क्या सच मे मेरी भक्ति इतनी काबिल है कि मेरे कहने पर प्रभु श्री राम ओरछा राज्य मे पधारेंगे।

ओरछा महारानी का दृढ़ निश्चय और अयोध्या प्रवास- लेकिन कहीं न कहीं महारानी को अपनी भक्ति पर इतना विश्वास था कि उनके आग्रह पर प्रभु श्री राम अवश्य ही ओरछा वास के लिए आएंगे। और उन्होने दृढ़ निश्चय कर ओरछा नरेश को सूचित किया कि वो तैयारी करे प्रभु श्री राम के वास हेतु क्योंकि वो अयोध्या जाएंगी प्रभु श्रीराम को ओरछा आने के लिए आग्रह करने हेतु। और महारानी अयोध्या के लिए निकाल पड़ी। दूसरी तरफ महाराज ओरछा ने भी अपनी पत्नी का दृढ़ निश्चय को देखते हुए अपने महल के सामने एक अन्य महल का निर्माण की शुरुवात की। जिसमे प्रभु श्रीराम के वास हेतु बनाया गया।

महारानी का कठिन तप और प्रभु की आगमन- अपने दृढ़ संकल्प और और प्रभु श्रीराम के प्रति अपनी भक्ति के साथ महारानी ओरछा अयोध्या पाहुच जाती है। और वहाँ वैदिक रीति रिवाजो के अनुरूप संकल्प लेते हुए प्रभु के तप मे लीन हो जाती है। महारानी की तपस्या जारी रहती है लेकिन प्रभु का उत्तर प्राप्त नहीं होता है। महारानी अपने तप को और भी कठिन कर देती हैं लेकिन फिर भी प्रभु श्रीराम से कोई जवाब प्राप्त नहीं होता है। कोई जवाब न मिलने के वावजूद भी महारानी अपने तप मे कोई कमी नहीं लाती है और तो और वो भक्ति और तप को और ज्यादा कठिन रूप मे करने लगती है।

कई दिन बीत जाने के बाद भी कोई उत्तर ना मिलने के उपरांत महारानी जल समाधि लेने का निर्णय लेती है। और एक दिन प्रातः काल अयोध्या के लक्ष्मण घाट के सामने जल समाधि हेतु पवित्र सरयू नदी के किनारे आती है और जल मे समाधि हेतु प्रवेश कर जाती है। अपने भक्त की ऐसी भक्ति को देखते हुए स्वयं प्रभु श्रीराम प्रकट होते है और महारानी को रोकते है। और उनके साथ ओरछा जाने को तैयार हो जाते है।

परंतु उनकी एक शर्त होती है कि वो उंकिए साथ ओरछा तभी जाएँगे जब वहाँ उन्हे महाराजा के रूप मे स्थापित किया जाएगा। महारानी उनकी इस शर्त को तत्काल रूप से मान लेती है। और पूरे गाजे बाजे के साथ प्रभु श्रीराम की पालकी अयोध्या से ओरछा के लिए प्रस्थान करती है। दूसरी तरफ सारी तैयारियां नए महल मे हो चुकी होती है।

पालकी ओरछा महल मे पहुँचती है। और तैयारी होती है प्रभु श्रीराम को नए महल मे विराजमान करने की तभी प्रभु अपनी बात दुबारा महारानी को याद दिलाते है कि उन्होने कहा था कि उन्हे महाराज की तरह विराजमान किया जाएगा। और अगर नए महल मे उन्हे विराजमान किया गया और सामने के महल मे स्वयं ओरछा नरेश विराजमान होगे तो उनकी बात सही नहीं मनी जाएगी। चूंकि महारानी के लिए प्रभु श्री राम की भक्ति ही महत्वपूर्ण थी तो उन्होने पूरे परिवार के साथ महल का त्याग कर दिया और पुराने महल मे प्रभु श्रीराम को विराजमान किया गया। प्रभु श्रीराम के लिए बनाया गया नया महल आज भी खाली है जो कि आजकल केवल पर्यटको के लिए देखने के लिए खुलता है।

आज भी दिया जाता है प्रभु श्रीराम को Guard of Honor- उपरोक्त प्रसंग के अनुसार जिस प्रकार से प्रभु श्रीराम को राजा की उपाधि के साथ ओरछा के महल मे विराजमान किया गया था। उसकी परंपरा आज भी उसी प्रकार से निभाई जा रही है। आज भी यदि आप ओरछा के श्रीराम के भव्य महल के दर्शन करने जाएँगे तो उन्हे वहाँ के निवासी ओरछा के राजा के नाम से पुकारते है। और आज भी एक राजा की तरह उन्हे पूरे सम्मान के साथ प्रतिदिन मंदिर के कपात खुलने और बंद होने के समय स्थानीय प्रशासन द्वारा Guard of Honor दिया जाता है। वहाँ के निवासी अपनी समस्याए उनसे बताते है। जैसे प्रजा अपने राजा को अपनी समस्याएँ बताती है। और उनका दृढ़ विश्वास है कि ओरछा के राजा उनकी समस्याओं को हल भी करते है।

निष्कर्ष –

सनातन धर्म मे बहुत सारी कथाएँ है जो ईश्वर के प्रति हमारी श्रद्धा और भक्ति को और भी मजबूत बनती है। इसी क्रम मे ये प्रसंग भी हमे प्रेरित करती है। किस प्रकार से एक राजा के कहने पर उनकी पत्नी अपने भक्ति पर इतना विश्वास रखती है कि उनके कहने मात्र से प्रभु श्री राम को उनके राज्य मे वास हेतु आग्रह करने हेतु कठिन तप करती है। और उसी विश्वास के कारण वो सफल होती है। भगवान उन्हे निराश नहीं करते है और उनका आग्रह मान लेते है। बहकती का अद्भुत स्वरूप इस कथा मे देखने को मिलता है।
दूसरी तरफ त्याग की ऐसी अद्भुत मिशाल देखने को भी मिलती है जिसमे एक राजा अपने राज पाट तक का त्याग कर देता है। एक पल को भी ओरछा नरेश और उनकी पत्नी इस बात को लेकर सकुचाते नहीं कि इतनी अकूट संपत्ति और साम्राज्य छोड़कर सबकुछ कैसे प्रभु श्रीराम को समर्पित कर सकते है। समर्पण की ऐसी भावना बहुत ही कम देखने को मिलती है। तो एक बार अवश्य ओरछा जाए और वहाँ के राजा राम के दर्शन करे। उनके महल की दिव्यता पूरे वातावरण के सुकून का अनुभव करे और एक आध्यात्मिक संतोष की प्राप्ति करे।

||इति शुभम्य||

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