काशी, वाराणसी, बनारस: भारत की सांस्कृतिक राजधानी, मोक्ष नगरी

मान्यताओं के अनुसार वाराणसी का नाम विश्व के प्राचीनतम नगरों में आता है। इसे शिव और मोक्ष की नगरी के रूप में भी देखा जाता है। वरुणा और असि नामक नदियों के बीच बसे होने के कारण इसे वाराणसी के नाम से जाना जाता है। लोग यहाँ मरने की कामना से अपना अंतिम समय भी गुजारने आते है। जिससे की मृत्यु उपरांत उन्हे जीवन मरण के जंजाल से मुक्ति मिलकर मोक्ष की प्राप्ति हो। वाराणसी शहर विविधताओं से भरा हुआ है। एक ओर जहां ये सनातन धर्म का एक प्रमुख धार्मिल स्थल है, वही ये बौद्ध धर्म के लोगो के लिए भी बहुत पवित्र स्थल है। एक तरफ जहां लोग यहा की प्राचीन संस्कृति को देख कर आश्चर्यचकित होते है वही दूसरी तरफ ये आधुनिक विद्या के प्रचार प्रसार में भी महत्वपूर्ण योगदान प्रदान करती है। बनारस की विविधताएँ एक लेख के द्वारा नहीं बताई जा सकती है। फिर भी हम इस लेख के द्वारा उसकी कुछ प्रमुख विशेषताओं को सार रूप में प्रस्तुत करने का प्रयास करेंगे।

प्राचीन धार्मिक नगरी

वाराणसी पूरे विश्व में अपने प्राचीनतम धार्मिक संस्कृति के लिए प्रसिद्ध है। सनातन धर्म में इसे आदि देव शिव की नगरी के रूप में देखा जाता है। वही बौद्ध धर्म में भी इसको बहुत ही पुण्य स्थली के रूप में मान्यता दी जाती है। काशी को मंदिरों का शहर बोला जाता है। और ये बोलना अतिस्योक्ति नहीं होगा। काशी को घाटों का शहर भी माना जाता है। यहा प्राचीनतम अस्सी घाटों के अलावा अन्य कई घाटों का भी अपना एक महत्व है। यहा के लोग या यहाँ की भाषा में बोले तो यहा के अल्हड़ बनारसियों के दिन की शुरुवात घाट से शुरू होकर घाट पर ही पूर्ण होती है। कुछ प्राचीन धार्मिक रूप से महत्वपूर्ण स्थान इस प्रकार से है।

काशी विश्वनाथ, काल भैरव, और दशाश्वमेध घाट

वाराणसी शहर के हृदय में स्थित गोदौलिया नमक स्थान के पास उपरोक्त तीनों स्थल स्थित है। काशी विश्वनाथ मंदिर का वर्णन बारह ज्योतिर्लिंग के अंतर्गत आता है। जब भागीरथी माँ गंगा भगवान शिव के जटा के जरिये धरती लोक के लिए निकलती है तो भगवान शिव इन्हे काशी नमक स्थान पर पुनः मिलने के लिए वचन देते है। और इसी कारण ज्योतिर्लिंग के रूप में काशी विश्वनाथ के नाम से स्थापित होते है। कुछ धार्मिक ग्रन्थों के अनुसार भगवान शिव को धरती पर केवल काशी सबसे ज्यादा पसंद है इसलिए इसे इन्होने अपना एक निवास स्थान माना है। काशी विश्वनाथ मंदिर के प्रांगण में ही माता अन्नपूर्णा का स्थान भी है। जिन्हे लोग मान्यताओं के अनुसार भरण पोषण की देवी के रूप में मानते है। वैसे तो अन्नपूर्णा मंदिर में हर दिन दर्शन पूजन होता है लेकिन उनका गर्भगृह केवल अन्नकूट त्योहार के दिन होता है। विश्वनाथ मंदिर से थोड़ी दूरी पर काल भैरव बाबा का मंदिर स्थित है। रविवार के दिन भैरव दर्शन का एक विशेष महत्व है। सनातन धर्म की मान्यताओं के अनुसार हर प्राचीन नगरी में किसी देव को वहाँ का कोतवाल नियुक्त किया गया है। इसी प्रकार काशी के कोतवाल के रूप में काल भैरव बाबा की मान्यता है। कहते है काशी में कितने दिनो तक आपका निवास होगा इसका निर्णय कालभैरव बाबा की कृपा से होता है। विश्वनाथ मंदिर से पूर्व दिशा में दशाश्वमेध घाट है। मान्यता है यहा स्वयं ब्रह्मा ने दश अश्वमेध यज्ञ का अनुष्ठान किया था। जिसके कारण इसका नाम पड़ा। संध्या के समय यहाँ होने वाली गंगा आरती पूरे विश्व में प्रसिद्ध है तथा बहुत ही मनमोहक है।

