इस नवरात्रि घर मे करे सुख समृद्धि का स्वागत

सनातन धर्म के अनुसार हर वर्ष 2 बार नवरात्रि को उपासना पर्व के रूप मे मनाया जाता है। वैसे तो मूलतः सनातन धर्म मे 4 नवरात्रि पर्व का उल्लेख देखने को मिलता है लेकिन जिनमे से 2 नवरात्रि को गुप्त नवरात्रि के रूप मे जाना जाता है और 2 नवरात्रि को सर्वमान्य रूप मे आयोजित किया जाता है।

चैत्र मास की नवरात्रि भगवान राम और माता भगवती दोनों को समर्पित है। वहीं दूसरी तरफ आश्विन मास की नवरात्रि जिसे क्वार मास की नवरात्रि के रूप मे भी जाना जाता है। उसे पूर्ण रूप से माता भगवती की उपासना के रूप मे मनाया जाता है।

माता भगवती ने नव दिन तक असुरों से युद्ध करते हुए देवो और अन्य प्रजातियों को असुरों के प्रकोप से बचाया जाता है। इसी के कारण हम सब उन नव दिन तक व्रत नियम इत्यादि का पालन करते हुए माता की उपासना करते है।

और मान्यता है कि इस नवरात्रि के पावन पर्व पर यदि हम सम्पूर्ण श्रद्धा और विश्वास के साथ माता भगवती की उपासना करें तो उनकी कृपा हम सब पर प्राप्त होती है।

हमारे घर परिवार मे सुख समृद्धि का विस्तार होता है। तो आज इस लेख के जरिये हम बात करेंगे कि किस प्रकार उपासना करे कि माता की कृपा हम सबको प्राप्त हो और हम सबका शुभ हो।

घट स्थापना और दीप दान-

हम सभी जानते है कि नवरात्रि पर्व की शुरुआत हम घट स्थापना से करते है। हमे पूर्ण श्रद्धा के साथ अपने घर के मंदिर मे अथवा किसी स्वच्छ स्थान पर पूर्व अथवा उत्तर दिशा मे माता का ध्यान करते हुए उनका आह्वान करते हुए घट को स्थापित करना चाहिए।

उसपर वस्त्र, पुष्प नैवेद्य इत्यादि अर्पण करते हुए घट के ऊपर मिट्टी के ही पात्र मे जौ का रोपण करना चाहिए। उसके उपरांत माता भगवती को नव दिनों की उपासना हेतु स्थान ग्रहण करने हेतु आह्वान करना चाहिए और एक दीप का प्रज्वलन करना चाहिए जहां तक हो सके तो तो दीप अखंडित नव दिनों तक प्रज्वलित होते रहना चाहिए।

दुर्गा सप्तशती-

यदि आप का संस्कृत उच्चारण सही हो तो आप भगवती की कृपा प्राप्त करने हेतु दुर्गा सप्तशती का पाठ कर सकते है। वैसे तो सनातन धर्म मे किसी भी आराधना के लिए केवल श्रद्धा और विश्वास ही सबसे महत्वपूर्ण होता है लेकिन नवरात्रि मे दुर्गा सप्तशती के पाठ के लिए इस तरीके का प्रयोग करना चाहिए।

जिसके अनुसार संकल्प पाठ करने के उपरांत प्रथम दिन प्रथन अध्याय, द्वितीय दिवस पर द्वितीय और तृतीय अध्याय, तृतीय दिवस पर चतुर्थ अध्याय, चतुर्थ दिवस पर पंचम, षष्ट, सप्तम और अष्टम अध्याय का पाठ, पंचम दिवस पर नवां एवं दशम अध्याय, षष्टम दिवस पर एकादश अध्याय, एवं सप्तम दिवस पर द्वादश एवं त्रयोदश अध्याय का पाठ करते हुए पूर्णाहुति करना चाहिए।

