धन के देवता कुबेर (Kuber) का अभिमान नाश- कथा (Mythological Story)

धन के देवता कुबेर (Kuber) का अभिमान नाश- कथा (Mythological Story)

हम सभी जानते है कि धन और समृद्धि की देवी माता लक्ष्मी है। लेकिन धन के स्वामी या फिर धन के देवता के रूप में कुबेर देव (Kuber) की पुजा होती है। कई पौराणिक धार्मिक ग्रंथो मे कुबेर के जन्म से संबन्धित भिन्न भिन्न मत है।

लेकिन रामायण के अनुसार, जो कि सनातन धर्म का सबसे लोकप्रिय ग्रंथ है, कुबेर का जन्म महर्षि विश्रवा के यहाँ हुआ था। जो कि रावण के भी पिता थे।

महर्षि विश्रवा कि तीन पत्नियाँ थी। जिनमे से एक का पुत्र कुबेर, एक से पुत्र रावण और कुंभकरण तथा एक से पुत्र के रूप में विभीषण ने जन्म लिया था।

मान्यता है कि सोने की लंका धन के देवता कुबेर की थी जो उन्हे ब्रह्मा से उपहार स्वरूप मिली थी लेकिन रावण ने अपने दुष्ट व्यवहार के द्वारा उसे कुबेर से छीन लिया था।

अब बात करते है, उस कथा कि जिसके अनुसार किस प्रकार कुबेर का अभिमान का नाश स्वयं भगवान शिव ने श्री गणेश के द्वारा किया था।

कथा प्रसंग

एक समय की बात है। धन के देवता कुबेर चूंकि धन के स्वामी माने जाते है। और सभी जन के सुख समृद्धि के दाता इन्हे माना जाता है।

इसी के कारण इन्हे इस बात का अभिमान हो जाता है कि उनका कितना महत्व है इस संसार मे।

उनमे इतनी क्षमता है कि वो सभी का भरण पोषण कर सकते है। सभी सुख सुविधाओं का एक मालिकत्व उनही के पास है। कोई भी उनकी शक्ति से तृप्त हो सकता है।

अपने इस अभिमान के कारण कुबेर सभी देवी देवताओं से अपना स्वयं गुणगान करने लगता है। और सबसे बार बार पूछता रहता है कि वो ऐसा क्या करे कि लोग और भी उसकी जय जय कार करें।

कुबेर का अभिमान

इसी प्रकार अपने अभिमान मे चूर कुबेर एक दिन कहीं भ्रमण मे रहता है। और उसकी मुलाक़ात देवर्षि नारद से होती है।

और वो उनसे अपना बखान करने लगता है कि किस प्रकार वो सभी का भरण पोषण करता है।

और स्वभाव वश वो नारद मुनि से पूछ बैठता है कि वो और क्या करे जिससे उसके वर्चस्व मे चार चाँद लगें।

नारद मुनि को कुबेर के अभिमान का एहसास हो जाता है। और उसके अभिमान को तोड़ने के लिए वो एक व्यूह रचते है और उसे अपने बातों मे फंसा लेते है।

और कुबेर से बोलते है कि वो एक बहुत भव्य भोज का आयोजन करे और उस भोज मे संसार के सभी जीवो को साथ ही साथ सभी देवी देवता, नाग, गंधर्व, यक्ष इत्यादि को आमंत्रित करे। इसके साथ ही त्रिदेवों ब्रह्मा विष्णु और महेश को भी इस भोज में सपरिवार आमंत्रित करें।

कुबेर का अभिमान नाश

अपने अभिमान के कारण कुबेर देव, नारद मुनि द्वारा रचित इस मायाजाल का अनुमान नहीं लगा पाते है। और उनके सलाह को ध्यान मे रखते हुए भोज की तैयारी शुरू कर देते है। वो स्वयं ही त्रिदेवों को उस भोज मे आमंत्रित करने जाते है।

जब वो शिव को आमंत्रण देने कैलाश पर्वत जाते है। तो महादेव को पहले से ही सबकुछ ज्ञात रहता है कि ये नारद मुनि द्वारा रचित व्यूह है और इसके जरिये वो कुबेर अभिमान का नाश करना चाहते है।

