राजा भार्ता की मोक्ष यात्रा- कथा प्रसंग

महर्षि विश्वामित्र (Vishvamitra)

भारतीय सनातन धर्म परंपरा मे मोक्ष का बहुत ही ज्यादा महत्व है। कर्म और कर्म फल के लिए और ईश्वर ध्यान साधना के जरिये मोक्ष और उस परम सत्ता की प्राप्ति ही परम लक्ष्य है। आज हम एक कथा प्रसंग सुनेंगे जिसमे एक राजा किस प्रकार से अपनी मोक्ष यात्रा पूरी करता है और। और उस कथा से हमे जो शिक्षाएं मिलेंगी उन्हे भी जानने का प्रयास करेंगे।

एक समय की बात है किसी नगर मे भार्ता नाम के एक राजा रहते थे। उनका साम्राज्य बहुत ही सम्पन्न और खुशहाल था राजा बहुत ही धार्मिक प्रवृत्ति के व्यक्ति थे। सनातन धर्म की परंपरा और आश्रम व्यवस्था के अनुसार अपनी आयु होने के कारण उन्होने सम्पूर्ण राजपाट अपने पुत्र को देकर गृह त्याग कर ध्यान साधना हेतु सन्यास आश्रम ग्रहण करने का विचार बनाया और वन की ओर प्रस्थान किया।

हिरण के बच्चे मे आसक्ति-

वन मे राजा एक छोटी सी कुटिया बना कर रहते थे और रोज दैनिक निवृत्ति उपरांत ईश्वर ध्यान और साधना मे लगे रहते थे। एक दिन की बात है राजा के कुटिया के पास की नदी के किनारे एक गर्भवती हिरण घास चार रही थी और तभी एक सिंह वहाँ पर आ गया शेर से डर कर हिरण ने नदी की ओर लंबी चालांग लगा दी। और जिसके कारण उसके बच्चे का जन्म हो गया और हिरणी ने वही पर प्राण त्याग दिया ये वाकया जब राजा ने देख तो उन्होने नदी मे गिरे हिरण को बचा लिया और उसका पालन पोषण करने लगे।

राजा का उस हिरण के बच्चे से बहुत ही लगाव हो गया था। वो जब भी विचरण करने वन मे जाता तो राजा का मन उसी मे लगा रहता वो उसका पूरा ध्यान रखता उसकी देखभाल उसका खाने पीने का ख्याल हर चीज का ख्याल रखते। धीरे धीरे उनका मन उस हिरण के बच्चे मे पूरी तरह से राम गया और अब जब और समय बीतता गया जब राजा का अंत समय आया तब भी वो हिरण के बच्चे के बारे मे ही सोचते रहे कि उनके बाद उसका ध्यान कौन रखेगा और एक दिन उनकी मृत्यु हो गई।

राजा का हिरण के रूप मे जन्म-

राजा की मृत्यु के बाद उनका जन्म हिरण के रूप मे हुआ। लेकिन इसपर भी उन्हे अपने पूर्व जन्म के बारे मे पूरा ज्ञान था और राजा जो कि एक हिरण थे उनका अन्य हिरण के साथ मन नहीं लगता था और वो जंगल मे ही एक महर्षि की कुटिया मे रहते और वहाँ पर उपनिषद, शास्त्र इत्यादि का ज्ञान सुनते रहते। और ऐसे ही उन्होने अपना हिरण का सम्पूर्ण जीवन बिताया।

राजा का ब्राह्मण के रूप मे जन्म-

इसके बाद राजा का तीसरा जन्म एक ब्राह्मण के घर मे हुआ वो एक सम्पन्न परिवार था। लेकी राजा को इस बार भी अपने पिछले दो जन्मो का संज्ञान था और अपनी मुक्ति न होने के कारण वो बहुत ही दुखी थे और जन्म से ही उन्होने अपनी वाणी पर विराम लगा लिया किसी से भी बोलते चलते नहीं थे हमेशा अपने विवेकी मन के ध्यान मे रहते थे। जो कुछ भी मिलता खा लेते थे। समय बीतने के साथ उनके पिता की मृत्यु हो गई और उनके भाइयों ने उनके शांत स्वभाव के कारण उनके हिस्से की संपत्ति आपस मे बाँट ली।

