क्या होता है कर्म योग (Karm Yog): कर्म योगी (Karma Yogi) के लक्षण

भारतीय सनातन धर्म मे हमारे जीवन में कर्म की बहुत ही ज्यादा प्रधनता है। गीता मे भी कर्म की सम्पूर्ण और विस्तृत व्याख्या की गई है। अतः कर्म की प्रधानता हमारे जीवन मे आवश्यक तत्व के रूप में है। कर्म ही हमारे पाप पुण्य का निर्धारण करता है। और उससे ही हमारे आगे का जीवन निर्धारित होता है। इसी से जुड़ा शब्द Karm Yog इसकी सम्पूर्ण व्याख्या करता है। तथा कर्म योग के अनुशरण के द्वारा हम karm Yogi की पहचान करते है। तो आइये जानने का प्रयास करते है इन दो महत्वपूर्ण शब्दो को।

कर्म क्या है- उपरोक्त दो शब्दो की व्याख्या करने से पहले महत्वपूर्ण है कर्म शब्द को जानना। कर्म को पर्यायवाची शब्द है, क्रिया। अतः हमारे सम्पूर्ण जीवन मे हम जो कुछ भी क्रियाए करते है। वो कर्म के अंतर्गत है। हमारी दैनिक क्रियाएँ हमारी सामाजिक क्रियाएँ हमारी व्यावहारिक क्रियाएँ सब कुछ कर्म के अंतर्गत ही आते है। ये तो हुई सामान्य परिभाषा लेकिन अगर बात करे दार्शनिक विवेचना की तो हमे गीता के कर्म के भेद को जानना पड़ेगा।

गीता के अनुसार निष्काम और सकाम कर्म- श्रीमद्भगवत गीता का सभी सनातन धर्म के अनुयायियों के जीवन मे बहुत ही ज्यादा महत्व है। इसको हम धर्म के अनुसार वर्णित नैतिक या विधिक पुस्तक के रूप में जानते है। गीता का निर्माण अर्जुन और श्रीक़ृष्ण के मध्य संवाद से संबन्धित है। महाभारत युद्ध के समय जब अर्जुन अपने लोगो से युद्ध करने से मना करते है तो श्री कृष्ण अर्जुन को ज्ञान प्रदान करते है। जिसे जनमानस के द्वारा गीता के नाम से जाना जाता है।

तथा यही कर्म योग की मूल ज्ञान के रूप मे जानी जाती है। इसके अंतर्गत श्रीकृष्ण ने दो तरह के कर्म की व्याख्या किया है। जिसे सकाम कर्म और निष्काम कर्म के रूप मे वर्णन किया गया है।

सकाम कर्म- सकाम कर्म वो कर्म के है जिसके अंतर्गत हम कोई क्रिया करते हुए उसके फल की इच्छा रखते है। जो हमारे सामाजिक जीवन के लाभ से जुड़ा हुआ होता है। श्री कृष्ण के अनुसार यदि जीव सकाम कर्म का अनुशरण करता है। तो वो माया के बंधनो से जुड़ा रहता है। तथा जिसके बाद उसकी इच्छाए कभी खत्म नहीं होती है। और वो मुक्ति के मार्ग से विचलित होता जाता है। जो कि एक जीव का अंतिम उद्येश्य होना चाहिए। सकाम कर्म हमे जीवन मरण के बंधन मे बांध कर रखता है। और इसके कारण हम परम शक्ति या परमात्मा से जुड़ नहीं पाते। परम शक्ति का साक्षात्कार के मार्ग से हम विचलित हो जाते है। अतः सकाम कर्म को निम्न श्रेणी के कर्म के रूप मे जाना जाता है।

निष्काम कर्म-

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन ।
मा कर्मफलहेतुर्भुर्मा ते संगोऽस्त्वकर्मणि ॥

श्रीमद्भग्वत् गीता का उपरोक्त श्लोक ही सम्पूर्ण निष्काम कर्म की परिभाषा की व्याख्या करता है। इसके अंतर्गत श्री कृष्ण कहते है, कभी भी कर्म को फल की चाह के बगैर करना चाहिए। कभी भी ऐसा नहीं सोचना चाहिए कि बगैर फल की छह के कर्र्म कैसे किया जा सकता है। कर्म को कर्तव्य के रूप मे करना चाहिए कर्म के साथ सफलता असफलता के रूप मे देखकर अग्रेषित नहीं करना चाहिए। कर्म करना ही जीव का कर्तव्य है। उसके परिणाम मे जीव का कोई अधिपत्य नहीं न ही उसके बारे मे विचार करना चाहिए।

