कार्तिक मास कल्प मास – भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त करने का सर्वोत्तम मास (अयोध्या कार्तिक मास मेला)

भारतीय संस्कृति और परंपरा के अंतर्गत श्रावण मास के उपरांत आने वाले चतुर्मास का बहुत ही अधिक महत्व है। और इन्ही चतुर्मास का अंतिम मास कार्तिक मास होता है जो कि पूर्ण रूप से भगवान विष्णु को समर्पित है।

मान्यता है कि इस मास मे भगवत भक्ति और आराधन करने मात्र से मनुष्य सभी कष्टों से पार पा सकता है साथ ही साथ उसी स्वयं भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त होती है। इस मास को कल्प मास के रूप मे भी जाना जाता है जिसमे सन्यास आश्रम मे प्रवेश कर चुके लोग पूरे मास कल्प वास का अनुशरण करते है।

तो आज हम क्रमानुसार कार्तिक मास के महत्व तथा इस मास मे क्या क्या अनुशरण करना चाहिए उसके बारे मे बात करेंगे।

कार्तिक मास का महत्व-

भारतीय पंचांग के अनुसार आषाढ़ मास की हरी शयनी एकादशी के दिन भगवान विष्णु चार मास के लिए शयन करते है और पुनः कार्तिक मास की हरी प्रबोधिनी एकादशी के दिन शयन से उठते है।

साथ ही साथ इस मास मे कई अन्य त्योहार और पर्व भी पड़ते है जिनमे दीपावली, उत्तर भारत की मान्यता के अनुसार प्रभु हनुमान जी की जयंती, कार्तिक पुर्णिमा और तुलसी पूजन और तुलसी विवाह का आयोजन किया जाता है।

इसलिए ये सम्पूर्ण मास भारतीय सनातन धर्म परंपरा के अनुसार भगवत भक्ति और ईश वंदना को समर्पित है।

कल्प वास की प्रक्रिया-

अब बात करेंगे की कार्तिक मास मे कल्प वास का क्या महत्व है। हम सभी जानते है हमारी संस्कृति मे चार आश्रमों के अनुसार जीवन यापन करने का सिद्धान्त है जिनमे ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और सन्यास आश्रम के बारे मे बताया गया है।

सन्यास आश्रम की शुरुवात जीवन काल के अंतिम चरण मे होता है। और इसके अनुसार व्यक्ति अपने पैतृक गृह, परिवार इत्यादि का त्याग करके सम्पूर्ण बचा हुआ जीवन ईश्वर आराधना मे व्यतीत करता है।

इसी क्रम मे आज के इस आधुनिक जीवन शैली मे ये संभव तो नहीं है लेकिन कल्प वास के जरिये एक मास सन्यास आश्रम को समर्पित किया गया है।

सन्यास आश्रम के अंतर्गत व्यक्ति किसी भी तीर्थ स्थल पर एक मास वास करता है। और तीन समय की संध्या पूजन करता है। तीर्थ पर स्थित पवित्र नदी तट पर सूर्योदय पूर्व स्नान करना, उसके उपरांत प्रमुख मंदिरों मे जाकर ईश्वर दर्शन करना, दिन भर मे केवल एक समय भोजन ग्रहण करना और जमीन पर शयन करना होता है।

साथ ही साथ पूरे दिन ईश्वर नाम का जप, आध्यात्मिक सत्संग और कथा इत्यादि को सुनना ही उसका एक मात्र कार्य होना चाहिए। सभी प्रकार के सामाजिक क्रिया कलापों से दूर केवल भगवत भक्ति की तरफ ही इस पूरे मास ध्यान लगाने की बात काही गई है।

तुलसी पूजन-

मान्यता है कि भगवान विष्णु को तुलसी बहुत ही ज्यादा प्रिय है और इसके बगैर कोई भोग भी बहगवान ग्रहण नहीं करते है। तुलसी को अपनी पत्नी के रूप मे बहगवान विष्णु ने उन्हे दर्जा दिया है।

