लाल बहादुर शास्त्री सादा जीवन उच्च विचार का सच्चा उदाहरण

02 अक्टूबर को भारत देश मे राष्ट्रीय त्योहार के रूप मे मनाया जाता है। इस तारीख को देश को 2 महान विभूतियों के जन्मदिन के रूप मे मनाया जाता है। हर बच्चा जानता है इस दिन महात्मा गांधी और लालबहादुर शास्त्री के जयंती के रूप मे मनाया जाता है।

इसी के कारण आज हम अपने लेख मे लाल बहादुर शास्त्री के कुछ किस्सों और प्रसंगों के जरिये उनके सादा जीवन और उच्च विचार से परिपूर्ण जीवन शैली को जानने का प्रयास करेंगे, हमारा उद्द्येश्य रहेगा कि इन प्रसंगो को जरिये उस जीवन शैली को हम अपने जीवन मे धारण करने का प्रयास करेंगे।

संघर्षशील प्रारम्भिक शिक्षा-

लाल बहादुर हमारे देश के द्वितीय प्रधानमंत्री थे। ये एक महान स्वतन्त्रता सेनानी भी थे और महान गांधीवादी विचारधारा के अनुयायी थे। इनके जीवन से जुड़ी कई प्रसंग है जो हमे सीख देते है। उन्ही प्रसंगों मे हम शुरुआत करेंगे उनके आरंभिक जीवन की जिसमे उन्होने अपने शिक्षा प्राप्ति के लिए कितने संघर्षों से गुजरना।

पड़ा लाल बहादुर शास्त्री जी का जन्म वाराणसी मे हुआ था गंगा नदी के उस पार रामनगर मे आज भी उनके पैतृक आवास एक स्मारक के रूप मे स्थित है। और प्रतिदिन अपनी प्रारम्भिक के लिए नदी पार करके अपने विद्यालय जाते थे और एक महान व्यक्तित्व बन कर उभरे।

पद का अभिमान नहीं-

इसी क्रम मे एक प्रसंग है कि जवाहर लाल नेहरू के प्रधानमंत्री रहते हुए लाल बहादुर शास्त्री रेल मंत्री थे और एक समय की बात है कि इनकी माता जी इनसे मिलने के लिए इनके ऑफिस आती है, और बाहर खड़े संतरी से बोलती है कि मुझे मेरे बेटे से मिलना है जिसका नाम लाल बहादुर शास्त्री है और वो रेलवे मे काम करता है।

लोगो को आश्चर्य हुआ कि ये जिसे रेलवे का कर्मी कह रही है वो स्वयं मंत्री है। जब लोगो ने शास्त्री जी से इसका कारण पूछा तो उन्होने बोला कि मै नहीं चाहता की मेरे परिवार कोई भी मेरे पद का दुरुपयोग करे। आज के समय मे ये बात बहुत ही आश्चर्य करने वाली हो सकती है जहां आज किसी जिले का कोई छोटे से पद पर आसीन व्यक्ति भी अपने पद का फायदा लेने से नहीं चुकता है।

नियमो का पालन करने वाले-

एक प्रसंग है जिसके अनुसार जब देश आज़ाद नहीं हुआ था तब स्वतन्त्रता संघर्ष के कारण शास्त्री जी जेल मे बंद रहते है और उसी समय उनकी बेटी बीमार हो जाती है और इसके कारण वो परोल के जरिये अपनी बेटी की देखरेख हेतु जेल से बाहर आते है।

लेकिन दो दिनो बाद ही उनकी बेटी की मृत्यु हो जाती है और शास्त्री जी पुनः अपनी परोल को रद्द करा कर जेल मे आ जाते है। इसी क्रम मे एक बार उनकी पत्नी उनसे मिलने जेल मे जाती है और उनके लिए अच्छे वस्त्र और कुछ अच्छी चीजे उनके लिए लेकर जाती है।

