मानसिक मजबूती से शारीरिक मजबूती- दार्शनिक विवेचना

आज की दौड़ भरी जिंदगी में मानव सब कुछ पाने में सक्षम है। तकनीकी और नए संसाधनो के जरिये मानव के पास हर तरह की सुख सुविधाएं उपलब्ध है। लेकिन जो उसके लिए अति आवश्यक है केवल उसी की उसके पास कमी है। हम बात कर रहे है।

मानसिक मजबूती से जो की उसके शारीरिक मजबूती के लिए भी आवशयक तत्व है। हम माने या न माने लेकिन मानव सभी प्रकार के सुख सुविधाओं से परिपूर्ण जीवन जीने के बावजूद मानसिक रूप से बहुत ही कमजोर है।

उसमे मानसिक स्वास्थ्य के मूल तत्व संतुष्टि, शांति, सुकून इत्यादि की कमी है। और इसी के बढ़ते क्रम में भले ही आज हम चिकित्सा स्वास्थ्य सेवाओं के मामले में कितने भी मजबूत है। लेकिन शारीरिक रूप से बहुत ही कमजोर है। तो अब हम इसकी दार्शनिक विवेचना करेंगे।

मानसिक स्वास्थ्य के लक्षण –

अगर बात करे मानसिक स्वास्थ्य के लक्षण की तो हम सामान्य शब्दों मे कह सकते है कुछ अवयव इसे तय करते है।

संतुष्टि-

सबसे जरूरी अवयव है संतुष्टि अगर हम अपने जीवन में संतुष्टि का एहसास करते है तो हम पाएंगे कि हम सच में मानसिक रूप से स्वस्थ हैं। अब बात आती है संतुष्टि आएगी कैसे तो हमे अपनी क्षमता के अनुरूप ही अपना जीवन यापन करने मे मजा आना चाहिए।

लोलुपता कही न कही हमारे मानसिक संतुष्टि की राह मे रोड़ा बनती है। उसी प्रकार हमे हमेशा कुछ प्राप्त करने हेतु मन में कुंठा नहीं बना कर रखनी चाहिए। जितनी हमारी क्षमता हो उतना ही हम प्राप्त कर सकते है बस हमे अपना पूरा परिश्रम करते रहना है।

व्यस्तता की गलत परिभाषा-

आधुनिक जीवन में जिसे हम व्यस्तता कहते है वो कहीं न कहीं बंधन है। व्यस्तता हम उसे नहीं कह सकते जिसमे हम अपने को हमेशा कुछ पाने की इच्छा मे श्रम करते रहे बल्कि व्यस्तता उसे कहेंगे जहां हमे पुनः प्रथम अवयव यानि संतुष्टि का एहसास हो।

समाज से जुड़ाव-

आज के व्यस्ततम जीवन में हम इतने मशगूल हो गए है कि हम समाज में रहते हुए भी समाज से कटते जा रहे है। हम केवल उन लोगो से ही मिलते जुलते है। जिनसे हमे कोई लाभ या कोई आवश्यकता पूरी होती है।

उदाहरण स्वरूप देखे तो बड़े शहरों में लोग अपने पड़ोशी तक को नहीं जानते। तो थोड़ा समय उनके लिए भी रखे नए लोगो से बिना किसी लाभ के मिले उनसे मित्रता करे उनसे बाते करे। और इस समाज से जुड़े रहे, क्योंकि आखिरकार मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है।

प्राथमिकताए-

आज के समय में मनुष्य अपनी प्राथमिकताए बदलते जा रहा है। उसे किससे कितना लाभ या हानि है उसकी गणना करने के बाद ही वो अपनी प्राथमिकताए तय करता है। लेकिन कभी भी बिना किसी लाभ या हानि के वो अपनी प्राथमिकताए तय नहीं करता है।

उदाहरण के रूप में एक मनुष्य यदि किसी की मदद करने की सोचता है तो वहाँ भी वो उससे प्राप्त होने वाले लाभ या हानि के बारे में सोच कर ही मदद करेगा।

समय का अभाव-

आज मानव के पास समय का अभाव इतना है कि वो आफ्नो से भी दूर होता जा रहा है। पहले तो अपने घर परिवार से दूर कहीं रहता है और जीवन में इतना व्यस्त हो जाता है कि अकेलेपन के अंधकार में फँसता जाता है।

