पार्टनर के प्रति अरुचि की भावना: कारण और उपाय

पार्टनर के प्रति अरुचि की भावना: कारण और उपाय

हमारे सभी लेख भारतीय संस्कृति और जीवनशैली के परिपेक्ष्य पर आधारित है। एवं उनकी विवेचना भारतीय संस्कृति पर आधारित है। आज बहुत सारी वैबसाइट के आधार पर हम देख रहे है कि भारतीय समाज में भी अपने पार्टनर के प्रति अरुचि की भावना है और उनमे कहीं न कहीं अन्य के प्रति लगाव दिखाई देता है।

पर क्या कारण है कि जन्म जन्म के लिए जुड़े जोड़े के मध्य ये दुर्भावना काम करती है। आपने पूरे मन वचन और कर्म से एक दूसरे को अपना जीवन साथी चुना है। प्रायः सुनने मे आता है कि तुम मुझे पहले की तरह प्यार नहीं करते जैसे पहले करते थे। पर क्या कभी इसका कारण जानने का प्रयास किया कि क्यों ऐसा हो रहा है।

इसका कारण कहीं न कहीं आप के अंदर छुपा हुआ है। तो आइये इस लेख के द्वारा जानने का प्रयास करते है। और उन्हे खत्म करने का भी प्रयास करते है कि क्यों जीवन भर एक साथ रहने के लिए तैयार लोगो के मध्य एक दूसरे के प्रति अरुचि की भावना घर कर जाती है।

1. विश्वास का अभाव-

जब दो जोड़ो के मध्य विश्वास का अभाव पाया जाता है तो उनके मध्य कहीं न कहीं दूरियाँ और अरुचि पनपने लगती है। पर कह सकते है कि इस अरुचि से किसके जीवन मे प्रभाव पड़ेगा कौन है जो इससे प्रभावित होगा अगर जो कुछ भी गलत होगा वो केवल और केवल दो जीवन साथियों के मध्य होगा। इसका प्रभाव किसी और के मध्य नहीं होगा ।

अगर अहम के साथ इस बारे में हम सोचेंगे तो कहीं न कहीं दोनों एक दूसरे से दूर होंगे। और इसका असर केवल और केवल उन दोनों के मध्य होगा जिन्हें  ये जीवन एक साथ आगे बढ़ाना है।


2. असंतुष्टि का विस्तार-

यदि हमे हमारे जीवनसाथी के प्रति असंतुष्टि का अनुभव होता है तो सबसे पहली गलती है उनके मध्य किसी भी प्रकार का लगाव नहीं है इसी लिए उनके मध्य असंतुष्टि का अनुभव हो रहा है। उन्हे एक दूसरे का साथ कभी भी नहीं चुनना था।

वो एक दूसरे के लिए नहीं बने है। उनका एक दूसरे के साथ कोई भी जुड़ाव नहीं है। ये बेमतलब का रिश्ता है जिसे वो किसी न किसी रूप में निभा रहे है। उन्हे इस रिश्ते से कहीं न कहीं अपना नाता खत्म कर लेना चाहिए।


3. बाहरी परिवेश का प्रभाव-

दो लोगो के मध्य कितना भी प्रेम क्यों न हो उनके मध्य अगर किसी बाहरी तत्व का प्रभाव कामयाब हो जाता है तो वो एक साथ जीवन बिताने के लायक नहीं है। उनके मध्य कहीं न कहीं बाहरी तत्वों का प्रभाव है।

और अगर अपने जीवन साथी के प्रति किसी के मन में घृणा, ईर्ष्या, अलगाव इत्यादि का भाव पनपता है, और कहीं न कहीं बाहरी तत्व का प्रभाव हावी होता है तो उनका साथ किसी न किसी रूप में अनुचित है। और उन्हे एक दूसरे के साथ से रिश्ते का अंत कर लेना चाहिए।

अगर उपरोक्त तथ्यों के आधार पर हमने कटु शब्दों का प्रयोग किया और इसके द्वारा दाम्पत्य जीवन को बिगाड़ने का प्रयास किया और आपको इन शब्दों पर कोई आपत्ति है तो मान लीजिये कहीं न कहीं आप के मन में अपने जीवनसाथी के प्रति प्रेम का भाव विद्यमान है और अपने दाम्पत्य जीवन को बचाने में सामर्थ्य है।

