तर्क और समझ (Logic and Understanding) की आवश्यकता

महान पश्चिमी दार्शनिक जॉन लॉक ने एक सिद्धान्त दिया है जिसके अनुसार एक बच्चे का मस्तिष्क शुरुवात मे  Tabula Rasa होता है। अर्थात उनका मस्तिष्क एक खाली स्लेट की तरह होता है, उनमे तर्क और समझ या फिर कुछ भी पूर्व रूप मे विद्यमान नहीं होता है। हमारे मस्तिष्क मे कुछ भी नया चीजों को देखकर उनका अनुभव करके विकसित होता है।

लेकिन यहाँ एक कमी देखने को मिलती है जिसके अंतर्गत जो कुछ भी हम दूसरे के जरिये ग्रहण करते है। वहाँ यदि हम अपनी तर्कशक्ति अथवा समझ का प्रयोग नहीं करते है तो उस विचार या सिद्धान्त को पूर्ण रूप से सिद्ध नहीं मान सकते है। माना कि मनुष्य सबकुछ अनुभव के आधार पर ही सीखता है उसे दूसरों से ग्रहण करता है लेकिन अपनी तर्कशक्ति और समझ का प्रयोग किए बगैर उसे ग्रहण करना उचित नहीं माना जाएगा। शायद हमने जो कुछ भी सीखा वो शायद पूर्ण सत्य न हो।

उदाहरण के तौर पर देखा जाये तो प्राचीन काल मे जब पश्चिमी धार्मिक विचारकों ने सभी को बताया की समस्त पृथ्वी सम्पूर्ण ब्रह्मांड का केंद्र है तथा सूर्य इत्यादि सभी प्रमुख ग्रह इत्यादि पृथ्वी की परिक्रमा करते है लेकिन जब कापरनिकस जैसे भूगोलवेत्ता ने अपनी तर्क शक्ति का प्रयोग किया और उपरोक्त सिद्धान्त को गलत साबित किया तब हमे पूर्ण सत्य का ज्ञान प्राप्त हुआ। इसी प्रकार से बहुत सारे ऐसे उदाहरण मिल जाएँगे जहां हम जान सकते है कि तर्क और समझ की आवश्यकता हमारे लिए क्यों उपयोगी है।

तर्क और समझ की आवश्यकता हेतु एक प्रयोग- एक बहुत पुराना प्रयोग किया गया जो साबित करता है कि क्यों तर्क और समझ की आवश्यकता हमे है। उस प्रयोग के अंतर्गत एक पिंजरे मे तीन बंदर बंद कर दिये जाते है तथा उस पिंजरे मे एक उचित ऊंचाई पर कुछ केले बांध दिये जाते है। और ऊंटक पहुँचने के लिए एक ऊंचा मंच बनाया जाता है तथा उस मंच पर पहुँचने के लिए एक सीढ़ी लगा दी जाती है।

प्रयोग इस प्रकार से हटा है जब भी कोई बंदर ऊपर केले के तरफ बढ़ता है और जैसे ही सीढ़ी पर कुछ ऊंचाई तक चढ़ता है। नीचे खड़े बंदरों और ऊपर चढ़ रहे बंदर पर पानी की बौछार छोड़ी जाती है और वो सारे बंदर भीग जाते है। इसी क्रम मे तीनों बंदर ऊपर छड़ने का प्रयास करते है और सभी बंदर के साथ एक ही जैसा घटना घटित होती है।

अब इस प्रयोग मे थोड़ा बदलाव किया जाता है और उनमे से एक बंदर को पिंजरे बाहर निकाल कर उनकी जगह पर दूसरा बंदर पिंजरे मे भेजा जाता है। और जब वो नया बंदर केले के तरफ बढ़ता है तो बाकी के दो बंदर पानी के डर से उसे रोक देते है ऐसे करते हुए एक एक कर दोनों पहले वाले बंदरो को पिजरे से निकाल कर उनकी जगह नए बंदर पिंजरे मे भेज दिये जाते है। और तीनों बंदर नए हो जाते है। लेकिन फिर भी कोई नया बंदर जब केले की तरफ बढ़ता है तो बाकी बंदर उसे रोकते है।

अब यहा प्रश्न उठता है कि सारे बंदर नए है उन्हे मालूम भी नहीं है कि उन्हे क्यो रोका जा रहा है लेकिन फिर भी वो एक दूसरे को रोकते है। क्योंकि ये विचार उन्होने अपने पूर्व के बंदरों से प्राप्त किया है।