और ये सम्पूर्ण मास तुलसी पूजन की मान्यता बहुत ही ज्यादा महत्वपूर्ण है। सम्पूर्ण कार्तिक मास मे यदि घर की स्त्री घर मे तुलसी के पौधे का पूजन और सूर्योदय एवं सूर्यास्त के समय यदि उन्हे दीप प्रज्वलित करके उनकी आराधना करती है तो घर मे सुख शांति और समृद्धि बनी रहती है।

वैसे तो घर की स्त्री को पूरे वर्ष तुलसी पूजन की मान्यता की बात कही गई है लेकिन कार्तिक मास मे तुलसी पूजन से सभी फलों का महत्व और अत्यधिक बढ़ जाता है।

कार्तिक मास मेला अयोध्या-

कार्तिक मास मे बहुत सारे तीर्थों मे मेले का आयोजन होता है। उन्ही मे से एक अयोध्या के कार्तिक मास का मेला बहुत ही ज्यादा प्रसिद्ध है। शरद पुर्णिमा के दिन से ही लोग अयोध्या आने लगते है।

और लोग एक मास कल्प वास का पालन करते है। साथ ही साथ यहाँ पर दो तरह की परिक्रमा का आयोजन भी किया जाता है जिसमे दूर दूर से लोग नंगे पाँव सम्पूर्ण अयोध्या क्षेत्र की परिक्रमा करते है।

इनमे से प्रथम परिक्रमा पाँच कोस की होती है जिसे पंचकोसी परिक्रमा के नाम से जानते है। और दूसरी चौदह कोस की परिक्रमा होती है। एक कोस को लगभग 3 किलोमीटर के रूप मे जाना जाता है।

सबसे पहले कार्तिक मास शुक्ल पक्ष के नवमी तिथि को चौदह कोस की परिक्रमा होती है। और दूसरा एकादशी अथवा प्रबोधिनी एकादशी तिथि के दिन पाँच कोस की परिक्रमा होती है

साथ ही साथ कार्तिक मास के मेला का समापन कार्तिक मास की पुर्णिमा तिथि को पवित्र नदी सरयू मे स्नान के साथ समाप्त होती है। इस मेला की भव्यता देखने लायक है। दर्शनार्थियों की इतनी भीड़ देखने को मिलती है कि तिल भर की भी जगह नहीं बचती है। लोग दूर दूर से आते है।

प्रशासन का बहुत ही अच्छा प्रबंध रहता है। लोग स्वयं सहायता भी करते है। इस मेले मे भंडारे, चिकित्सा इत्यादि की व्यवस्था सुलभ होती है। साथ ही साथ सभी प्रमुख मंदिर इत्यादि मे विभिन्न कार्यक्रम होते है।

बहुत सारे जगहों पर कथा, सत्संग इत्यादि का आयोजन होता रहता है। सम्पूर्ण वातावरण मे आध्यात्म की महक रहती है। सम्पूर्ण अयोध्या नगरी भक्ति भाव से सराबोर रहती है।

सार-

कार्तिक मास को बहुत ही पुण्य मास के रूप मे माना जाता है जिस प्रकार से श्रावण मास मे शिव भक्ति और आराधना का प्रावधान है उसी प्रकार से कार्तिक मास मे भगवान विष्णु की आराधना और भक्ति का प्रावधान है।

मान्यता है कि सभी शुभ कार्यों को चातुर्मास मे वर्जित माना जाता है। और कार्तिक मास मे भगवान श्री हरी के शयन से उठने के उपरांत ही शुभ कार्यों की शुरुआत होती है।

हमारी आज कल की जिंदगी बहुत ही भाग दौड़ भरी है। हमे किसी भी कार्य के लिए समय निकालना बहुत ही कठिन होता है। जिसके चलते हमारा मन मस्तिष्क शांति का एहसास नहीं कर पता है।

और कार्तिक मास मे यदि हम अपना मन उस ईश्वर मे लगाए और उनकी आराधना के लिए समय निकले तो हमे शांति का एहसास होगा और और इस आध्यात्मिक एहसास से हमे जीवन मे स्थूलता प्राप्त होगी। तो आइये इस कार्तिक मास मे हम भी अपना मन ईश्वर आराधना मे लगते है और आध्यात्मिक शांति और ईश्वर की कृपा प्राप्त करते है।

||इति शुभम्य||

Leave a Comment