तो अब हम जानने का प्रयास करेंगे की किस प्रकार हम अपने जीवनसाथी के अरुचि की भावना को समाप्त करके उनके मन में पुनः अपने प्रति प्रेम की भावना को जीवंत कर सकते है। यहाँ हम आपको राम और सीता के जीवन के सात सूत्रों का वर्णन करेंगे जिसके आधार पर एक आदर्श दाम्पत्य जीवन की परिभाषा प्रस्तुत कर सकते है।


1. संयम-

पहला उपाय संयम है। इसका विवरण बहुत ही विस्तारित है। हम बात केवल भारतीय परिपेक्ष्य की करेंगे। संयम की व्याख्या करना बहुत ही कठिन है लेकिन सीता और राम के जीवन को देखे तो जिस प्रकार दोनों ने अपने जीवन में संयम का प्रयोग किया वो अद्भुत है।

जब राम को राजगद्दी के जगह पर वनवाश का आदेश हुआ तो उन्होने अपने पिता की भी नहीं सुनी और अपने पिता के द्वारा दिये गए वरदान की पूर्ति हेतु वन गमन को तैयार हो गए और राज पाट का परित्याग कर दिया ये संयम बहुत ही सराहनीय है और इससे भी सराहनीय सीता का त्याग है जिनहोने अपने पति के साथ जंगल में भी जीवन यापन को स्वीकार किया।


2. संतुष्टि-

कहते है वन गमन के पश्चात राम लक्ष्मण और सीता ने सभी सुख सुविधाओं का त्याग कर कंदमूल के सहारे और झोपड़ी में अपना जीवन व्यतीत किया और कभी किसी प्रकार के इच्छाओं की अभिव्यक्ति नहीं की।

संतुष्टि का इससे अच्छा उदाहरण नहीं मिल सकता है। एक राजकुमारी होते हुए भी सीता के द्वारा किसी भी प्रकार से सुख सुविधाओं की मांग न करना और उस छोटी सी कुटिया में अपना जीवन यापन करना ही संतुष्टि का सच्चा उदाहरण है।

अगर आप किसी भी रूप में अपने जीवन साथी के साथ जीवन यापन करते है और कहीं न कहीं आपके मन में असंतुष्टि की भावना है तो आप उस संबंध के लिए उचित नहीं है। और आपको उस जीवन का परित्याग करके नव जीवन का सृजन करना चाहिए।


3.संतान-

तृतीय और सबसे प्रमुख उपाय संतान है। जब आप संतान की प्राप्ति कर लेते है तो अपने जीवन में जीवनसाथी के प्रति दोषों को ढूँढना बंद कर देते है और अपनी संतान के द्वारा नए जीवन का आरंभ करते है।

वो संतान आप दोनों के जीवन को जोड़ने का काम करती है। परंतु यदि उस संतान के जन्म के पश्चात भी आप दोनों के मध्य कहीं न कहीं अरुचि की भावना व्याप्त रहती है तो आप दोनों को अपने जीवन को अलग कर लेना चाहिए।


4. संवेदनशीलता-

चतुर्थ कारण दोनों के मध्य संवेदन शीलता की कमी के कारण होता है। अगर दोनों जीवनसाथी एक दूसरे की संवेदना को नहीं समझ पा रहे है। और उनका स्वविवेक और अतर्कता उनपर हावी हो रहा है तो उनके सम्बन्धों को कोई भी सुधार नहीं सकता।

बड़ा दुख होता है। अगर एक दूसरे का जीवन भर साथ देने वाले जीवन साथी एक दूसरे की समवेदनाओं का ख्याल नहीं करते तो उन्हे एक दूसरे से संबंधो को समाप्त कर लेना चाहिए।


5. संकल्प-

संकल्प की भावना से तात्पर्य है कि दोनों जीवनसाथियों को एक दूसरे के साथजीवन यापन करें हेतु किए गए प्रण का पालन करना कैसी भी परिस्थिति हो उनका साथ नहीं छोडना है। एक दूसरे का जन्म जन्मांतर तक साथ देने की भावना को बराबर बना कर रखना है। यही संकल्प की भावना है।

लेकिन अगर आप अपने संकल्प की भावना को पूर्ण करने में असमर्थ समझते है तो इस बंधन का परित्याग करके एक नए जीवन का सृजन करना चाहिए।