कुबेर देव, महादेव को नतमस्तक हो उन्हे सपरिवार भोज के लिए आमंत्रित करते है। इसपर शिव बोलते है। कि मई तो ठहरा सन्यासी मई क्या भोज में जाऊंगा।

और अगर मैं नहीं जाऊंगा तो मेरी अर्धांगिनी होने के कारण पार्वती देवी भी नहीं जाएगी लेकिन मेरी तरफ से मई तुम्हारा आमंत्रण स्वीकार करते हुए श्री गणेश को भोज के लिए भेजता हूँ।

गणेश जी की महिमा

श्री गणेश भी अंतर्यामी है और स्वयं रिद्धी सिद्धि के दाता है। उन्हे समस्त प्रसंग का आभास रहता है। और वो अपनी लीला दिखने के लिए कुबेर देव के साथ चल देते है।

कुबेर के राजमहल मे पहुँच कर श्री गणेश कुबेर को चेतावनी दे देते है कि भोजन करते समय उन्हे बिना किसी रुकावट के भरपेट भोजन मिलते रहना चाहिए। अगर कोई रुकावट हुई तो वो रुष्ट हो जाएंगे।

कुबेर देव अपने अभिमान मे चूर सोचते है कि आखिर स्वयं कुबेर के भंडार मे कैसी कमी हो सकती है।

और सभी सेवकों को श्री गणेश को भोजन परोशने को कहते है और अपने सभी सेवक श्री गणेश को तृप्त करने को लगा देते है।

सभी सेवक विभिन्न प्रकार के पकवान और मिष्ठान इत्यादि परोसने लगते है। और श्री गणेश भी अपनी लीला प्रारम्भ करते है जिससे जो कुछ भी उनके सामने परोसा जाता है वो कुछ ही मिनटों मे खत्म हो जाता है।

श्री गणेश अपना रफ्तार बढ़ाने लगते है और धीरे धीरे करके सभी पकवान समाप्त कर देते है। पर उनकी क्षुधा नहीं बुझती।

श्री गणेश बोलते है मुझे स्वयं अपना भंडार दिखाओं क्योंकि अभी मेरा पेट नहीं भरा है। और जाकर भंडार का सभी कच्चा समान भी खा लेते है।

फिर कुबेर से बोलते है यदि तुमने मुझे तृप्त नहीं किया तो जब कुछ नहीं मिलेगा तो मई तुम्हें भी खा जाऊंगा। और कुबेर देव भयभीत होकर महादेव की शरण मे भागते है।

और वहाँ पहुँचकर भगवान शिव के चरणों मे पड़ जाते है और अपने प्राणो के रक्षा की दुहाई देते है।

इसपर शिव, श्री गणेश को बोलते है कि जाओ अपनी मान के हाथ से बना भोजन करो और अपनी क्षुधा को तृप्त करो।इस प्रकार कुबेर देव अभिमान का नाश होता है।

और अपनी गलती का एहसास होता है। और स्वयं शिव से क्षमा मांगकर वो पुनः अपने लोक में आ जाते है।

निष्कर्ष-

हम सभी जानते है कि अभिमान तो किसी का भी ज्यादा समय तक नहीं टिकता। हमारा अभिमान हमे किसी न किसी मुसीबत मे अवश्य दाल देता है।

अभिमान हमारा ऐसा अवगुण है जिसका हमे एहसास भी नहीं होता कि वो कब हमरे लिए घातक साबित हो जाएगा।

स्वयं कुबेर, जो कि एक देव स्वरूप है वो अपने अभिमान के कारण अपने प्राणो को संकट मे दाल बैठते है। तो हमारे पास कितना भी कुछ हो हमे उसका अभिमान नहीं करना चाहिए स्वयं ईश्वर इससे रुष्ट हो जाते है।

हमारे सुख समृद्ध का प्रयोग किसी के सहयोग सेवा इत्यादि मे लगाना चाहिए और वो भी निस्वार्थ भाव से हमारे मन वचन या कर्म मे तनिक भी अभिमान का अंश नहीं आना चाहिए। और अपने आप को ईश्वर एवं जन मानस के प्रति आभारी मान कर रहना चाहिए।

||इति शुभम्य||

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