सभ्य समाज के निर्माण हेतु बच्चों के प्रति माता पिता की नैतिक ज़िम्मेदारी

moral responsibility of parents- Kissa Kahani

आज के इस प्रतिस्पर्धा से भरी दुनिया मे हमे लगता है कि हमारे बच्चों के प्रति हमारी ज़िम्मेदारी बस इतनी ही है कि उन्हे अच्छे से पढ़ा लिखा कर इस समाज मे सम्मानित इंसान बना सके और कहीं न कहीं ये सही भी है लेकिन जब इस सम्मानित इंसान जैसे शब्द को हम आज के परिवेश मे परिभाषित करते है तो हमे कहीं न कहीं खोखला महसूस होता है।

इसीलिए आज के इस लेख मे हम जानने का प्रयास करेंगे कि हमारे समाज, संस्कृति और धार्मिक मान्यताओं के अनुसार हमारी क्या नैतिक ज़िम्मेदारी बनती है अपने बच्चों को समाज मे एक उच्च स्थान प्रदान करने के लिए एक सम्मानित जीवन की ओर अग्रसर करने के लिए और एक सभ्य समाज के निर्माण के लिए। तो आज हम कुछ अवयवों की बात करेंगे जिनके जरिये हम अपने विषय को स्थापित करने का प्रयास करेंगे।

वसुधैव कुटुम्बकम् की भावना- हम जिस समाज मे रहते है उसके प्रति अपना पैन होना बहुत ही आवश्यक है जैसा कि हम जानते है मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है तो किसी भी व्यक्ति को रहने के लिए एक समाज की आवश्यकता है विरले ही कोई व्यक्ति होगा जो एकाकी जीवन को सम्पूर्ण रूप मे धारण कर सके। और इस समाज मे रहने के लिए इस समाज के सभी प्राणियों जीवों और इसके समस्त संज्ञाओं के प्रति हमे प्रेम का भाव बनाए रखना अति आवश्यक है। जिसके लिए वसुधैव कुटुम्बकम् की भावना अपने बच्चों मे शुरू से उत्पन्न करना अति आवश्यक है और माता पिता की नैतिक ज़िम्मेदारी है।

बड़ों का सम्मान- हमे शुरू से ही अपने बच्चों मे ये प्रमुख आदत डालना अति आवश्यक है। और जिसके लिए आवश्यक है कि इस गुण का अनुशरण हम अपने जीवन मे भी करे जब हमारे बच्चे इस भावना को देखेंगे तो स्वतः ही वो इसका अनुशरण करने लगेंगे। हमारे संस्कृति मे बड़ों से आशीर्वाद लेने का प्रचालन है भले ही आज के समाज मे ये गुण कहीं विलुप्त होता जा रहा है लेकिन फिर भी इसको बनाए रखना हमारी ज़िम्मेदारी है और इसलिए माता पिता की नैतिक ज़िम्मेदारी है है कि बच्चों मे ऐसी भावना का प्रसार करें।

दया की भावना- इस संसार के समस्त जीवा प्राणी का एक समान अधिकार है अपना जीवन जीने का और किसी भी जीव को कष्ट पहुँचने का हमारा कोई अधिकार है। धार्मिक रूप से या फिर सामाजिक रूप से दोनों रूपों मे हमे उनके साथ की आवहसयकता है और दया की भावना का अनुशरण कर हम सभी जीवों के प्रति प्रेम उत्पन्न कर सकते है।

करुणा की भावना- करुणा शब्द को हम सामान्य रूप मे रुदन शब्द से परिभाषित करते है लेकिन करुणा शब्द का मूल अर्थ है सभी के प्रति भावनात्मक रूप से जुड़ना करुणा की भावना ही हमे किसी के सुख दुख को समझने की शक्ति प्रदान करता है किसी के मर्म या हर्ष के प्रति संवेदनशीलता प्रदान करता है। किसी असहाय की सहता करने की भावना पैदा करता है और इस भावना से जुड़ा इंसान ही आगे चलकर एक अच्छा और सम्मानित इंसान कहलाने का अधिकारी होता है।

ईमानदारी और सत्यनिष्ठा की भावना- चाहे वो समाज हो, हमारा देश हो, हमारा परिवार हो या फिर कोई अन्य सभी के प्रति ईमानदारी की भावना और सत्यनिष्ठा की भावना एक इंसान को किसी भी रूप मे गलत मार्ग की ओर बढ्ने से रोकती है। जो कि किसी भी रूप मे एक इंसान के मानव जीवन जीने के स्वरूप का निर्माण करती है अतः बच्चों मे अपने लाभ हानि के बारे म एसोचे बगैर ईमानदारी और सत्यनिष्ठा के मार्ग पर चलने को प्रेरित करना चाहिए।

संतुष्टि की भावना- मान्यता है कि किसी भी प्रकार के मानव दोष का सबसे प्रमुख कारण है लोभ की भावना जब हमारी इच्छाएँ हमारे मन और मस्तिष्क पर कब्जा कर लेती है तब हम सही और गलत का निर्णय करने मे असमर्थ हो जाते है। और जीवन के मार्ग मे भटक जाने का डर व्याप्त हो जाता है। वहीं यदि मानव मे संतुष्टि की भावना हो तो इस लोभ के मार्ग मे फसने से हम बच सकते हैं। अतः हर माता पिता की ये नैतिक ज़िम्मेदारी है कि वो अपने बच्चों मे संतुष्टि की भावना का संचार करें।

हमे मालूम है आज के समाज को देख कर मै कह सकता हूँ कि बहुत सारे लोगो को लगेगा कि ऊपर जो बिन्दु बताए गए है वो सुने मे तो अच्छे है लेकिन आज के समाज मे उनका अनुशरण करना इस बहूटिक जगत मे उचित नहीं लगेगा। लेकिन अगर हर कोई यही सोचने लगेगा तो फिर हमे किसी और से भी इस प्रकार की भावना की इच्छा नहीं रखनी चाहिए जो कि मानव के सामाजिक ढांचे नाश करने के बारा बार है।

और यदि शुरू से ही हम अपने बच्चों मे इन गुणों का संचार करेंगे तो हम एक सभ्य और सुव्यवस्थित समाज बनाने मे सहयोग प्रदान करेंगे। और एक बात ध्यान देना अति आवश्यक है कि इन भावनाओं को केवल अपने बच्चों मे संचार करने से मात्र काम नहीं चलेगा बल्कि इंका अनुशरण हमे अपने स्वयं के जीवन मे भी करना अति आवश्यक है, क्योंकि हमारे बच्चे ज़्यादातर चीजे हमारे क्रिया कलापों को देखकर ही सीखते है। तो आइये अपने जीवन और अपने बच्चों के जीवन मे इन गुणों को संचारित करें और एक सभ्य और सुव्यवस्थित समाज का निर्माण कर अपनी नैतिक ज़िम्मेदारी की पूर्ति करें।

||इति शुभम्य||

Similar Posts

Leave a Reply