6. शारीरिक आर्थिक और सामाजिक मजबूती-

उपरोक्त पाँच तथ्यो के प्रति अगर आप अपने जीवन साथी के प्रति असमर्थ समझते है तो इस उपाय का आपके जीवन में कोई महत्व नहीं है। लेकिन अगर इन तथ्यों के बाद भी आप को लगता है की कहीं न कहीं आप अपने दाम्पत्य जीवन को बचा सकते है तो आपको ये समझना आवश्यक है।

अगर आपको अपने मध्य प्रेम का प्रवाह करना है तो दोनों को किसी न किसी रूप में सामाजिक, शारीरिक और आर्थिक रूप में सामर्थ्य होने की आवश्यकता है। और दोनों का कर्तव्य है इस मजबूती को बनाए रखने का। अगर इस चरण में भी लगता है की आप के द्वारा किया गया प्रयास व्यर्थ जाएगा तो आपको इस संबंध से पूरी तरह से नाता तोड़ लेना चाहिए।


7. समर्पण-

अगर उपरोक्त 6 उपायों का आपके जीवन में कोई महत्व नहीं है तो इस उपाय को पढ़ने का भी आपको कोई मतलब नहीं। समर्पण को त्याग के रूप में नहीं देखना चाहिए। बल्कि अपने जीवनसाथी के लिए अपने प्रेम व्यक्त करने के रूप में देखना चाहिए ।

भारतीय परिपेक्ष्य में दो जीवन साथी एक दूसरे के साथ जिंदगी भर के साथ का प्रण करते है यही उन दोनों के समर्पण को दिखाता है।  हमे कभी भी इस बात को नकारना नहीं चाहिए की एक दूसरे के साथ के द्वारा ही वो अपने आदर्श दाम्पत्य जीवन को सफल बना सकते है।

दोनों को एक दूसरे के मन मस्तिष्क में कुंठा की भावना का त्याग कर एक दूसरे के प्रति प्रेम स्वरूप समर्पण की भावना बना कर रखनी चाहिए। उपरोक्त 6 उपायो के आधार पर ही समर्पण की परिभाषा को व्यक्त किया जा सकता है। और अगर लगता है की कहीं न कहीं उपरोक्त 6 उपाय आपके लिए व्यर्थ और अनुपयोगी है तो समर्पण का भी आके जीवन में कोई भी महत्व नहीं है।


निष्कर्ष


आज का समाज बहुत ही बुद्धिमान और समझदार है हम अगर इसे किसी भी प्रकार का ज्ञान देने का प्रयास करेंगे तो ये हमारा ही उपहास होगा। लेकिन बात दाम्पत्य जीवन में अपने पार्टनर के प्रति अरुचि की हो तो बोलनाअति आवश्यक है। इस वैबसाइट का उद्द्येश्य भारतीय संस्कृति के आधार पर हमारे जीवन शैली का वर्णन करना है।

आज भी भारतीय समाज में विवाह विच्छेदन कि दर पूरी दुनिया मे सबसे कम है। और अपने जीवन साथी के प्रति अरुचि ही इस विवाह विच्छेदन का सबसे प्रमुख कारण है। उपरोक्त उपायों मे बहुत कटु शब्दों का प्रयोग किया गया है लेकिन यदि आप एक ऐसे जीवनसाथी का चयन किया है जिसको मंत्रों के द्वारा साक्षी मानकर अपना माना है।

तो कहीं न कहीं आपने अपने नए जीवन के सृजन की भी प्रतिज्ञा की है। एक बात को कभी नहीं भूलना चाहिए की एक दूसरे का साथ ही आपके मुश्किल समय में आपको मजबूती प्रदान करेंगे। भारतीय परिपेक्ष्य में एक दूसरे का साथ उन्हे अंत समय तक बल प्रदान करता रहेगा। और इस बात को हमेशा याद रखना चाहिए।

जो आपके मध्य आए कुंठा, दुर्भावना, और अरुचि की भावना का अंत करेंगे। और यदि आप उस नव जीवन को अपनाने के लिए अपने आप को सामर्थ्य नहीं पाते है तो आपको उन प्रणों को भूलकर अपने नए स्वतंत्र जीवन की शुरुवात करनी चाहिये और इस परतंत्रता का अनुभव करने वाले जीवन का परित्याग कर देना चाहिए।


!इति शुभम्!

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