दिखावे (Show off) की जिंदगी: उचित या अनुचित

Never judge a book by its cover ये कहावत हम सबने सुनी होगी जिसका शाब्दिक अर्थ है कि किसी पुस्तक की सार्थकता उसके आवरण के द्वारा नहीं तय की जानी चाहिए। जितना Popular ये कहावत है। इंसान की जिंदगी मे सही मायनो में इसका महत्व उतना ही कम है। हम सभी को दिखावे की जिंदगी से बहुत ही ज्यादा लगाव है। प्रायः हम किसी व्यक्ति वस्तु या फिर किसी चीज का आकलन उसके बनावट, आवरण या फिर कहे उसके Show off के तरीके से कर लेते है। जब भी हम किसी समारोह आय किसी सामूहिक आयोजन इत्यादि में जाते है। तो सर्वप्रथम सबके पहनावे या फिर कहे दिखावे के आधार पर ही उनका आकलन कर लेते है। पर क्या सच में दिखावा ही समस्त आकलन का आधार हो सकता? इसका जवाब है नहीं। लेकिन इस मन को कौन समझाये हम कितना भी कह ले कि दिखावा सही नहीं लेकिन सही समय पर हम उसे भूल जाते है। और भूले क्यों ना सम्पूर्ण समाज का बहुत बड़ा वर्ग इसी को ही तो सबसे महत्वपूर्ण आधार मानता है। तो आज इस लेख के द्वारा हम बात करेंगे कि क्या सच में दिखावे का हमारे जीवन में कोई महत्व है। और क्या ढिकवे भरी जिंदगी उचित है या फिर अनुचित।

चार लोग क्या कहेंगे

जब बात दिखावे की आती है। और इसके उचित अनुचित मानने की बात आती है तो सबसे पहला सवाल यही आता है कि चार लोग क्या कहेंगे। आपको अपने किसी शुभचिंतक के यहाँ किसी Party, Function, Marriage, Birthday इत्यादि आयोजनो में जाना है आपके पास महंगे Gift लेने के लिए पर्याप्त पैसे नहीं है। या फिर उस आयोजन में जाने के लिए महंगे साज सज्जा हेतु सामान नहीं है फिर भी आपको उसकी पूर्ति करनी पड़ेगी क्योंकि चार लोग क्या कहेंगे। अब एक बार सोचिए क्या चार लोग आपकी प्रकृति को आपके रहन सहन के तरीके को बदलाव नहीं कर रहे। और अगर आप दिखावे को प्राथमिकता नहीं मान रहे तो क्या आप गलत है, Society मे रहने लायक नहीं। तो यहा बात आएगी की लोगो को आपकी आवश्यकता नहीं बल्कि लोग चाहते है अगर उनसे आप Connected रहना चाहते है तो आपको उनके अनुसार जीवन जीना होगा। जोकि आपके स्वतंत्र सुंदर जीवन को बंधन में बांध रहे है। अगर हम उन चार लोगो की परवाह न करे तो और अपने स्वच्छंद जीवन मे आगे बड़े तो क्या गलत है। तो दिखावे को इस आधार पर उचित कहना सही नहीं कि चार लोग क्या बोलेंगे। 

Need और Desire मे अन्तर 

प्रायः हम Need और Desire को Single Entity मान लेते है जबकि जैसे दो अलग अलग शब्द है उसी प्रकार इनका अर्थ भी बहुत ही Different है। Need का सही शब्दों मे अर्थ आवश्यकता से है जो चीजे हमारे जीवन के लिए Necessary है जिनके बगैर हम जीवन की कल्पना नहीं कर सकते वो हमारी Needs है। वहीं दूसरी तरफ Desire का मतलब इच्छाओं से है जो चीजे हमारे जीवन में बहुत आवश्यक नहीं हो जिनके बगैर भी हम अच्छी Life जी सकते है। उनको हम Desire के रूप में देखते है। अब बात करे दिखावे की तो हमारी इच्छाएं या फिर Desire ही हमारे मन में दिखावे को जन्म देती है। और इन्ही इच्छाओं को हम अपनी आवश्यकता समझने लगते है। जब समाज इच्छाओ को Needs के रूप में देखने लगता है। तो सभी को दिखावा महत्वपूर्ण लगने लगता है। उदाहरण के रूप में इस Corona महामारी के समय को देखे Lockdown के समय भी हम अपना जीवन अच्छे से व्यतीत कर सकते है। लेकिन वो दिखावे भरी जिंदगी से हमे इतना लगाव हो चुका है कि हम इस जिंदगी में उलझन महसूस कर रहे है। क्योंकि हमारी इच्छाओं पर हमारा ही नियंत्रण नहीं है। और हमारी Desires हमारी कमजोरी बन चुकी है। तो इस आधार पर भी हम कह सकते है कि दिखावे की जिंदगी हमारे जीवन मे उचित स्थान नहीं रखती है। लेकिन हमारा Mind इसको मानने के लिए तैयार नहीं। 