कर्म योग और कर्म योगी- बात कर्म योग की हो तो जो भी जीव निष्काम कर्म का अनुशरण करता है। वो कर्म योग के मार्ग पर प्रसस्त है। अपने कर्तव्यो का पालन बिना किसी इच्छा और चाह के, नैतिक जीवन का अनुशरण करते हुए जीवन यापन, धर्म का कभी भी साथ न छोडते हुए कर्म का पालन, यही असली कर्म योग है। सनतम धर्म मे कुछ विधान बनाए गए है। जो जीवन का मार्ग दिखने मे सहयोग करते है। और यही नीति, विधान का अनुशरण करते हुए जीवन यापन ही असली कर्म योग है।
और जो जीव इस कर्म योग के मार्ग का राही बंता है वही असली कर्म योगी है।

वर्तमान समय मे कर्म योगी कौन?- बहुतों के मन मे ये बात अवश्य आएगी गीता का उपदेश द्वापर युग मे दिया गया था क्या आज के समय मे इसकी कोई उपयोगिता है। और यदि कोई उपयोगिता है तो आज के समय मे उसके विधानों का नोरधरन कैसे करे। तो हम जानने का प्रयास करेंगे कि कैसे कोई व्यक्ति आज के समय मे कर्म योगी कहलाएगा। तो कुच्छ महत्वपूर्ण तथ्यो के आधार पर हम उनका निर्धारण कर सकते है।

कर्तव्यनिष्ठ- जो भी व्यक्ति आज के समय मे अपने कर्तव्यों के प्रति बहुत ही संजीदा है। जो अपने कर्तव्यों को महत्व देता है। ये बगैर सोचे कि कर्तव्यपालन करते हुए उसे कोई लाभ होगा या नहीं। अथवा उसे सफलता मिलेगी या असफलता फिर भी यदि वो व्यक्ति अपने कर्तव्य के प्रति निष्ठावान है तो आज के समय मे वो कर्मयोगी के श्रेणी मे आता है।

ईमानदारी- ईमानदारी एक ऐसा तत्व है जो हर देश काल परिस्थिति मे एक विशेष स्थान रखती है। अगर कोई व्यक्ति ईमानदारी का पालन करता है। और बेईमानी के मार्ग से दूर ही रहता है। तो अवश्य ही वो लाभ हानि की परवाह नहीं करता है। यानि उसका कर्म निष्काम रूप मे है। तो अवश्य ही ऐसे व्यक्ति को कर्म योगी के श्रेणी मे देखा जा सकता है।

सत्यवादी- सत्यवादी व्यक्ति कभी भी अपने लाभ हेतु असत्य का साथ नहीं देगा वो सत्य जो कि शाश्वत है उसका ही अनुशहरण करेगा। और सत्य का पालन करते हुए वो कभी भी अबूचित कर्म नहीं करेगा तो इसे भी कर्म योगी के महत्वपूर्ण लक्षण माना जाएगा।

नैतिकता- यदि कोई व्यक्ति नैतिकता का अनुशरण करता है। जिसका तात्पर्य होगा वो उचित अनुचित का भेद देख सकता है। और हमेशा चाहे जैसी परिस्थिति हो उचित का ही साथ देगा। जिससे उसके द्वारा किसी का अहित नहीं होगा। तो ऐसा व्यक्ति कर्म योग का पालंकर्ता माना जाएगा।

संतुष्टि- सबसे महत्वपूर्ण गुण एक कर्म योगी का माना जाएगा उसका संतुष्ट होना। एक संतुष्ट व्यक्ति कभी भी कर्म फल की परवाह नहीं करेगा। उसमे इच्छाओं को काबू करने का साहस अवश्य होगा जो कि उसे निष्काम कर्म के मार्ग का वाहक बनाता है। और उसे कर्म योगी के रूप मे देखा जा सकता है।

निष्कर्ष-

मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। और हर मनुष्य को इस समाज से जुड़े रहना आवश्यक है। जिसके लिए कुछ नीतियों और विधानों का पालन करना होगा। धर्म शस्त्र के अनुसार सभी जीव परम सत्ता के ही अंश है। और इसके लिए सभी जीवो को एक समान मानना अति आवश्यक है। अगर हम केवल अपने लाभ की बात करेंगे और हर कोई व्यक्तिगत रूप से अपने बारे मे ही सोचेगा तो तो समाज मे उथल पुथल आ जाएगी। इसीलिए कुछ नीतियाँ निर्धारित की गई है। कर्म योग भी उसी क्रम मे परिभाषित किया गया है। जिसे स्वयं परमात्मा ने अपने श्रीमुख से कहा है। अतः इसके अनुसार अपने जीवन यात्रा को पूर्ण करना ही हमारा लक्ष्य होना चाहिए है।

||इति शुभम्य||

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