अन्य आराधन विधि-

यदि आपको संस्कृत पाठ करने मे कोई कठिनाइयाँ अथवा त्रुटियाँ हो रही हो तो भी सामान्य चहलीसा और बीज मंत्रो इत्यादि का पाठ करके माता की आराधना की जा सकती है और उनकी कृपा प्राप्त की जा सकती है। सब कुछ हमारे विश्वास पर ही निर्भर करता है। आराधन किसी भी रूप मे की जा सकती है। माता सबकी सच्चे मन से की गई आराधना स्वीकार करती है।

विसर्जन और कंचक पूजन-

नवरात्रि समाप्ती के दिन हमे कलश के विसर्जन का पूजन किया जाता है। उस दिन हम माता का पूजन इत्यादि करने के उपरांत माता को विदा करते है और पुनः अगले नवरात्रि मे उन्हे आने हेतु याचन करके उनकी विदाई करते है।

साथ ही छूती कन्याओं को भोज इत्यादि का प्रदान करते है साथ ही उन्हे कुछ उपहार भी प्रदान करते है। और उन्हे माता के स्वरूप के रूप मे पूजन और उनकी सेवा करते है।

सार-

नवरात्रि का पर्व हमारे लिए बहुत महत्वपूर्ण होता है इस नव दिनों के महापर्व मे हम माता की कृपा प्राप्त करते है साथ ही साथ अपना आध्यात्मिक स्नान करके अपनी स्वच्छता करते है। मन की मलिनता का नाश करना और स्वच्छ हृदया का निर्माण करना भी इस महत्वपूर्ण समय का एक मूल उद्द्येश्य होता है।

दशम दिन हम दशहरा पर्व का भी आयोजन करते है जिसके अनुसार उस दिन असत्य पर सत्य की विजय का पर्व माना जाता है। उस दिन ही भगवान श्री राम ने रावण का संहार किया होता है।

उस दिन हम विजय पर्व के रूप मे मानते है। मान्यता है घट कलश मे उत्पन्न रोपित जौ के कुशों को हम अपने कानों पर धारण करते है और किसी ब्राह्मण अथवा अपने पुरोहित को भोज इत्यादि प्रदान करते है।

साथ ही साथ  मान्यता है उस दिन नीलकंठ पक्षी के दर्शन से हमारा वर्ष सुभ व्यतीत होता है। और संध्या के समय मे हम रावण और कुंभकर्ण के पुतले का दहन करके विजय पर्व को बड़े ही धूमधाम से आयोजित करते है।

निष्कर्ष

अगर बोला जाए तो ये अतिशयोक्ति नही होगा कि नवरात्रि पर्व सनातन धर्म का महत्वपूर्ण और प्रचलित पर्व है यहां तक कि ये भी बोला जाता है कि नवरात्रि पर्व से ही अन्य त्योहारों की शुरुवात होती है इस पर्व में भगवती पूजन के साथ साथ सभी प्रमुख नगरों और गांव में कई आयोजन किये जाते है।

जैसे रामलीला का आयोजन दुर्गा पूजा का आयोजन जिसमे बड़े बड़े पंडालों में माता दुर्गा की अद्भुत प्रतिमाएं स्थापित की जाती है। और नौ दिन उनकी पूजा आराधना होती है। दूर दूर से इनके दर्शन हेतु लोग आते है। और संध्या समय की इन पंडालों की भव्यता देखने ही लायक होती है। साथ ही साथ कई प्रमुख स्थानों पर रामलीला का मंचन होता है। जिसमे राम की गाथा नाटक रूप में प्रस्तुत की जाती है।

इस बार महामारी के चलते शायद इन आयोजनों पर रोक और बाधा हो सकती है लेकिन लोगो के भक्ति भाव में कोई भी कमी देखने को नही मिलेगी।

हम सबको भी हर वर्ष की तरह माता की इस भक्ति काल मे सच्चे मन और भाव से आराधना, अर्चना करनी चाहिए और इस महामारी काल मे सबके स्वास्थ्य की अच्छे रहने की माता से कामना करनी चाहिए। स्वस्थ समाज और सुखी समाज ही एक अच्छे समाज का निर्माण कर सकता है।

||इति शुभम्य||

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