कैसे हुई कलियुग की शुरुआत और वो 5 स्थान जहां कलियुग का है निवास

कलियुग की शुरुआत और वो 5 स्थान जहां कलियुग का है निवास- Kissa Kahani

हम सभी जानते है कि भारतीय सनातन परंपरा में चार युगों का वर्णन हैं। और प्रत्येक युग का उसका विशेष गुण और अवगुण है। चारों युगों के द्वारा इस सृष्टि का संचालन होता है। प्रत्येक युग में पाप बढ़ता जाएगा और पुण्य का कार्य घटता जाएगा और अंत में इस सृष्टि का विनाश करके ईश्वर द्वारा पुनः सृजन किया जाएगा। और पुनः उसी क्रम मे चार युगों का क्रम शुरू हो जाएगा।

ये चार युग है- सतयुग, त्रेतायुग, द्वापरयुग और कलियुग

मान्यता है कि अभी हम लोग कलियुग मे जीवन यापन कर रहे है। सतयुग को उसके नाम के अनुरूप ही पूरी तरह सत्य के युग के रूप मे जाना जाता है। जहां सभी जीव किसी भी प्रकार का पाप नहीं करते सब तरफ केवल लोगो के प्रति प्रेम सद्भाव रहेगा। और छल कपट इत्यादि जैसे दुर्गुण का नाम भी ण हो हो और समय के बढ़ते क्रम मे युग परिवर्तित होते जाएंगे और पाप का स्टार भी बढ़ता जाएगा। उसी क्रम मे सबसे अंत मे कलियुग की शुरुआत होती है और ये युग सभी अवगुणों, बुरे कृत्यों से भरा हुआ होगा और जब पाप से पृथ्वी भी विचलित हो जाएगी तो इस सृष्टि मे ईश्वर संतुलन लाने हेतु अवतरण लेंगे।

अब बात करते है कि कलियुग की शुरुआत कैसे हुई-

हमने पहले के लेख मे श्री कृष्ण के मृत्यु और पांडवों के मृत्यु की कथा बताई है। उसी के आगे के क्रम मे जब पांडव अपने राज्य का सम्पूर्ण भार राजा परीक्षित को देकर हिमालय की ओर चले जाते है। तब कलियुग की शुरुआत होनी होती है। और वो राजा परीक्षित के पास उनसे अपने काल की शुरुआत करने हेतु उनसे आज्ञा मांगने आता है।

राजा परीक्षित अपने कुलगुरु और मनीषियों से जब इस बारे मे बात करते है तो वो ज्ञानी लोग राजा परीक्षित को आगाह करते है कि किस प्रकार से कलियुग अपना प्रभाव आप लोगो पर डालेगा और लोगो का मन पाप के कर्मों मे लाग्ने लगेगा और चरो तरफ केवल बुरे कृत्य होगे। छल, कपट ईर्ष्या, द्वेष इत्यादि की भावना लोगो मे वाश करेगी। बुरों का जैकार होगा और अच्छे एवं सच्चे लोगो को समाज का तिरस्कार झेलना पड़ेगा।

ये सारी बाते जानने के बाद राजा परीक्षित कलियुग को उसके काल की शुरुआत करने से माना करने की सोचते है इसपर कलियुग बोलता है कि आप समय को नहीं रोक सकते ये सब विधि के अंतर्गत ही होता है। आप हमे निवास के लिए स्थान प्रदान करे। विवशता वश राजा परीक्षित कलियुग को कुल पाँच जगह निवास के लिए देते है। और उन पाँच जगह के द्वारा ही कलियुग अपना सम्पूर्ण विस्तार करता है।

वो पाँच जगह इस प्रकार से है-

जुआ खेलने का स्थान- वो स्थान जहां जुआ खेला जाता हो। लेकिन आप इस को सीमित रूप मे नहीं ले सकते वो सभी स्थान जहां किसी भी प्रकार का सट्टा या फिर बुरे सौदे हो चाहे वो आज के समय मे सही ही क्यों न हो लेकिन यदि वो सौदा किसी के अहित के रूप मे है अथवा नीति के विरुद्ध है तो वो स्थान जुआ खेलने के स्थान के रूप मे ही जाना जाएगा।

