अच्छे कर्म और निराशा: दार्शनिक विवेचना

प्रायः हम देखते है जब किसी के साथ कुछ गलत होता है। तो वो कहते पाये जाते है कि उन्होने जीवन में कुछ गलत नहीं किया फिर भी उनके साथ बुरा क्यों हुआ यानि अच्छे कर्म और निराशा का द्वंद उत्पन्न होता है।

कुछ लोग तो ऐसे होते है। जो जीवन में हमेशा सद्मार्ग का पालन करते हुए जीवन यापन करते है लेकिन उन्हे हमेशा निराशा ही हाथ लगती है। और समय के साथ वो नकारात्मक दुनिया के वश में हो जाते है।

और अपने कर्मों को कोसने लगते है। ऐसा क्यूँ होता है इसके क्या कारण है। यहा हम जानने का प्रयास करते है। भले हम अच्छे कर्मों का अपने जीवन मे पालन करते हो लेकिन हमे अगर निराशा हाथ लगती है।

तो इसके पीछे अवश्य कोई उचित कारण होता है। जिसमे हमारे कर्म भले बुरे ना हो लेकिन हमारे व्यवहार में जीवन शैली की कुछ कमियाँ होती है। जिसे हम समझ नहीं पाते और हमे निराशा का हर समय सामना करना पड़ता है। तो सर्वप्रथम बात करेंगे अपने जीवनशैली की जिसके कारण हमे निराशा हाथ लगती है।


सबके बारे में सोचना

अच्छे कर्म करने वालो का सबसे प्रमुख गुण होता है की वो हमेशा सर्व जन हिताय की बाते करते अहि। और आज के समय में सफलता का निर्माण केवल स्वार्थ के नीव पर होता है। जबकी जिस व्यक्ति के कर्म अच्छे होते है।

वो हमेशा लोगो आ हिट प्रथम स्थान पर होता है। उसमे अपनत्व की भावना बहुत विशाल रूप में होती है। और जिस कारण उसके कर्मो के बाद भी उसे निराशा हाथ लगती है। लेकिन किसी न किसी रूप में हम इसे गलत नहीं कहेंगे।

अच्छे कर्मों का आचरण करने वाले व्यक्ति को कितनी भी निराशा हो रही हो लेकिन नैतिक रूप से वो सफल है कि वो सफलता से विमुख होने के उपरांत भी कहीं न कहीं सद्मार्ग को त्यागता नहीं है।


अपने आदर्शों से समझौता न करना


एक सदचरित व्यक्ति अपने आदर्शों से कभी भी संजहुता नहीं करता है जिसके कारण आज के समाज में उसे असफलता का सामना करना पड़ता है। जबकि आज के समाज में आपके व्यवहार को समय के अनुसार बदलना पड़ता है चाहे वो नैतिक रूप से उचित हो या अनुचित।

लेकिन जो व्यक्ति सद्मार्ग पर चलते हो नैतिकता के मार्ग से विचलित नहीं होता है। उसे भले ही निराशा हाथ लगती हो लेकिन वो कहीं न कहीं अपने आदर्शों के प्रति ईमानदार है। और अंत मे उसे ही असली संतुष्टि का अनुभव होगा जो जीवने मे मिलने वाले निराशा को पूर्ण रूप से समाप्त कर देगा।


अपनी दुनिया का निर्माण कर लेना


अगर सच में बात करे की एक व्यक्ति के आचरण सद्मार्गी होने के बावजूद भी उसे निराशा क्यों मिलती है। तो उसका प्रमुख कारण है उसके द्वारा अपनी एक दुनिया का निर्माण कर लेना।

भले ही व्यक्ति असत्य के साथ नहीं होता भले ही वो अनुचित व्यवहार नहीं करता है। लेकिन जब वो अपनी एक दुनिया का निर्माण कर लेता है तो कहीं न कहीं वो अपने आप को निराशा की ओर अग्रसर करता है।

उदाहरण स्वरूप एक व्यक्ति जो सद्मार्गी है लेकिन उसने ऐसे लोगो को अपना माना है जो उसकी कभी परवाह भी नहीं करते और अपने बारे मे ही सोचते है तो कहीं न कहीं उस व्यक्ति के सद्मार्गी होते हुए भी उसे निराशा हाथ लगेगी जो आज के समय का कटु सत्य है।


अब बात करते है उन बातों की जिसके अनुसार आपके जीवन में भले ही कितनी निराशा क्यों न हो आपको उनका पालन करना चाहिए जो आपके जीवन को सही मार्ग प्रदान करते है। एक बार माता पार्वती ने भगवान शिव से आदर्श जीवन की प्रमुख बातों के बारे में पूछा तो स्वयं आदि देव महादेव ने उन्हे 5 रहस्य बताए जो आदर्श जीवन की ओर हमे ले जाते है।


1. धर्म और अधर्म


शिव ने कहा इस जगत में सबसे बड़ा धर्म सत्य का पालन करना है और सबसे बड़ा अधर्म असत्य का अनुशरण करना है। भले ही जीवन मे कितनी भी निराशा हो लेकिन मनुष्य को सत्य का साथ कभी नहीं छोडना चाहिए और असत्य के साथ से दूर रहना चाहिए।