इसपर शास्त्री जी उनसे नाराज हो जाते है। और अपनी पत्नी से बोलते है कि उनको जेल के द्वारा खाने को और पहनने को वस्त्र मिलते है जेल के नियमो के विरुद्ध कुछ भी करना उनको उचित नहीं लगता है। इस तरह नियमो से जुड़े इंसान थे हमारे शास्त्री जी।

सादा जीवन के सच्चे उदाहरण-

एक बार जब शास्त्री जी प्रधानमंत्री के पद पर आसीन थे तो उनके बच्चे दिल्ली के एक अच्छे स्कूल मे पड़ते थे और बाकी राजनयिक और अधियाकरियों के बच्चे भी उसी स्कूल मे पड़ते थे सभी अच्छी अच्छी गाड़ियों मे स्कूल जाते थे।

इस पर शास्त्री जी के बच्चों ने अपने पिता के सामने ये प्रस्ताव रखा कि सभी के बच्चे अच्छी अच्छी गाड़ियों से स्कूल जाते है और हम प्रधानमंत्री के बच्चे होने के बावजूद साधारण रूप मे रहते है इस पर शास्त्री जी उनसे बोलते है कि तुम लोग प्रधानमंत्री के बच्चे नहीं हो बल्कि तुम लाल बहादुर शास्त्री के बच्चे हो। प्रधानमंत्री केवल जनता के लिए होता है।

कुछ दिनो बाद पंजाब नेशनल बैंक से शास्त्री जी ने ऑटो लोन लेकर एक फियट कार भी खरीदी बच्चों की खुशी के लिए और उसके कुछ समय बाद शास्त्री जी की मृत्यु हो गई।

और बैंक ने शास्त्री जी के व्यक्तित्व को देखते हुए उनके लोन को माफ करने का प्रस्ताव रखा लेकिन उनकी पत्नी ने इस प्रस्ताव को खारिज कर दिया और अपने मिलने वाले पेंशन के जरिये लोन का भुगतान करने को कहा।

निष्कर्ष

न जाने कितनी कहानियाँ और प्रसंग है शास्त्री जी के जीवन से जुड़ी हुई। और इन सभी प्रसंग से हमे जरूर कुछ न कुछ सीखने को मिलता है। पहले के समय मे एक राजनेता का जीवन कैसा होता था समाज के हितों की परवाह करना जिनका एक मात्र उद्द्येश्य होता था।

आज के समय मे ऐसे नेता बिरले ही मिल सकते है। एक बार एक रेल दुर्घटना की ज़िम्मेदारी लेते हुए शास्त्री जी ने अपने पद से तत्काल रूप से इस्तीफा दे दिया जो आज के समय मे होना मुमकिन नहीं है। जय जवान जय किसान का नारा देने वाले जिन्होने देश की अर्थव्यवस्था को सुधार करने के लिए लोगो को एकादशी का व्रत करने का आग्रह किया और लोगो ने इसे सहर्ष स्वीकार किया।

देश के रेल मंत्री, द्वितीय प्रधानमंत्री होते हुए भी सादा जीवन जीने वाले लाल बहादुर शास्त्री जैसे नेता, जनता के हितों की सोचने वाले राजनेता हमे आज नहीं दिखते है। आज के समय मे जरूरत है इनसे शिक्षा लेने की।

पहले की राजनीति मे कितनी खूबियाँ होती थी कोई अपने हित की परवाह नहीं करता था। जन सेवा जिनका एक मात्र उद्द्येश्य होता था। आज भी 2 अक्टूबर के दिन हम लोग महात्मा गांधी और शास्त्री जी की जयंती मनाएंगे।

लेकिन हमारा उद्द्येश्य उनकी केवल जयंती मनाना नहीं बल्कि उनके बताए आदर्शों का पालन करना है। उनके जीवन शैली मे बहुत कुछ सीखने के लिए हमारे पास है। अगर उनके आदर्शों का अनुशरण हम अपने जीवन मे करे तो एक आदर्श समाज की स्थापना कर सकते है। तो इस बार हमे अवश्य इन बाटो पर विचार करने की आवश्यकता है। जो इस समाज की आवश्यकता है।

||इति शुभम्य||

Leave a Comment