मदिरा पान का स्थान- वो स्थान जहां लोग किसी प्रका र के मदिरा अथवा नशा का उपभोग करते हो वहाँ पर कलियुग का निवास होगा और कलियुग वहाँ से विस्तार करेगा। यहाँ मदिरा पान के स्थान से मतलब वो स्थान जहां लोगो की मति भ्रष्ट हो जहां लोगो म किसी प्रकार से सोचने समझने की शक्ति न बची हो उन सभी जगहों को इस रूप मे माना जाएगा।

वैश्यालय- तीसरा स्थान है वैश्यालय वो स्थान जहां महिला के इज्जत की सौदे बाजी होती हो अथवा जहां स्त्री को सम्मान न मिलता हो उन सभी स्थान का वाश करने वाले और या फिर वहाँ का विचरण करने वाले सभी लोगो पर कलियुग का प्रभाव होगा।

पशु बलि का स्थान- वो स्थान जहां पशु के साथ क्रूरता होती हो या फिर जहां पशुओं कि बलि दी जाती हो जहां उनके मांस अथवा उनके अंगों का व्यापार होता है उन स्थानों पर कलियुग का वाश होगा और उन स्तनों का विचरण करने वालों पर कलियुग का पूर्ण प्रभाव होगा।

स्वर्ण- पाँचवाँ और अंतिम स्थान है स्वर्ण अथवा सोना वो स्थान जहां भी सोना होगा वहाँ कलियुग का वाश होगा। और ये वही स्थान है जिसके कारण राजा परीक्षित पर भी कलियुग का प्रभाव पड़ा और उनकी एक गलती से उन्हे मृत्यु दंड का श्राप मिला इसकी कथा हम अपने अगले लेख मे बताएँगे।

उपरोक्त पाँच स्थानों के बारे मे यदि हम विस्तार से विचार करें। तो हम पाएंगे तो उपरोक्त पाँच स्थानों मे ही समस्त बुरे कृत्य अथवा पापों का विस्तार है। जुआ से तात्पर्य है नीति विरुद्ध सौदेबाजी अथवा व्यापार जहां अपने लाभ के लिए किसी भी प्रकार से सौदा किया जा सकता है।

मदिरा पान से तात्पर्य मति भ्रम से है हमारा कोई भी कर्म जो हमारे बुद्धि को सही बुरे मे अंतर करने से रोक दे और हमारे बहूटिक लाभ ही हमारे लिए उचित लगे। वैश्यालय से तात्पर्य वो सभी स्थान जहां हम स्त्री जाती के प्रति सम्मान का भाव न हो तथा एक दूसरे के प्रति बुरी नजर अथवा लोगो के मध्य मर्यादा का अभाव ये सभी अवगुण इसको प्रदर्शित करता है।

पशु बलि से तात्पर्य मन मे निर्दयता, क्रूरता, हिंसा का भाव और लोगो पर जुल्म करने का भाव ही इससे सम्पूर्ण रूप से परिभाषित करता है। सबसे अंत मे स्वर्ण अथवा सोना जो कि लोभ को प्रदर्शित जब हम नीति और विधि के विरुद्ध जा कर केवल धन संचय को ही महत्ता देते हो अथवा अर्थ को सम्पूर्ण सुख मानते हो तो वहाँ कलियुग का सम्पूर्ण प्रभाव है।

निष्कर्ष-

उपरोक्त पाँच स्थान जो कलियुग के लिए प्रदान किए गए वो इसके सम्पूर्ण परिभाषा बताते है कैसे कलियुग मे लोगो के मन मे पाप करने मे कोई लज्जा अथवा ग्लानि की भावना नहीं होगी कैसे नीति अनीति किसी के लिए मायने नहीं रखती है और जीवन मे भौतिक सुख और सम्पदा ही सब कुछ होगा रिश्तों मे भी लाभ हानि को ही महत्व दिया जाएगा। फिर कुछ लोगो होगे जो इन कुरीतियों से बचे रहेंगे और धर्म का पालन करेंगे लेकिन कलियुग के प्रभाव के कारण समाज उन्हे किसी भी रूप मे महत्व अथवा सम्मान नहीं देंगे।

||इति शुभम्य||

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