लेकिन वहीं यदि वो थोड़ा समय निकाल के अपने परिवार इत्यादि से मिलता जुलता है और उनसे अपने सुख दुख का साझा करता है। तो कहीं न कहीं वो मानसिक रूप से स्वस्थ्य हो सकता है।

आध्यात्मिक अनुभव-

मानसिक मजबूती के लिए सबसे महत्वपूर्ण अवयव है आध्यात्म। अगर आप जीवन आध्यात्म का अनुभव कर लेते है। तो आप मानसिक रूप से बहुत ही मजबूत प्राणी है। आध्यात्मिक अनुभव उपरांत कोई व्यक्ति प्राणी प्राणी में भेद नहीं करता और उसके मन में हर व्यक्ति विषय के प्रति प्रेम का संचार होने लगता है।

द्वितीक आध्यात्मिक अनुभव प्राप्त व्यक्ति जीवों मे भेद करना बंद कर देता है अतः स्मजिक विकार जैसे द्वेष ईर्ष्य इत्यादि उसके मन में नहीं निवास करते और तृतीय आध्यात्मिक अनुभव प्राप्त जीव लोभ इत्यादि नहीं पनपने देता और उसकी इच्छाएं शांत हो जाती है जो उसके मन में संतुष्टि का संचार करती है अतः आध्यात्म हर प्रकार से मनुष्य को मानसिक रूप से मजबूत बनाता है।

मानसिक स्वास्थ्य से शारीरिक स्वस्थ्य प्राप्ति-

जैसा की हमने पहले ही बोला है यदि व्यक्ति मानसिक रूप से मजबूत है तो वो शारीरिक रूप से मजबूत होगा। हमारा सम्पूर्ण शरीर हमारे मन मस्तिष्क से ही संचालित होता है। और यदि हमारा मन मस्तिष्क मजबूत होगा तो हमारे अंदर कई परिवर्तन जैसे निर्णय लेने की क्षमता, हमारे जीवन मे खुशहाली का अनुभव होगा।

जो हमे शारीरिक रूप से भी स्वस्थ बनाएगी। इसी प्रकार जब हम मानसिक रोप से स्वस्थ रहेंगे तो हमारे दिनचर्या भी कहीं न कहीं अच्छी स्वरूप में होगी जिससे हमारे शरीर को अच्छी ऊर्जा प्राप्त होगी, जो हमे शारीरिक रूप से स्वस्थ बनाएगी।

निष्कर्ष-

हमारे सभी शारीरिक विकार प्रत्यक्ष एवं परोक्ष दोनों ही रूप में मानसिक विकार से उत्पन्न होते है। और इन विकारों का प्रमुख कारण के रूप में हमारी भाग दौड़ भरी जिंदगी जिम्मेदार है। हम ज़िदगी को अलग ही राह में लेकर चले गए है।

जो हमे भले ही लगता हो की हम अपना भला कर रहे पर कहीं न कहीं हम अपना अहित कर रहे है। और इस लक्ष्यहीन जीवन के मकड़ जाल में फँसते ही जा रहे है। और विकारो से भरे मन मस्तिष्क और जीवन के साथ जीए जा रहे है।

लेकिन कहते है न जब जागो तभी सबेरा तो अभी भी देर नहीं हुई है। मनुष्य मे इतनी क्षमता होती है कि वो कमियों मे सुधार कर सकता है। इसीलिए अभी समय है हम अपने जीवन चर्या में थोड़ा सा बदलाव लाकर अपने इस अमूल्य जीवन में परिवर्तन ला सकते है।

और एक लाभकारी जीवन का अनुभव कर सकते है। जीवन मे शांति और संतुष्टि, जिसकी कमी हमे हमेशा खलती है उसे प्राप्त कर सकते है। ये सब हमारे हाथ में है बस जरूरत है अपनी सोच को बदलने की हमारी सोच हमारे समाज को देखने के नजरिए को भी बदल देगी। और हम एक स्वस्थ और सुंदर, प्रेम से परिपूर्म, बिना विकारों के समाज का निर्माण करेंगे।

||इति शुभम्य||

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