भगवान श्री कृष्ण की मृत्यु का रहस्य और यदुवंश का नाश- कथा प्रसंग

कार्तिक मास

हम सभी जानते है कि भगवान श्री कृष्ण स्वयं प्रभु हरि के अवतार स्वरूप थे। और जब इनका पृथ्वी पर आने का उद्द्येश्य पूरा हो जाता है तो इन्हे अपने अवतारी स्वरूप का त्याग कर अपने लोक मे वापस जाना होता है।

तो आज हम जानेंगे कि भगवान श्री कृष्ण की मृत्यु का रहस्य क्या है। और उसके पश्चात पांडवों के वन गमन का वृतांत की भी बात करेंगे। जिसमे बहुत सारे रोचक तथ्य और नई जानकारियाँ समाहित है। इस प्रसंग हेतु हम भागवत पुराण और और महाभारत जैसे ग्रन्थों का संदर्भ लेकर इसका प्रसंग प्रस्तुत करेंगे।

भगवान श्री कृष्ण की मृत्यु का उद्द्येश्य-

बात तब की है जब महाभारत का युद्ध समाप्त हो चुका था। युधिष्ठिर का राज्याभिषेक हो चुका था और पांडवों को हस्तिनापुर का साम्राज्य प्राप्त हो चुका था। दूसरी तरफ श्री कृष्ण भी अपनी द्वारिका नागरी मे वापस जा चुके थे।

अब भगवान हरी के अवतार लेने का उद्देश्य समाप्त हो चुका था अतः उन्हे इस अवतार रूपी स्वरूप का त्याग करना था। द्वितीय कारण यह था कि द्वारका पूरी मे निवास कर रहे श्री कृष्ण के कुल के होने के कारण यदुवंशी बहुत ही शक्तिशाली हो चुके थे।

देवताओं मे भी इनसे सामना करने की हिम्मत नहीं थी। अतः इस शक्तिशाली वंश को सीमित और इनके अंकुश लगाने हेतु भी भगवान श्री कृष्ण को अपने स्वरूप का त्याग करने की आवश्यकता थी। तब भगवान श्री कृष्ण ने अपने अवतारी स्वरूप की अंतिम लीला का आह्वान किया।

कथा प्रसंग-

जिसके अनुसार एक बार महर्षि दुर्वासा, महर्षि विश्वामित्र और देवर्षि नारद द्वारिका भ्रमण पर थे। और यदुकुल के बालक उद्दंड स्वभाव के होने के कारण उन्होने तीनों ऋषियों से मज़ाक करने का प्रयास किया।

और श्री कृष्ण और जामवंती के पुत्र सांब ने एक गर्भवती स्त्री का रूप धारण कर तीनों मुनियो के साथ मज़ाक करने का प्रयास किया लेकिन तीनों ऋषि अंतर्यामी होने के कारण उनकी मंशा को जान लिया।

और सांब को श्राप दिया कि तुम्हारे इस झूठे गर्भ से मूसल का जन्म होगा और यदुवंश के नाश का कारण बनेगा। तीनों ऋषियों का श्राप देना भी भगवान की लीला का ही एक अंश था।

श्राप बना कुल नाश का कारण-

श्राप मिलने के उपरांत सांब सहित सभी भाई बहुत ही विचलित हो गए और उन्होने जब उस नकली गर्भ को चीर कर देखा तो उसमे से एक मूसल प्राप्त हुआ। जिसे देखकर सभी भाई बहुत ही भयभीत हो गए।

और वो अपनी समस्या को लेकर मथुरा के राजा एवं कंश के पिता अग्रसेन के पास पहुंचे। और उनसे समस्त प्रसंग प्रस्तुत किया तथा अपने भय  का कारण बताते हुए उपाय बताने के लिए कहा।

इसपर अग्रसेन ने उन्हे सलाह दी की वो उस मूसल का चूर्ण बनाकर उसे उसे जला दे तथा उसमे बचे हुए लोहे को समुद्र मे प्रवाहित कर दे। जैसा सभी भाइयों को कहा गया उन्होने वैसा ही किया।

लेकिन भगवान की लीला को कौन टाल सकता है। और उनके फेंके गए लोहे के टुकड़े को समुद्र मे रह रही एक मछली ने खा लिया। जिसे कुछ दिनो बाद कुछ मछुवारों ने जाल मे फंसा लिया। और वो मछली एक बहेलिये को मिली और उस लोहे के टुकड़े से एक बाण का निर्माण किया।