संकटमोचन मंदिर, दुर्गाकुण्ड, मानस मंदिर, अस्सी घाट

वाराणसी में वैसे तो मंदिरों देव स्थानो की कोई कमी नहीं है, लेकिन प्रसिद्ध मंदिरों में संकट मोचन और मानस मंदिर प्रसिद्ध मंदिरों में से एक है। संकट मोचन मंदिर श्री हनुमान जी का मंदिर है। जिसकी स्थापना गोस्वामी तुलसीदास ने किया था। मान्यता है कि इसी स्थान पर तुलसीदास को भूत मिला था तथा उसने हनुमान जी के दर्शन का मार्ग बताया था तथा यही पर हनुमान मंदिर की स्थापना कर रामचरित मानस रचना आरंभ की थी। संकट मोचन मंदिर से कुछ दूरी पर दुर्गाकुण्ड और मानस मंदिर है। दुर्गाकुण्ड मंदिर का वर्णन दुर्गा सप्तसती में भी मिलता है। इसके ही पास प्रभु श्री राम एवं सीता का इकलौता प्रसिद्ध मंदिर मानस मंदिर है। जहा हर वर्ष श्रावण महीने में पूरे मास झुलनोत्सव का कार्यक्रम आयोजित किया जाता है। वैसे तो वाराणसी में बहुत से घाट प्रसिद्ध है लेकिन अस्सी घाट का अपना महत्वपूर्ण स्थान है, मान्यता है गोस्वामी तुलसीदास ने यही पर श्री रामचरित मानस की रचना की थी।

सारनाथ एवं अन्य महत्वपूर्ण स्थल

वाराणसी रेलवे स्टेशन से लगभग 15 किमी. दूर सारनाथ का बौद्ध अनुयायियों के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण स्थान है। यहा भगवान बुद्ध ने ज्ञान प्राप्त करने के उपरांत सर्वप्रथम उपदेश दिया था। साथ ही साथ सम्राट अशोक ने यहा कई स्तूपो इत्यादि का निर्माण कार्य था जिसका पुरातत्व शास्त्र में बहुत ही महत्वपूर्ण स्थान है। भारत का अशोक स्तम्भ इसी जगह से लिया गया है। विदेशो से बौद्ध धर्म के अनुयायी यहा ज्ञान और शांति की तलाश में आते है। इसके साथ बहुत सारे स्थान वाराणसी में धार्मिक रूप से प्रसिद्ध है जिनमे शीतला माता मंदिर, हरिश्चंद्र घाट, मणिकर्णिका घाट, कबीर मठ, राम नगर की रामलीला बटुक भैरव मंदिर, तिलभांडेश्वर मंदिर इत्यादि आते है। यह सूची बहुत ही बड़ी है।

सर्व शिक्षा की राजधानी

पुरातन काल से ही काशी का शिक्षा के क्षेत्र में बहुत ही महत्व है। पहले लोग यहा कर्मकांड, शाष्त्रार्थ की शिक्षा लेने आते थे। कहते है काशी के ही मंडन मिश्र ने आदि शंकराचार्य को वेदान्त शाष्त्रार्थ में पराजित किया था। आज भी वाराणसी को अगर शिक्षा के क्षेत्र मे देखा जाये तो यहा कई विश्वविद्यालय जिनमे काशी हिन्दू विश्वविद्यालय जहा पुरातन शास्त्र से लेकर आधुनिक विज्ञान तक की शिक्षा दी जाती है। इसके साथ ही संपूर्णनाद संस्कृत विश्वविद्यालय जो की संस्कृत विद्या को समर्पित है। तिब्बती विश्वविद्यालय और काशी विद्यापीठ जैसे प्रमुख शिक्षण संस्थान है।

काशी का अल्हड़पन (जीवनशैली)

काशी में बहुत ही विविधता है। यहा की जीवन शैली बहुत ही उल्लास भरी रहती है। यहा हर कोई एके दूसरे को गुरु कह कर संबोधित करता है। यहा की सुबह कि शुरुवात गंगा स्नान से होती है। खाने पीने के मामले में बनारस जैसा कोई शहर नहीं है। सुबह के नाश्ते में कचौड़ी जलेबी से शुरुवात होती है। और शाम को मलाइयों से पूर्ण होती है। गोदौलिया का काशी चाट भंडार, लंका का पहलवान का लस्सी, केशव का पान बहुत ही प्रसिद्ध है। काशी को सात वार तेरह त्योहार का शहर माना जाता है। विभिन्न त्योहारो, रामलीला, दुर्गापूजा, नक्कटैया, रथयात्रा इत्यादि जैसे बहुत सारे उत्सवो का आयोजन होता रहता है। काशी सांस्कृतिक नगरी के दर्शन से हमे कई संस्कृतियों, आनंदित जीवन शैली का बहुत ही अनुपम अनुभव होता है।

!इति शुभम्!

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