जब कृष्ण पर लगा कलंक और हुआ त्रेतायुग के मित्र से युद्ध

जब कृष्ण पर लगा कलंक और हुआ त्रेतायुग के मित्र से युद्ध

जब कृष्ण पर लगा कलंक और हुआ त्रेतायुग के मित्र से युद्ध- भाद्रपद शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि को मान्यता है कि इस दिन अगर चंद्रमा को कोई देख लेता है तो उस पर कलंक लगता है। इसी के संबंध मे एक कथा बहुत ही ज्यादा प्रचलित है। जिसके अनुसार इस तिथि को चंद्रमा देख लेने के कारण स्वयं भगवान विष्णु के अवतार श्री कृष्ण को भी कलंक लगा। उन पर चोरी का आरोप लगाया गया और ये प्रसंग इसी से संबन्धित है कि किस प्रकार श्री कृष्ण पर चोरी का आरोप लगा और किस प्रकार उन्होने उस आरोप से मुक्ति पायी।

बात उस समय की है। जब श्री कृष्ण ने अपने मामा कंस का संहार कर दिया था और कंस के ससुर जरासंध के कारण द्वारिका नगरी की स्थापना कर दी थी। उसी समय अवंतिका राज्य जिसे आज हम उज्जैन के नाम से जानते है, उसके राजा सत्राजित जो कि भगवान सूर्य के बहुत ही बड़े उपासक थे। जिनसे सूर्य देवता ने प्रसन्न होकर उन्हे एक मणि उपहार मे दी थी। जिसे स्यमंतक मणि के नाम से जाना जाता था। इस मणि की खूबी थी कि प्रतिदिन ये मणि जो भी इसकी पुजा करता था उसे सोने इत्यादि बहुमूल्य जवाहरातों की प्राप्ति होती है। श्री कृष्ण को भी ये मणि बहुत अद्भुत लगी थी। और उन्होने इसकी सराहना भी सत्राजित से की थी।

कथा प्रसंग- एक बार की बात है सत्राजित ने वो मणि अपने भाई प्रसेनजीत को दे दी। और उनका भाई वो मणि लेकर वन मे गया जहां एक सिंह ने उसका वध करके वो मणि उससे ले लिया। और उस सिंह को युद्ध मे पराजित कर रीछ राज जामवंत ने वो मणि उससे ले ली। और उसे अपनी बेटी जामवंती को उसे प्रदान कर दिया। और सतरजीत ने उस मणि के चोरी का आरोप श्री कृष्ण पर लगा दिया। और समाज मे ये कहने लगा कि स्वयं श्री कृष्ण उस मणि से प्रभावित हुए थे। और उन्होने ही मेरे भाई का वध करके उस मणि को अपने पास आरकेएच लिया होगा।

श्री कृष्ण को इस कलंक से पार पाने के लिए उस मणि की तलाश मे जंगल की तरफ निकले। वहाँ उन्हे एक गुफा दिखाई दी और वहाँ जाकर उन्होने देखा एक रीछ स्त्री उस स्यमंतक मणि से खेल रही है। ये जामवंत की बेटी जामवंती थी। उन्होने उससे उस मणि की मांग की इसपर जामवंती ने अपने पिता से इसके बारे मे बताया और रीछ पति को इस बात पर गुस्सा आ गया और उन्होने श्री कृष्ण को युद्ध के लिए ललकारा। कहते है जामवंत को वरदान था की स्वयं भगवान विष्णु या उनके अवतार के सिवा उन्हे कोई नहीं हारा सकता था।

कृष्ण जामवंत युद्ध- रीछ पति जामवंत और श्री कृष्ण के मध्य 27 दिनों तक युद्ध होता रहा। जब जामवंत श्री कृष्ण से युद्ध मे हार गए तो उन्होने आश्चर्य मे उनसे पूछा कि आखिर वो कौन है स्वयं प्रभु ही केवल उनको हरा सकते है। इस पर श्री कृष्ण ने जामवंत को बताया कि वो शायद भूल रहे है लेकिन त्रेतायुग मे जब वो राम के अवतार के रूप मे थे और राम रावण युद्ध के बाद जब वो अयोध्या वापस आ रहे तो तो उन्होने वादा किया था कि वो अवश्य द्वापरयुग मे वापस आएंगे और उनसे मिलेंगे। और आज मई तुमसे मिलने आया हूँ। मै श्री विष्णु का अवतार कृष्ण हूँ। और इस प्रकार से जामवंत ने अपनी गलती की उनसे क्षमा मांगी और स्यमंतक मणि उन्हे वापस कर दी। और इस प्रकार से श्री कृष्ण के ऊपर लगा कलंक उन्होने वो मणि पुनः सत्राजित को वापस कर समाप्त किया।

सत्यभामा और जामवंती से विवाह- इसी क्रम मे प्रसंग है कि जब श्री कृष्ण ने जामवंत को युद्ध मे हरा दिया तो रीछ पति जामवंत ने उन्हे अपनी पुत्ररी जामवंती से विवाह करने का अनुरोध किया। और इस अनुरोध को श्री कृष्ण ने सहर्ष स्वीकार किया। साथ ही साथ जब सत्राजित को अपनी गलती का एहसास हुआ तो उन्होने अपनी पुत्री सत्यभामा का विवाह उनसे करने का अनुरोध किया साथ ही साथ सायमानतक मणि भी उन्हे उपहार स्वरूप उन्हे प्रदान किया।

निष्कर्ष-

आज भी भाद्रपद मास की शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि को मान्यता है की उस दिन चंद्रमा का दर्शन निषेध है। और यदि कोई किसी कारण उस दिन चंद्रमा का दर्शन कर लेता है। तो उस वर्ष उस पर कलंक का प्रकोप झेलना पड़ता है। और सभी सनातन धर्म के अनुयायी उस दिन चंद्रमा को देखने से बचते है।

लेकिन यदि किसी भी कारण से उस दिन हम चंद्रमा के दर्शन कर लेते है तो इस कलंक के प्रकोप से बचने के लिए उपाय भी बताए गए है। मान्यता है यदि गणपति की आराधना सच्चे मन से चतुर्थी तिथि को की जाये और साथ ही साथ हर मास शुक्ल पक्ष की द्वितीय तिथि को चंद्रमा का दर्शन कर उन्हे प्रणाम किया जाये तो इस कलंक के प्रकोप से मुक्ति मिल सकती है। इस कहानी से हमे बताया जाता है किस प्रकार से स्वयं कृष्ण जो कि भगवान विष्णु के अवतार है, वो भी इस कलंक के प्रकोप से बच नहीं पाये। और यदि अगर आप सच्चा जीवन का अनुशरण करते है तो आप किसी भी प्रकार के कलंक या किसी परेशानी से बच सकते है। ऐसी कहानियाँ या कथा प्रसंग केवल आध्यात्मिक कहानियों के रूप मे ही नहीं होती बल्कि इनसे हमे जीवन के कुच्छ आदर्श भी सीखने को मिलते है। जैसे यहा हम सीख सकते है किस प्रकार सच्चाई के मार्ग का अनुशरण करने वाले व्यक्ति को कभी भी अपयश अपने जद मे नहीं कर सकता है। उसका हर देश काल परिस्थिति मे यश के रूप मे ही अभिवादन होगा।

||इति शुभम्य||

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