इसी प्रकार मनुष्य भी बहुत सारी चीजे अपने पूर्वजो से ग्रहण किया तो है लेकिन उसके पीछे के तर्क और कारण को नहीं जनता है। और ये एक रूढ़ि बन जाती है और उनकी जीवन शैली मे जुड़ जाती है।

तर्क और समझ की कमी से परेशानी- उपरोक्त उदाहरण के द्वारा हम बोल सकते है कि आखिर वहाँ कुछ गलत तो नहीं था यदि सारे बंदर एक दूसरे को रोकते थे तो वो उचित ही था अगर वो केले को लेने के लिए बढ़ते तो उनपर पानी की बौछार हो जाती लेकिन प्रश्न ये उठ सकता है ठीक है जो हुआ उसे उचित माना जा सकता है लेकिन एक समय के पश्चात क्या उसे सिद्ध किया जा सकता है। और यहा आवश्यकता है। तर्क और समझ की। जिसके जरिये हम स्वयं ज्ञात करे कि कोई कार्य या सिद्धान्त को उचित क्यों माना जाये या फिर क्यों नहीं।

तर्क और समझ की प्रासंगिकता- आज के समाज की बात की जाये तो ऐसे बहुत सारे सिद्धान्त, नीति नियम हमारे समाज मे प्राचीन काल से चले आ रहे है। लेकिन उनकी महत्ता कम होती जा रही है। और इसका सबसे प्रमुख कारण है कि हमने कभी भी अपने पूर्वजो से उनके बारे मे प्रश्न नहीं किया। हमने अपने तर्क और समझ का प्रयोग नहीं किया और बिना किसी प्रश्न के ही उन सिद्धांतों, नीति और नियमों को शाश्वत सत्य मान लिया।

बात की जाये धर्म की तो हम उसका पालन करते आ रहे है। उसके नियमो नीतियों को बिना किसी प्रश्न  के बहुत समय से मानते आ रहे है। लेकिन यदि कोई आपके उन नीतियों और नियमो प्रश्न उठाए तो हम बस इतना कहकर शांत हो जाते है कि ये हमारी श्रद्धा का विषय है लेकिन उसका उचित तर्क प्रस्तुत नहीं करते है। और ऐसा करके हम धर्म के स्वरूप को बहुत छोटा बनाते है उसके अनुयायी होने के बावजूद उसे हम निम्न स्तर प्रदान करते है।

एक छोटा सा उदाहरण लिया जाये जैसे हिन्दू धर्म तो हम देखेंगे यहाँ हिन्दू धर्म और उसके नाम को लेकर बहुत सारे तर्क समाज मे है। लेकिन अगर असल मे देखा जाये तो हम पाएंगे किसी भी पौराणिक ग्रंथ मे हिन्दू शब्द का वर्णन नहीं है। अब अगर इसकी व्याख्या सही रूप मे न कि जाये तो हम अपने धर्म के स्तर को गिराते है। वही अगर बोले कि हिन्दू शब्द सनातन धर्म का परिवर्तित हुआ। जब Middle East के लोग हमारे देश की तरफ आए और चूंकि हमारा देश सिंधु नदी के तट के किनारे था। तो उन बाहरी लोगो ने हमे सिंधु के स्थान पर हिन्दू बोला क्योंकि उन्हे श शब्द को ह उच्चरित क्या और हमारे देश को हिंदुस्तान बोला उसी प्रकार समाज मे ये नाम प्रचलित होने के साथ हमारे धर्म को भी हिन्दू धर्म के नाम से जाना जाने लगा। वरना जिस प्रकार इस देश का असली नाम भारत है उसी प्रकार धर्म सनातन धर्म है।

निष्कर्ष

हमारी संस्कृति बहुत ही प्राचीन और समृद्ध है। अतः इसे जानना बहुत कठिन है। लेकिन इसका मतलब ये नहीं कि हम इसके सही स्वरूप को प्रस्तुत करने मे असमर्थता दिखाये। अगर हम तर्क और समझ को विकसित करे तथा अपने बच्चो मे भी इसे बढ़ावा दे तो हम इस विशाल और समृद्ध संस्कृति को अच्छे से व्याख्यायित कर सकते है। और इसे आने वाले समय के लिए भी समृद्ध बनाए रख सकते है। हमे अपने नियमो, सिद्धांतो इत्यादि को तर्क और समझ के जरिये व्याख्या करनी होगी और तभी हम इसे सही रूप मे प्रस्तुत कर सकते है। और समाज को इसे अपनाने मे सहयोग कर सकते है।

||इति शुभम्य ||

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