इतना कुछ होने के बाद भी उन्होने किसी से भी किसी प्रकार का बहस या कलह नहीं किया क्योंकि उनका मन पूरी तरह से उनके उद्देश्य यानि मोक्ष मे था। अपने मे खोये रहने वाले राजा भार्ता अपने ज्यादा समय मे लोगो से दूर एक पेड़ के नीचे बैठे रहते एक दिन एक राजा की सवारी वहाँ से गुजर रही थी। वो एक पालकी मे बैठे थे जिसे दो जन उठा कर ला रहे थे उनमे से एक के पैर मे चोट लग गई और पालकी रोकनी पड़ गई।

इस पर राजा ने ब्राह्मण यानि भार्ता से पालकी उठाने को कहाँ जिसके बदले मे उन्हे धन देने को बोला और उन्हे कार्य मे लगा दिया। पालकी ले चलते समय भार्ता द्वारा पालकी डगमगाने लगती इसपर राजा ने उन्हे डांट लगाई और उन्हे मूर्ख कहा। इसपर भार्ता को ये बात नागवारा लगी और पहली बार उन्होने मुह खोला और राजा को बोला हे राजन तुम मुझे मूर्ख कह रहे हो। अगर मई मूर्ख हूँ तो तुम भी मूर्ख हो क्योंकि इस जगत मे सबकोई एक ही सत्ता का अंश है हमारी आत्मा उसी परम सत्ता का अंश है।

यदि तुमने मेरी आत्मा को मूर्ख बोला तो तो ये सही नहीं क्योंकि आत्मा मे कोई गुण या दोष नहीं ये पूरी तरह से पवित्र है। और यदि तुमने इस शरीर को मूर्ख बोला तो हाँ मई मूर्ख हूँ तभी तो इस मोह माया के भ्रम से मुक्त नहीं हो पा रहा हूँ। इस पर राजा को ज्ञान हुआ की ये व्यक्ति कोई बेकार नहीं बल्कि कोई ज्ञानी पुरुष है। और राजा ने उनसे क्षमा मांगी। और इसके कुछ क्षण पश्चात भार्ता की आत्मा उनका शरीर त्याग कर मुक्त हो गई और उन्हे मोक्ष की प्राप्ति हुआ।

निष्कर्ष-

ऊपर मैंने एक कथा प्रसंग लिखी है शायद ये कथा आपको इतना प्रभावित न करे लेकिन मेरा उद्देश्य आपको इस कथा के जरिये प्रभावित करना नहीं बल्कि इस कथा मे जीवन और मोक्ष से संबन्धित उन रहस्यों के बारे मे बताना है जो हमे जानना चाहिए। उन रहस्यों को समझने के लिए हमे चरण बद्धह तरीके से समझना होगा।

प्रथम राजा कि मृत्यु के बाद वो हिरण बने जबकि उन्होने सन्यास धर्म का पालन कर लिया था क्योंकि उनका मन पूर्ण रूप से ईश्वर मे नहीं लगा उनका मन इस संसार के मोहा बंधन मे लगा रहा। और मान्यता है हमारे अंतिम समय मे हमारा मन जिस विषय वस्तु मे लगा रहेगा अगले जन्म मे हम वही कुछ प्राप्त करेंगे और इसी कारण से राजा का जन्म एक हिरण के रूप मे हुआ।

द्वितीय हिरण बनने के बाद भी राजा का कर्म अच्छा होने के कारण उनमे सात्विकता थी और उनही कर्मो के कारण उन्होने एक अशरम मे उपनिषदों और शास्त्र धर्म इत्यादि का ज्ञान ग्रहण किया।

और तृतीय एवं अंतिम जन्म मे उन्हे धर्म का ज्ञान हो गया और मौन रहकर उन्होने उन्होने एटीएम ज्ञान भी प्राप्त किया और जब स्वयं या एटीएम ज्ञान प्राप्त कर लिया तब उनको इस संसार से मुक्ति मिली। इस कथा को बताने का मूल उद्देश्य यही है कि हम जब तक खुद को नहीं पहचानेगे या फिर इस संसार के विषय आसक्ति से दूर नहीं होंगे तब तक हम मोक्ष की कामना या प्राप्ति नहीं कर सकते है।

||इति शुभम्य||

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