बाल मन में नैतिकता का उद्भव एवं उत्थान

बाल मन में नैतिकता का उद्भव एवं उत्थान- मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है और समाज में स्थापित रहने के लिए समाज के लोगो के मध्य सामंजस्य होना अति आवश्यक है। और समाज में सामंजस्य बनाए रखने के लिए लोगो में नैतिकता का होना अति आवश्यक तत्व है। किसी व्यक्ति में नैतिकता की भावना एक क्षण में स्थापित नहीं किया जा सकता बल्कि बाल्यकाल से ही नैतिकता का बीज बाल मन में रोपित करना होता है। अगर समाज में सभी एक नैतिक जीवन जीने की शैली को ग्रहण कर लें। तो समाज में खुशहाली और वैमनष्य का मौहल स्थापित रहता है।

आज कल के भौतिकवादी जीवन को देखते हुए हम कह सकते हैं कि लोगों में सहिष्णुता का अभाव देखा जा सकता है जो की एक समाज के लिए बहुत ही घातक साबित हो सकता है। लेकिन अगर हम पुनः नैतिक जीवन की ओर अग्रसर हो तो हम निराशावादी, विषादयुक्त समाज और जीवन से मुक्ति पा सकते हैं।

नैतिक जीवन की परिभाषा- नैतिक जीवन की कोई स्पष्ट परिभाषा नहीं बताई जा सकती क्योंकि इसका मानक देश काल परिस्थिति अनुसार बदलता रहता है। लेकिन अगर सामान्य शब्दों में नैतिक जीवन को परिभाषित किया जाये तो हम कह सकते है, ऐसी जीवन शैली जो सर्व समाज को मान्य हो तथा जो उस समाज के विधि विधानों के अंतर्गत हो। तथा जो जीवन आप जी रहे है। उससे किसी व्यक्ति या समाज को कोई आपत्ति या हानि का अनुभव न हो। प्रायः हम देखते है कि हर समाज किन्ही आदर्शो एवं विचारों पर संचालित होता है। तो उनही आदर्शो और विचारों का पालन करते हुए जीवन यापन ही नैतिक जीवन यापन की श्रेणी में आता है।

नैतिकता का रोपण- नैतिकता कोई कक्षा या विद्यालय नहीं होता जहां से उसे सीखा जा सके बल्कि एक बीज जो विकसित होकर वृक्ष का रूप धारण करता है। उसी प्रकार बाल मन में नैतिकता को रोपित किया जाना ही सही प्रक्रिया होगी। अगर बात करें नैतिकता का रोपण के लिए कौन कौन व्यक्ति या संस्थाएं जिम्मेदार है तो यह समाज में उपस्थित वो सभी तत्व जो समाज का हिस्सा है। उनको इस ज़िम्मेदारी का हिस्सा होना चाहिए एवं खुले विचारों से इसमे उन्हे समाज को योगदान देना चाहिए। जिससे एक सभ्य और सुव्यवस्थित समाज का संचालन हो सके। फिर भी कुछ प्रमुख तत्व का विवरण इस प्रकार से है।

1. परिवार- परिवार ही एक व्यक्ति विशेष के लिए शूक्ष्म संसार होता है। व्यक्ति जो कुछ भी होता है। उसका विचार, व्यवहार, जीवनशैली सब कुछ उसके परिवार पर ही निर्भर करता है। अक्सर हम देखते है यदि कोई व्यक्ति कोई गलत काम को अंजाम देता है। तो लोग यही बोलते है कि परवरिश का असर है। परिवार को ही व्यक्ति का प्रथम पाठशाला माना गया। प्रायः हम देखते है अगर कोई परिवार बहुत ही धार्मिक, शांत प्रवृत्ति के होते है तो उस परिवार के सभी सदस्यों पर उसका असर पढ़ता है। इसलिए परिवार का ही प्रथम कर्तव्य होता है कि वो अपने बच्चों में नैतिक जीवन के आदर्शों का रोपण करें एवं नैतिक जीवन जीने के लिए प्रोत्साहित करें।

परिवार की महत्ता इसलिए भी बढ़ जाती है कि यदि बाल्यकाल से ही बच्चे के मन में आदर्शों, अच्छे विचारों का विस्तार या महत्व बताया जाये तो आगे भी जब वो समाज से अवगत होगा तो समाज कि कुरुतियों का उसपर दुस्प्रभाव नहीं होगा।