अगर कोई व्यक्ति सत्य के स्सथ को कभी नहीं छोडता है और असत्य से दूर रहता है तो उसे भले ही प्रारम्भिक जीवन में निराशा मिले। लेकिन आदर्श जीवन के प्रथम सूत्र के अनुशरण करने के कारण स्वयं शिव उसका उत्थान करेंगे। और उसकी निराशा दूर करेंगे।

2. कर्मो का साक्षी


मनुष्य को अपने कर्मों का साक्षी स्वयं होना चाहिए और किसी अन्य साक्षी की आवश्यकता उसे नहीं है। अगर मनुष्य अपने कर्मों का साक्षी स्वयं होगा तो अनुचित कर्मों को करने से अपने आप को बचा पाएगा।

भले ही उसे कोई न देख रहा हो उसे हमेशा याद रखना चाहिए उसके अंदर व्याप्त परम शक्ति उसे देख रही है। और वही उसके अच्छे बुरे का लेखा जोखा रखती है। और उसी के आधार पर उसके जीवन के आदर्श होने या न होने का निर्णय करेगी कोई बाहरी शक्ति या व्यक्ति उसका निर्णय नहीं कर सकती।

इस प्रकार के आचरण के पश्चात मनुष्य एक आदर्श जीवन शैली का अनुसहरण करेगा। और अंत में संतुष्ट जीवन को प्राप्त करेगा।


3. मनसा वाचा कर्मणा


एक मनुष्य को बताए गए सभी पापों से दूर रहना चाहिए मन से वचन से एवं कर्म से किए गए तीनों तरह के पाप एक समान ही अनुचित माने गए है। किसी भी मनुष्य में सर्वप्रथम अनुचित कर्म का विचार ही मन में आता है।

अगर यही पर उसका परित्याग कर दे तो उसके कर्मों मे पापों का कोई स्थान नहीं होगा। प्रायः पाप कि कई परिभाषाएँ बताई गई है लेकिन शिव ने बताया यदि आप के द्वारा किए गए किसी काम से किसी भी व्यक्ति, समूह, समाज को हानि होती है तो वो सबसे बड़े पाप है।


4. आसक्ति ही दुख


निराशा शब्द को विस्तार मे समझने का प्रयास किया जाये तो ये काही न कहीं आशा के रिक्तता को ही प्रदर्शित करता है। कहीं न कहीं आसक्ति किसी व्यक्ति वस्तु के प्रति ही काही न काही हमे निराशा के ओर ले जाती है।

जब आसक्ति के वश में हम आ जाते है तो कहीं न कहीं हम अपना निर्णय स्वयं नहीं ले पाते और जिसके प्रति हमारी आसक्ति होती है उनके द्वारा हमारे निर्णयों का निर्माण होता है। और इसी आसक्ति के कारण हम अपने अच्छे कर्मों से भटक भी सकते है। और आसक्ति के कारण हमे निराशा का सामना करना पड़ता है।


5. तृष्णा दुख का कारण


शिव ने कहा तृष्णा ही हमारे सभी दुखों का प्रमुख कारण है। जब हमारे अंदर इच्छा जो की तृष्णा का ही दूसरा प्रारूप है, आ जाती है तो उनही के बस में आकार हम कहीं न कहीं दुख का अनुभव करने लगते है।

जब इच्छाए पूरी नहीं होती तो हमे निराशा का सामना करना पड़ता है। पर अगर देखा जाये तो निराशा एक रूप से काल्पनिक रूप में है यानि अगर तृष्णा और इच्छाओं का वाश हमारे मन मे नहीं होता तो निराशा का भी कोई स्थान हमारे मन मस्तिष्क में नहीं पाया जाता।


निष्कर्ष


अंत में यही कहा जा सकता है कि जब तक हम इस भौतिक जगत के अनुसार अपने बारे में सोचते रहेंगे तब तक कहीं न कहीं हमे दुख निराशा का सामना करना पड़ेगा। और जब हम अपने कर्मों को धर्म के अनुसार अग्रसारित करेंगे तब हमे इन निराशाओं को दुखों को काल्पनिक ही मानना चाहिए और इनके बारे में न सोचते हुए आदर्श जीवन का यापन ही करना चाहिए।

जिसके साक्षी आप स्वयं हो और किसी भाहरी का आपके कर्मों पर प्रभाव न पड़ता हो। अतः यदि अब भी आपको लगता है की अच्छे कर्मों के होने के बावजूद आपको हमेशा निराशा ही हाथ्न लगती है। तो ये कहना गलत है।

निराशा केवल और केवल आपका भ्रम है। और यही समझिए आप सद्मार्ग का रह चुन चुके है। और भले ही कितनी कठिनाइयाँ इस मार्ग पर हो लेकिन अंत में आपको आनंद और संतुष्टि की प्राप्ति होगी। जो ही आपके जीवन का असली उद्द्येश्य होना चाहिए।

!इति शुभम्!

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