लीला की पूर्णाहुति-

इधर द्वारका पूरी मे श्राप की बात सभी को पता चल गई और पूरे राज्य मे अपसगुन की घटनाए घटने लगी। और लोग विचलित रहने लगे इस विचलन के कारण सभी महिला पुरुष दो नियत स्थानो का चयन कर ईश वंदना करने लगे।

साथ ही अपने विचलन को कम करने के लिए एक विशेष प्रकार का पेय का पान सभी यदुवंशी पुरुष पान करने लगे। वो पेय तो पीने मे मधुर था लेकिन उसके पान से लोगो कि मति भ्रमित रहने लगी और सभी पुरुष आपस मे लड़ने लगे।

और एक दूसरे से लड़ते हुए उन्होने एक दूसरे को समाप्त कर दिया। इस घटना ने बलराम को भी विचलित कर दिया और उन्होने समुद्र तट पर ध्यान करते हुए अपने दिव्य अवतारी स्वरूप का त्याग कर दिया और पुनः वैकुंठ लोक वापस चले गए।

भगवान कृष्ण की मृत्यु-

उपरोक्त घटना के घटित हो जाने के उपरांत कृष्ण एक दिन एक पीपल के पेड़ के नीचे विश्राम कर रहे होते है और और उसी उपवन मे वही बहेलिया जिसने मूसल से प्राप्त लोहे से बाण का निर्माण किया था उसे लेकर शिकार करने आता है।

और श्री कृष्ण के पैर के तलवे को देखकर भ्रमित हो जाता है क्योंकि वो इतनी लालिमा लिए हुए होता है कि उनका पैर बहेलिये को हिरण का मुख प्रतीत होता है। और उसी बाण को बहेलिया श्री कृष्ण के पैरों पर चला देता है।

और उस बाण के लगते ही भगवान कृष्ण अपने अवतारी शरीर का त्याग कर वैकुंठ धाम वापस प्रस्थान कर जाते है।

कौन था बहेलिया-

जिस बहेलिये ने तीर से भगवान श्री कृष्ण की मृत्यु होती है उसको लेकर भी बहुत ही अच्छा प्रसंग है। मान्यता है ये बहेलिया ही पिछले जन्म मे किष्किंधा नरेश बालि रहता है। और जब भगवान श्री राम के के द्वारा उसका वध किया जाता है तो बालि उनसे प्रश्न करता है कि उन्हे छल से छुपकर बाण चलाया गया है।

अगले जन्म मे वो भी उनपर छुपकर बाण चलाएगा और जिससे उनकी  मृत्यु होगी। और इसी कारण से मान्यता है कि ये किष्किंधा नरेश बालि ही अगले जन्म मे बहेलिये के रूप मे भगवान श्री कृष्ण के ऊपर बाण चलता है। और जिससे श्री कृष्ण अपने अवतारी शरीर का त्याग करते है।

निष्कर्ष 

उपरोक्त कथा का प्रसंग का मूल स्वरूप श्री मद भागवात पुराण के 11वे स्कन्द मे वर्णन देखने को मिल जाता है। और कई प्रसंग लोक कथाओं के द्वारा और कुछ अंश महाभारत से प्राप्त किया जा सकता है।

कहने को तो भगवान श्री कृष्ण की मृत्यु का प्रसंग है लेकिन स्वयं श्री कृष्ण ने श्री मदभगवत गीता मे बोला है कि जब जब इस संसार मे धर्म का नाश होगा और अधर्म की वृद्धि होगी तब तब वो अवतार रूप मे आएंगे और संसार को पुनः अधर्म और अन्याय से मुक्त करेंगे।

और इस उद्देश्य की पूर्ति होने के उपरांत अपने लोक को निर्गमन करेंगे। उसी क्रम मे श्री कृष्ण ने भी अवतार लिया और अपनी लीलाए लोगो को दिखाई गीता के रूप मे कर्म योग का ज्ञान प्रदान किया और उद्देश्य की पूर्ति होने के उपरांत अंतिम लीला को घटित कर अपने अवतारी स्वरूप का त्याग किया।

||इति शुभम्य||

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