उदाहरण स्वरूप देखा जाए यदि किसी परिवार में संतुष्टि के बजाय भौतिक संसाधनों कि महत्ता अधिक राखी जाती है तो उन परिवारों के बच्चों मे भी बचपन से ही किसी भी प्रकार से भौतिक संसाधनों को पाने को लोलुपता बढ़ जाती है। जिस कारण से कहीं न कहीं उस व्यक्ति का जीवन में नैतिक रूप से पतन होना शुरू हो जाता है। वहीं दूसरी तरफ यदि किसी परिवार में मानसिक संतुष्टि और लोगों के प्रति प्रेम और सद्भाव कि महत्ता देखि जाती है तो उस परिवार के हर सदस्यों में नैतिकता का स्टार बहुत ही उच्च रहता है। अतः कह सकते है व्यक्ति में नैतिकता के रोपण और विस्तार हेतु परिवार का बहुत ही महत्वपूर्ण योगदान है।

2. सामाजिक संस्थाएं- परिवार के बाद व्यक्ति समाज में सबसे ज्यादा जुड़ाव सामाजिक संस्थाओं से रखता है। सामाजिक संस्थाओं को हम सीमित रूप में परिभाषित नहीं कर सकते। वो सभी संस्थाएं जो इस समाज में लोगो के समूह के रूप में उपस्थित है वो किसी न किसी रूप में सामाजिक संस्थाओं के दायरे में आती है। उदाहरण स्वरूप- विद्यालय, राजनैतिक पार्टियां, सामाजिक समूह, मित्र मंडली, रिश्तेदारों का समूह इत्यादि।

ये सभी किसी न किसी रूप में सामाजिक संस्थाओं के रूप में आती है। अब विद्यालय को ही लिया जाए चाहे वो प्राथमिक स्तर का हो या फिर विश्वविद्यालय सभी संस्थाओं में हमें कुछ न कुछ सीखने को ही मिलता इस सीखने के क्रम में उस विद्यालय की वैचारिकी कहीं न कहीं हमारे मन मस्तिष्क में घर कर जाती है। जिसका असर हमारे विचारों एवं व्यवहार में देखने को मिलता है।

उपरोक्त के आधार पर कहा जा सकता सभी सामाजिक संस्थाओं का किसी न किसी रूप में हमारे मन मस्तिष्क पर प्रभाव पड़ता है। फिर चाहे वो राजनैतिक पार्टियां हो मित्र मंडली हो या फिर कोई और इन सभी के संपर्क में आने पर हमारे विचारों, व्यवहार इत्यादि का असर पड़ता है। जिसके कारण हमारा नैतिक उत्थान एवं पतन दोनों ही संभव निर्भर करता है, किस तरह की सामाजिक संस्था के संपर्क में हम है।

ये हमारा स्वविवेक ही एक मात्र अस्त्र है जो हमे नैतिक पतन करने वाली संस्थाओं से हमे दूर रखे। या फिर मई पुनः कहना चाहूँगा परिवार जो व्यक्ति की प्राथमिक पाठशाला होती है। उसे दिये गए आदर्शों के आधार पर अच्छे बुरे सामाजिक संस्थाओं का चयन कर सके। इसीलिए मैंने नैतिकता के रोपण हेतु परिवार को एक महत्वपूर्ण संस्था मानता हूँ।

निष्कर्ष

मनुष्य ही एक ऐसा प्राणी है जिसमें स्वविवेक पाया जाता है। जो समाज का निर्माण करता है। जहां लोग एक दूसरे से मिलजुल कर रहे। अकेला व्यक्ति अपनी समस्त आवश्यकताओं की पूर्ति नहीं कर सकता है। इसीलिए मनुष्य ने समाज का निर्माण किया जिससे एक दूसरे की आवश्यकताओं की पूर्ति होती रहे। तथा इस समाज को सुचारु रूप से चलाने के लिए उसने कुछ आदर्श स्थापित किए एवं इन आदर्शों को सुचारु रूप से स्थापित रखने के लिए विधि एवं नियम परिपादित किए।

इन्ही आदर्शों के अनुरूप जीने की काला को नैतिक जीवन के रूप में देखा जाता है। यदि व्यक्ति नैतिक जीवनशैली को ग्रहण नहीं करता और सभी मनुष्य ऐसा करने लगे तो यह सुव्यवस्थित समाज टूट जाएगा। और हम पशुओं के जैसे जीवन जीने को मजबूर हो जाएँगे। इन आदर्शों के पालन हेतु तथा समाज की अखंडता को बचाए रखने हेतु हमे अपने, अपने बच्चों एवं पारिवारिक सदस्यों के मध्य नैतिकता का रोपण एवं उसे विकसित करने का प्रयास करते रहना चाहिए।

!इति शुभम्!

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