माँ: समस्त जीवों की प्रथम गुरु और पालनकर्ता

माँ, माता, मम्मी, मॉम, अम्मा, आई इत्यादि न जाने कितने नामों से पुकारा जाता है। लेकिन सबका अर्थ एक ही है। पालनकर्ता जो हमारे मन की बातों को जान सकती है। हमे खुश रखने के लिए कुछ भी कर सकती है। हमे जीना सिखाती है। हमे संसार का साक्षात्कार करती है। हर कदम पर हमारे साथ रहती है। बिना किसी स्वार्थ के हमारे खुशियों का ख्याल रखती है।

माँ का शाब्दिक अर्थ बहुत ही विशाल है। माँ शब्द ही स्वयं मे एक सम्मान है। माता या माँ ये सारे शब्द संस्कृत के मातृ शब्द के समान है जिसे हम किसी इष्ट देवी को संबोधित करने के लिए प्रयोग करते है। यानि की वो स्त्री जो सबसे पूजनीय सबसे सम्मानीय हमरे जीवन मे है। कहते है पुत्र कुपुत्र हो सकता है लेकिन माता कुमाता नहीं हो सकती। ये वाक्य बताता है कि माँ मे कोई भी अवगुण नहीं हो सकता है। आज Mother`s Day के दिन इस लेख के द्वारा हम माँ का असली अर्थ समझने का प्रयास करेंगे। प्रयास ही कर सकते है। जिस शब्द का अर्थ असीमित रूप में हो उसको सम्पूर्ण रूप में समझना मुमकिन नहीं। 

पृथ्वी ही माँ की सही परिभाषा 

अगर हमे माँ के सही अर्थ को समझना होगा तो हमे पृथ्वी अथवा जिसे हम धरती माँ कहते है। उसके समस्त गुणो को समझना होगा। धरती के गुणो के द्वारा जो हम माँ शब्द का अर्थ जान सकते है उतना सटीक अर्थ कोई भी ग्रंथ कोई भी शास्त्र इत्यादि हमे नहीं बता सकते है। हम सब उसके लिए संतान के रूप में है। पुरुष और प्रकृति के वर्णन के द्वारा भी धरती को माँ की संज्ञा दी गई है। जो प्रकृति का एक दृश्यमान स्वरूप है। और ये माँ के रूप में हम सभी प्राणियों का ख्याल रखती है। कुछ बिन्दुओं के द्वारा हम सीमित रूप में इसे इस प्रकार से देख सकते है। 

समान भाव-

माँ का सर्वप्रथम भाव होता है वो अपनी संतानों में किसी भी प्रकार का भेदभाव नहीं रखती है। और पपृथ्वी से अच्छा इसका उदाहरण हमे काही भी देखने को नहीं मिलेगा। पृथ्वी सभी प्राणियो को एक समान रूप से अपना प्यार देती है। वो किसी भी प्रकार से जाति, धर्म, लिंग, भाषा, समुदाय इत्यादि के आधार पर भेदभाव नहीं करती है। सबको समान प्यार और अपने संसधन प्रदान करती है। और यही एक माँ का सबसे बड़ा धर्म एवं गुण होता है कि वो सभी संतानों को एक समान रूप से प्यार और दुलार प्रदान करे। 

सहनशक्ति और शालीनता-

पृथ्वी मे बहुत ही सहनशक्ति और शालीनता होती है। ये एक माता का प्रमुख गुण है। जिस प्रकार से धरती हम सभी जीवो के समस्त अच्छे बुरे कृत्यों को देखती और सहती रहती है लेकिन वो कृत्य अच्छे अथवा बुरे हो हमे फल के रूप में अच्छी चीजें ही प्रदान करती है। यह भी माता या फिर माँ का एक प्रमुख गुण होता है। एक किसान हल लेकर इस धरती को जोतता है जिसके बदले भी ये धरती माँ हमे अन्न का भंडार प्रदान करती है उसी प्रकार हर माँ मे ये गुण होता है की वो हर परिस्थिति मे अपने संतान के हित के बारे में ही सोचती है। 

