महाभारत: कौरवों के जन्म की कथा

कौरवों के जन्म की कथा- महाभारत एक ऐसा महाकाव्य है जिसमे हजारो छोटी छोटी कथाएँ जुड़ी हुई है। महाभारत की कहानिया कड़ियों के रूप में एक दूसरे से जुड़ी हुई है और वो एक महाकाव्य का निर्माण करती है। महाभारत हमे अपने जीवन के हर मार्ग से जुड़ी समस्याओं और कठिनाइयों को सुलझाने एवं नैतिक जीवन जीने की राह दिखाती हैं। महाभारत की कथा हमारे मन में बहुत सारे प्रश्न भी उत्पन्न करती है। जैसे कि हर किसी के मस्तिष्क में ये प्रश्न उठता होगा की महाभारत में कौरवों का जन्म कैसे हुआ। कैसे एक महिला ने 100 पुत्रों को जन्म दिया ये एक आश्चर्य का विषय है।

महाभारत की कहानिया रोचक और शिक्षाप्रद है। भीष्म पितामह के प्रण के बाद हस्तिनापुर साम्राज्य के उथल पुथल, सत्य और असत्य के संघर्ष कि कहानी, ईश्वर के द्वारा दी गई जीवन दर्शन (गीता) की कहानी, कर्मयोग की कहानी। सब कुछ केवल इस एक महाकाव्य महाभारत में ही देखने को मिलती है।

वैसे तो महाभारत कई पीढ़ियों की कहानी है लेकिन शीर्षक को देखते हुए हम बात करेंगे हस्तिनपुर के राजा विचित्रवीर्य और उनकी पत्नी अम्बालिका की। महर्षि वेद व्यास के आशीर्वाद से इनको दो पुत्रो कि प्राप्ति हुई जिनका नाम धृतराष्ट्र और पांडु था। धृतराष्ट्र जन्मान्ध थे जो कि विचित्रवीर्य के ज्येष्ठ पुत्र थे। धृतराष्ट्र का विववाह गांधार नरेश की पुत्री गांधारी से हुआ था।

गांधारी एक पतिव्रता और अपने परिवार के प्रति आदर्श जीवन का यापन करती थी। जब उसे अपने पति के जन्मान्ध होने की सूचना मिली तो उन्होने अपने आंखो पर जीवन भर पट्टी बांधकर जीवन निर्वाह करने का प्रण लिया। इसी के साथ पांडु का विवाह कुंती और माद्री से हुआ। समय के साथ कुंती और माद्री ने शिशु को जन्म दिया। गांधारी को इसका दुख रहता था की वो उनसे बड़ी है फिर भी उसे संतान सुख अभी तक नहीं मिला।
एक बार महर्षि वेद व्यास हस्तिनपुर के राज दरबार में आए। और गांधारी ने अपना दुख उन्हे बताया। उपाय के रूप में महर्षि वेदव्यास ने गांधारी को एक मंत्र प्रदान किया और बोला इसके जप से उसे गर्भ धारण हो जाएगा। गांधारी महर्षि के कहे अनुसार मंत्र का जाप करने लगी और उसने गर्भ धारण कर लिया। गर्भ धारण किए बहुत समय बीत जाने के बाद भी गांधारी शिशु को जन्म नहीं दे पा रही थी।
जन्म ना दे पाने से आक्रोश में आकार गांधारी ने अपने गर्भ पर मुष्टिका प्रहार क्या जिससे एक मांस का टुकड़ा उसे प्राप्त हुआ। उस मांस के टुकड़े को गांधारी ने अपने दासी को कई दूर फेंक आने को बोला। दासी पर महर्षि वेदव्यास की नजर उस दासी पर पड़ती है। और दासी महर्षि को समस्त समाचार सुनाती है।

जिसके बाद महर्षि वेदव्यास गांधारी के पास जाते है और उस मांस के टुकड़े के 101 खंडों में विभाजित करते है। और उन मांस खंडों को 101 घट पात्रो में बंद कर रखने को बोलते है। और गांडरी को पुनः एक मंत्र देते है। और उस मंत्र का जाप करते हुए प्रतिदिन जल से सिंचित करने को बोलते है। और नौ माह पश्चात उन घट पात्रो को खोलने को कह कर वह से चले जाते है।
महर्षि वेद व्यास के बताए अनुसार गांधारी उन घट पात्रो को बताए नियमो के अनुसार मंत्र का जाप करते हुए जल से सिंचित करती है और समय आने पर एक एक कर घट को खोलती है।
इस प्रकार प्रथम घट से एक पुत्र का जन्म होता है। जिसको दुर्योधन के नाम से जाना जाता है। इसी प्रकार अन्य 99 घाटों से पुत्र की प्राप्ति होती है। और अंतिम घट से पुत्री की प्राप्ति होती है। जिसे महाभारत में दुःशाला के नाम से जाना जाता है और जिसका विवाह जैद्रथ से होता है।

निष्कर्ष

इस प्रकार से महाभारत कथा के अनुसार धृतराष्ट्र और गांधारी के पुत्रों कौरवों का जन्म होता है। इस कथा के कई निष्कर्ष निकलते है। इस कथा के द्वारा मंत्रों के प्रभाव के बारे में पता चलता है। पांडु के पाँच पुत्र जिनके अंदर धर्म का पालन करने का गुण हमेशा विद्यमान रहता है और कौरवों में क्रोध की अधिकता रहती है जिससे वो सौ भाई होने के उपरांत भी अपना विनाश कर लेते है। उनके स्वभाव में इन भावो का होने का कारण भी कही न कही इस कथा में व्याप्त है।

जब पांडु कि पत्नियाँ गर्भवती रहती है तो वो अपना गर्भकाल बहुत ही खुशी खुशी नियमतः व्यतीत करती है जिसके कारण उनके पुत्र मे अच्छे गुण देखने को मिलते है। जबकि गर्भ धारण के समय ही गांधारी में क्रोध की अधिकता, जिस क्रोध के कारण वो अपना गर्भ गिरा देती है। इसी व्यवहार के कारण गांधारी के पुत्रों में बुरे भाव विद्यमान रहते है।


!इति शुभम्!

Leave a Comment