मृत्यु उपरांत मनुष्य की जमा पूंजी- धर्म शास्त्र के अनुसार

मानव ही नहीं बल्कि कोई भी प्राणी हो जब तक उसका जीवन रहता है वो कभी शांत नहीं बैठता उसका पूरा जीवन जीवन के सही संचालन, संसाधनों की तलाश इत्यादि मे ही लगा रहता है। खासकर जब बात मानव की हो तो ये तो अन्य प्राणियों से चार कदम आगे होता है। एक जानवर केवल भूख लाग्ने पर ही शिकार की तलाश करता है लेकिन मनुष्य का पेट भरा रहने पर भी वो कुछ और की चाह मे लगा रहता है।

आज के इस लेख मे हम इसी बात पर चर्चा करेंगे कि जीवन भर सुख संसाधन जुटाने वाले मनुष्य की असली जमा पूंजी क्या है जो मृत्यु उपरांत भी उसका साथ देती है।

कर्म की प्रधानता- भगवान श्री कृष्ण ने गीता के उपदेश मे कर्म को हमारे जीवन का सबसे प्रधान अवयव माना है। हमारा सम्पूर्ण जीवन हमारे पूर्व मे किए गए कर्मों के फल के आधार पर ही निर्धारित होता है। और मृत्यु के पश्चात हमारे कर्म ही हमारी असली पूंजी के रूप मे माना जाता है। गरुण पुराण मे भी हमारे किए गए कर्मों के आधार पर ही हमे स्वर्ग और नर्क प्राप्ति के बारे मे निर्णय लिया जाता है।

दान की महत्ता- सनातन परंपरा मे दान भी एक महत्वपूर्ण अवयव है। मान्यता है दान से बड़ा पुण्य कार्य कुछ और भी नहीं है है। यहाँ दान से तात्पर्य केवल धन वैभव के दान से नहीं बल्कि किसी भी मूल्यवान वस्तु का किसी जरूरत मंद को सहयोग करने से है। हम जो कुछ भी अपने वर्तमान समय मे पूरे मन दान करते है। मृत्यु पश्चात वही दान हमारे पुण्य कर्मो के निर्धारण मे सहयोग करते है।

दान को लेकर एक बड़ा ही अच्छा प्रसंग है जिसके अंतर्गत एक बहुत ही बड़ा साहूकार रहता है। वो बहुत ही अमीर रहता है साथ ही साथ रोज वो सोने की मुद्राएं लोगो मे बांटता था। जब उसका अंत समय आया तो देवदूल उसे यमलोक लेकर गया जहां पर उसे स्वर्ग की प्राप्ति हुई क्योंकि उसने बहुत ही दान पुण्य का कार्य किया था।

लेकिन जब उसे भूख प्यास लगती तो उसे खाने को और पीने को सोना दिया जाता था अब वो सोना तो खा पी नहीं सकता था तो वो बहुत ही व्याकुल रहने लगा। इस संकट के निवारण के लिए वो चित्रगुप्त महाराज के पास गया और उनको अपनी व्यथा सुनाया। इस पर चित्रगुप्त महाराज ने बताया क्घुंकी तुम सोने के अलावा किसी अन्य वस्तु का दान नहीं करते थे इसलिए तुनहे हर प्रयोग के लिए सोना ही प्राप्त हो रहा है।

इस पर उसे अपने गलती का एहसास हुआ और उसने पुनः धरती पर जाने और सभी प्रकार के दान करने का अनुरोध किया और चित्रगुप्त ने उसे धरती पर भेज दिया। इस कहानी मे दान की महत्ता हम देख सकते है कि मृत्यु के पश्चात हमारे दान की प्रवृत्ति हमारी बहुत बड़ी पूंजी का काम करती है।

सर्वजन हिताय की भावना- सनातन परंपरा के अनुसार हर जीव उस परमात्मा का ही अंश है कोई भी अपना अलग अस्तित्व नहीं रखता है। और सभी के जीवन का लक्ष्य भी उस परमात्मा की प्राप्ति करना है। इसलिए सभी जीवों के प्रति स्नेह की भावना उनके हितों की रक्षा करना हम सभी का मूल कर्तव्य है। दूसरे जीवों के हितों के बारे मे अच्छा करके हम जो पुण्य की प्राप्ति करेंगे उसी से हमारे अगले जन्म और मुक्ति इत्यादि के बारे में निर्धारण होगा।

राग द्वेष से मुक्ति- इस संसार मे हम जब तक रहते है हमारे अंदर इच्छाएं राग द्वेष क्रोध ईर्ष्या इत्यादि हमारे मन मस्तिष्क मे कहीं न कहीं रहती है। और जो मानव इन सबसे मुक्ति पा लेता है और जो इन इच्छाओं इत्यादि से परे जीवन यापन करता है। आध्यात्मिक रूप से वो मनुष्य एक संपूर्णता भरा जीवन जी रहा है। अतः इस पूंजी का भी निर्धारण मृत्यु पश्चात के जीवन मे हमारा मार्ग तय करती हैं।

आज के इस भौतिक जगत मे लोक कल्याण जन कल्याण सब कुछ बस किताबी बातें बन कर रह गई है। हम जो कुछ भी कर्म करते है वो बस अपने इस जीवन को सुविधा सम्पन्न बनाने के लिए करते है। हम भक्ति भाव पुण्य दान इत्यादि भी बस इसीलिए करते है जिससे हमारा जीवन सुख सुविधाओं से परिपूर्ण रहे लेकिन निष्काम कर्म की बात हम कभी नहीं सोचते हमारी जो भी जमा पूंजी हम अपने भौतिक जीवन मे जुटते है वो मृत्यु पश्चात और अगले जन्म के लिए किसी भी काम नहीं आती बल्कि हमारा निष्काम कर्म, दया दान की भावना, राग द्वेष से मुक्त जीवन ही हमारी असली पूंजी होती है।

||इति शुभम्य||

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