जीव की प्रथम गुरु 

माँ ही अपने संतान की प्रथम गुरु होती है। जीवन का परिचय माँ के द्वारा ही होता है। जब भी हम अपनी भाषा की बात करते है तो उसे मातृभाषा बोलते है। जब हम अपने जन्मभूमि की बात करते है तो उसे मातृभूमि के रूप में संदर्भित करते है। इसीलिए माँ ही प्रथम शिक्षक होती है। संतान समाज में किस रूप में देखा जाएगा ये माँ के पालन फैशन पर निर्भर करता है। हमारे धर्मग्रंथो और पौराणिक कथाओं मे ऐसी बहुत सारे उदाहरण है उन माँ के जिनहोने अपनी संतानों को  अच्छी शिक्षा के द्वारा समाज में एक अलग ही पहचान दिलाया है। उनमे से कुछ का उदाहरण इस प्रकार से  है। 

शकुंतला और सीता-

ऋषि विश्वामित्र की पुत्री, राजा दुष्यंत की पत्नी ने एक आश्रम मे रहते हुए अपने पुत्र भरत को इतना साहसी और बुद्धि विवेक्षील बनाया कि आज हमारे देश का नाम उस बालक के नाम पर है। पति के विरह को झेलते हुए भी अपने पुत्र के पालन पोषण मे किसी भी प्रकार की कमी नहीं राखी शकुंतला ने जिससे कितने वर्षों बाद भी उनका नाम हम सभी के लिए अनभिज्ञ नहीं है। इसी प्रकार सीता ने राजमहल के सुखसाधनों से दूर होकर भी लव कुश को इतना साहसी और बुद्धिमान बनाया की उन्होने राजसूय यज्ञ के घोड़े को अपने कब्जे मे रखकर अपने पिता को पास आने के लिए मजबूर कर दिया। 

माता यशोदा-

माता यशोदा ने ही सर्वप्रथम ये उदाहरण प्रस्तुत किया कि माँ केवल जन्म देने से ही नहीं बना जा सकता बल्कि वो हर स्त्री माँ होती है जो किसी के पालन पोषण की ज़िम्मेदारी निभाती है। यशोदा और कृष्ण के माँ और पुत्र के प्यार को तो स्वयं सूरदार ने बहुत ही अच्छे से व्यक्त किया है। और शृंगार की एक नयी शाखा का जन्म हुआ जिसे आज भी हिन्दी साहित्य के जानकार वात्सल्य के रूप में जानते है। एक माता और पुत्र के प्रेम और दुलार का इससे सुंदर और अद्भुत वर्णन काही भी देखने को नहीं मिलेगा। 

परिवर्तनहीन माँ का स्वरूप-

माँ एक संज्ञा है। इसे किसी एक व्यक्ति विशेष के द्वारा सीमित नहीं कर सकते है। तो हम कह सकते है माँ का स्वरूप कभी भी परिवर्तित नहीं हो सकता। माँ एक गुण है। किसी व्यक्ति विशेष को हम माँ इसलिए नहीं कहते कि उसने किसी शिशु को जन्म दिया बल्कि उसमे जब ममता का गुण आया, उसमे जब अपने संतान के पालन पोषण की ज़िम्मेदारी ली, उसमे जब सहनशक्ति और शालीनता आई तब उसे माँ के रूप में जाना जाता है। केवल जन्म देने वाली को माँ बोलना माता की परिभाषा को सीमित करना है। हाँ मानते है सामाजिक परिवर्तन के कारण माँ के स्वरूप में भी परिवर्तन देखने को मिलता है। लेकिन इस परिवर्तन से माँ की संज्ञा परिवर्तित नहीं होती बल्कि वो व्यक्ति विशेष माँ के स्वरूप को ग्रहण करने मे असमर्थ है। अतः माँ एक ऐसा गुण है जो हर पालनकर्ता के स्वरूप मे विद्यमान है और परिवर्तनहीन है। 

निष्कर्ष-

माँ जिस शब्द का अर्थ ही असीमित हो उसे न तो एक लेख में सीमित किया जा सकता है और न ही एक लेख के द्वारा सम्पूर्ण रूप में उसकी व्याख्या की जा सकती है। लेकिन इस लेख के कुछ शब्दों के द्वारा उसे समझने का प्रयास किया जा सकता है। माँ कि व्याख्या में असीमितता ही ये बयां करती है कि माँ को समझने के बजाय इसकी ममता के द्वारा इसके वात्सल्य के द्वारा इसे बस अनुभव किया जा सकता है। इसे हम अगर सम्पूर्ण रूप में समझ ही सकते तो इसके कर्जदार नहीं रहते। 

‘नास्ति मातृसमा छाया, नास्ति मातृसमा गतिः।
नास्ति मातृसमं त्राण, नास्ति मातृसमा प्रिया।।’

 

||इति शुभम्य||

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