प्रकृति (Nature) से सीखने की आवश्यकता 

सम्पूर्ण प्राणी जगत यहाँ तक कि सम्पूर्ण जगत की जीवनरेखा (Lifeline) है प्रकृति। इसके बगैर हम जीवन की कल्पना भी नहीं कर सकते। भारतीय दर्शन (Indian Philosophy) एवं पाश्चात्य दर्शन (Western Philosophy) के समस्त शाखाओं ने प्रकृति की अवधारणा देते हुए ये बताने की कोशिश की है कि जगत मे जो कुछ भी संचालित हो रहा है। वो प्रकृति के अनुसार ही हो रहा है। हम भी प्रकृति का ही अंग है लेकिन आज हम इसे पेड़ पौधो, नदियों, पहाड़ों इत्यादि तक ही सीमित कर रखा है। तो हम बात करते है यदि प्रकृति भी दिखावा करने लगे और अपने स्वभाव और गुण (Nature & Property) को बदल ले तो क्या होगा। उदाहरण स्वरूप यदि करैला और नीम सोचने लगे कि हम अपनी कड़वाहट के गुण को बदल ले और मीठे हो जाये, नदिया अपना गुण बादल कर समुद्र का गुण धरण कर ले क्योंकि समुद्र बहुत ही विशाल है, मिट्टी, लकड़ी पत्थर सभी अपना गुण और स्वभाव बदल ले तो क्या होगा। सोचने वाली बात है न। सबकी भिन्नता उनका गुण अलग है और अगर दिखावे के चक्कर मे सभी अपने अपने गुणो को समान बना ले तो हमारी बहुत सारी आवश्यकताएँ (Needs) पूरी नहीं हो पाएँगी। और हमारा जीना भी मुश्किल हो जाएगा। फिर हम क्यों दिखावे के चक्कर में अपने स्वभाव और गुण में बदलाव कर लेते है। खुद ही समझने की बात है कि दिखावा उचित है या अनुचित। 

दिखावे से दूरी समाज की आवश्यकता 

भारतीय जीवनशैली के परिप्रेक्ष्य मे देखा जाये तो दिखावे का बहुत ही ज्यादा महत्व है। लेकिन इस दिखावे के जीवनशैली (Lifestyle) के कारण समाज मे ऊंच नीच (Elite Class, Middle Class, Lower Class) जैसा वर्गीकरण हो गया है जिसके कारण समाज में जो इन दिखावे की जिंदगी का अनुशरण करने मे असमर्थ है। वो हीं भावना के शिकार है। किसी शादी की ही बात करें तो हर उस लड़की के पिता को फिजूल का खर्च करना पड़ता है दिखावे के लिए क्योंकि लोग क्या कहेंगे। ये जो लोग क्या कहेंगे की भावना है। यही मानसिकता हमे समाज मे लोगो के वर्गीकरण के रूप में देखने को मिलती है। और फिर हम इस समाज में समानता ढूंढते है। जोकि मुमकिन ही नहीं है। इस दिखावे के कारण लोगो का असली स्वभाव और गुण समाप्त (Vanished) हो चुका है। अगर हम एक तरफ समाज में समानता की बात करेंगे तो दिखावे की जिंदगी का गुणगान करने से समानता नहीं आने वाली बल्कि सम्पन्न और गैर सम्पन्न के मध्य ये एक गहरी खाई ही बनाने का काम करेगा। अतः हमारे समाज के लिए दिखावे भरी जिंदगी बिलकुल भी उचित नहीं है। 

निष्कर्ष 

इस लेख के द्वारा मै ये बताने का प्रयास नहीं कर रहा की दिखावा करने की आवश्यकता नहीं है, जो सुविधा सम्पन्न लोग है वो करें इसमे कोई मनाही नहीं है। समाज दर्शन (Social Philosophy) में बताया गया है कि जब व्यक्ति की समस्त आवश्यकताए पूरी हो जाती है तो वो मनोरंजन इत्यादि की ओर आकर्षित होता है लेकिन ये बात समझना जरूरी है जब व्यक्ति की आवश्यकताए पूरी हो जाती है तब। मतलब इस समाज मे हमे बाकी लोगो के बारे मे सोचना होता है जहां बहुत सारे लोग है जिनकी आवश्यकताएँ भी पूरी नहीं होती उन्हे बहुत ही संगर्ष करना होता है। अतः दिखावे को समाज मे व्यक्ति विशेष के आकलन का आधार बनाना गलत है। व्यक्तिगत रूप से आप क्या करते है। उससे किसी को कोई फर्क नहीं पड़ता। लेकिन जब आपकी कार्यशैली सम्पूर्ण समाज में बदलाव लाती है। और आपकी कार्यशैली के आधार पर व्यक्ति के गुण इत्यादि का आकलन किया जाता है। तब ये महत्वपूर्ण है कि आपकी कार्यशैली को उचित और अनुचित के मानक मे देखने की आवश्यकता है। अतः हम अब हम तय कर सकते है कि दिखावे की जिंदगी का हमारे जीवन में महत्व है या फिर नहीं। 

||इति शुभम्य||

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