महाशिवरात्रि: गौरी शंकर विवाह का अनुपम पर्व

फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष में त्रयोदशी तिथि को शिव पार्वती के विवाह का पर्व बड़े ही धूम धाम से मनाया जाता है। इस दिन को महाशिवरात्रि के रूप में जाना जाता है। सनातन धर्म में महाशिवरात्रि पर्व को सभी लोग बड़े ही हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। लोग व्रत पूजन लारते हुए रात्रि में शिव बारात निकलते है और शिव विवाह का आनंद लेते है। कई समाजो ने तो शिव विवाह के जरिये किसी गरीब जोड़े का विवाह करने का भी हर वर्ष बीड़ा उठा रखा है, जो की धर्म के पालन के साथ साथ एक परोपकार का कार्य भी माना जाएगा। सनातन धर्म में तीनों देवो को सृष्टि के संचालन हेतु कार्य बंटे हुए। जिनमे ब्रह्मा का कार्य निर्माण से जुड़ा है विष्णु का कार्य पालन पोषण से जुड़ा है। और देवाधिदेव शिव का कार्य सृष्टि मे नियंत्रण रखने हेतु संहारक के रूप में है। शिव संहारक के रूप में होते हुए भी परम दयालु और परम कृपालु के रूप में माने जाते है। उन्हे प्रसन्न करना बहुत ही आसान है तथा उनके भक्तों पर उनकी कृपा हमेशा बनी रहती है। इसी कारण भी अपनी मुक्ति और खुशहाली के लिए सभी जन महाशिवरात्रि के व्रत एवं पूजन का बड़े ही धूम धाम से आयोजन करते है। तो आइये विस्तार से महाशिवरात्रि के पर्व को जानने का प्रयास करते है।

शिव-सती और पार्वती

शिव का प्रथम विवाह ब्रह्मा के पुत्र प्रजापति दक्ष की पुत्री से हुआ था। पौराणिक ग्रंथो से पता चलता है कि प्रजापति दक्ष की 28 पुत्रियों में से 27 का विवाह चंद्र देव से हुआ है। जिसे हम 27 नक्षत्रों के नाम से जानते है। तथा प्रजापति दक्ष की प्रथम पुत्री सती ने अपने जप तप के द्वारा भगवान शिव को अपने पति के रूप में प्राप्त किया। प्रजापति दक्ष अपने पुत्री के इस निर्णय से प्रसन्न नहीं थे और शिव से घृणा करते थे। एक समय की बात है प्रजापति दक्ष ने बहुत ही विशाल यज्ञ का आयोजन किया। तथा सभी देवी देवताओं को आमंत्रित किया। किसी भी यज्ञ में तीनों देवो के लिए एक अलग आसान का निर्माण करने की रीति है। परंतु दक्ष ने न तो शिव के लिए आसान का निर्माण किया और न ही उनको आमंत्रित किया।

माता सती पिता के घर आयोजन को देखते हुए वहाँ जाने का निर्णय किया शिव के मना करने के बाद भी वो अपने पिता के घर आयोजन में शामिल होने गई। और वह जाकर देखा की उनके पिता ने तीनों देवो के बजाय केवल ब्रह्मा और विष्णु हेतु आसान का निर्माण कर रखा है। हालांकि शिव को न बुलाने के कारण ब्रह्मा और विष्णु भी उस आयोजन में शामिल नहीं हुए। साथ ही दक्ष ने माता सती के सामने भगवान शिव को बहुत ही अपमानित किया। जिससे दुखी होकर माता सती मे अपनी आहुती यज्ञ कुंड में दे दी। जिससे रुष्ट होकर शिव ने अपने गण वीरभद्र के द्वारा दक्ष का शीश उनके शरीर से लग करवा दिया। परंतु जब लोगो ने उनसे प्रार्थना की तो उन्होने एक बकरे का शीश दक्ष को लगा कर क्षमा दान दिया।

उपरोक्त घटना के कई समय उपरांत पर्वतराज हिमालय और मैना देवी के घर पुत्री का जन्म हुआ जिनका नाम पार्वती रखा गया। पर्वतराज हिमालय स्वयं ब्रह्मा के पुत्र के रूप में जाने जाते है। तथा मैनादेवी शुवर्णपर्वत मेरु की पुत्री है। देवी पार्वती को देवर्षि नारद के द्वारा भगवान शिव को तप के द्वारा प्रसन्न कर उनको पति के रूप में पाने की बात काही गई। जिस हेतु देवी पार्वती ने घोर तपस्या कर भगवान शिव को प्रसन्न किया तथा उनको अपने पति के रूप में पाने हेतु वरदान मांगा। शिव ने उन्हे बहुत समझाने का प्रयास किया कि वो कुछ और वरदान मांग ले। लेकिन देवी पार्वती ने शिव को मानसिक रूप से अपने पति के रूप में मानने की बात कही जिसके उपरांत दोनों का विवाह बहुत ही धूम धाम से मनाया गया। जिसे ही आज हम महाशिवरात्रि पर्व के रूप में मानते है।

महाशिवरात्रि महात्म्य

महाशिवरात्रि पर्व के महात्म्य को जानने के लिए एक कथा इस प्रकार से है। एक समय की बात है। सुंदर नाम का एक शिकारी था अपनी आजीविका तथा जीवन यापन हेतु वो पशु पक्षियों का शिकार करता था। एक दिन वो शिकार हेतु जंगल की ओर निकला वो दिन महाशिवरात्रि का दिन था। किसी कारण उस दिन पूरा जंगल छान मारने के उपरांत भी उसे शिकार नहीं मिला निराश होकर वो एक वृक्ष पर बैठ जाता है। संयोगवश वह वृक्ष बेल का रहता है। तथा उस वृक्ष के नीचे एक शिवलिंग स्थापित रहता है। शिकार का इंतज़ार करते हुए शिकारी अज्ञानतावश ही बेल पत्र को तोड़ तोड़ कर नीचे फेंकता है जो कि शिवलिंग पर जाकर गिरता है। तथा जो जल अपने पीने के लिए प्रयोग करता है। उसका भी कुछ अंश शिवलिंग पर गिरता है। और शिव की कृपा उसे प्राप्त हो जाती है। जब शिकारी के मृत्यु का समय आता है तो यमगण एवं शिवगण दोनों उसे लेने आते है। और अज्ञानता वश महाशिवरात्रि के दिन किए उसके पूजन के कारण उस शिकारी को कैलाश में स्थान की प्राप्ति होती है।

महाशिवरात्रि आयोजन

भगवान शिव परम दयालु परम कृपालु है। उनकी कृपा मात्र से जन जन को कष्टों से मुक्ति मिलती है। महाशिवरात्रि के दिन पूरे सच्चे मन से उनका व्रत पूजन करने से हमे उनकी कृपा प्राप्त होती है। महाशिवरात्रि के व्रतपूजन हेतु किसी मानक की आवश्यकता नहीं। पूरे मन से भक्ति भाव से शिव को याद करने से और केवल पंचाक्षर मंत्र (ॐ नमः शिवाय) के जप मात्र से ही शिव पूजन सफल हो सकता है। शिव आडंबर और दिखावे के भूखे नहीं बल्कि श्रद्धा और भक्ति कि चाह अपने भक्तों से रखते है। तो आइये हर वर्ष की भांति इस वर्ष भी सच्चे मन एवं श्रद्धा भक्ति के साथ देवाधिदेव महादेव और उनकी प्रिय संगिनी का व्रत पूजन करते है और उनकी कृपा प्राप्त करते है।

!इति शुभम्!

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