जापानी सभ्यता (Japanese Culture) के अनुरूप बच्चों का विकास-

हर परिवार में बच्चे की शरारतें जितनी लोगो को अच्छी लगती है उसी के साथ समय बीतते बीतते परिवार के लोग इस चिंता मे भी रहते है कि उनकी परवरिश किस प्रकार से करे जिससे उनका बौद्धिक विकास और मानसिक विकास हो सके।

इसी क्रम मे आज हम बात करेंगे जापानी सभ्यता (Japanese Culture) की जिसमे विस्तार से बात करेंगे कि किस प्रकार से जापानी लोग अपने बच्चो की परवरिश करते है।

कुछ प्रमुख Points के आधार पर हम उनकी व्याख्या कर सकते है।

पढ़ने की रुचि-

जापानी सभ्यता में शुरू से ही बच्चों में पढ़ने के प्रति रुचि बढ़ाने का प्रयास किया जाता है। बचपन से ही बच्चो को Comics इत्यादि के जरिये उनमे पढ़ने के प्रति ललक पैदा की जाती है। जैसे जैसे बच्चे बड़े होते जाते है इसी पढ़ाई के क्रम को विकसित करते हुए पाठ्य पुस्तकों के प्रति रुचि पैदा की जाती है।

भले ही जापानी लोग Technology के प्रति बहुत ही रुचि रखते हो लेकिन उनके जीवन मे बचपन से ही पढ़ने के प्रति इतनी रुचि पैदा की जाती है कि वो किसी भी जानकारी हेतु पढ़ाई को महत्व देते है।

स्वावलंबन की भावना-

Japanese Family एवं Society शुरू से ही अपने बच्चो में स्वावलंबन की भावना पैदा करते है। तथा उनके दैनिक जीवन मे स्वावलंबी बनने की भावना विकसित करते है। जिसमे उन्हे अपना काम स्वयं करने हेतु प्रेरित करते है।

उदाहरण स्वरूप Japanese School में वहाँ अपनी क्लास को साफ सुथरा रखने और स्कूल की बगीचे इत्यादि की देखभाल का काम भी स्कूल के विद्यार्थी मिलजुल के करते है। जिससे आगे चलकर वो बच्चे स्वावलंबी बनते है। और अपना काम स्वयं करने हेतु प्रेरित होते है। और किसी प्रकार की निर्भरता से मुक्त रहते है।

ईमानदारी की भावना-

जापानी लोगो मे ईमानदारी की भावना कूट कूट कर भरी होती है। उन्हे शुरू से ऐसी शिक्षा दी जाती है कि वो जीवन पर्यंत अपने कर्तव्यों के प्रति ईमानदार रहते है। अगर कोई बच्चा भी सड़क पर कोई समान, किसी का पर्स इत्यादि गिरा पता है तो वो निकटतम Police Station में उसे जमा करा देता है।

साथ ही साथ वहाँ की पुलिस भी पूरी ईमानदारी से उस व्यक्ति की तलाश करती है जिसका समान गिरा मिलता है। और किसी भी देश को यदि विकसित बनाना है तो उस देश के लोगो के लिए ईमानदारी सबसे महत्वपूर्ण स्थान होता है।

कर्म की प्रधानता-

ये तो जग जाहीर है कि जपपनी लोगो में अपने कार्य के प्रति बहुत ही लगाव है वो कर्म ही पूजा है का असली मतलब तो कोई जापानी लोगो से सीख सकता है। वो अपने कर्म के प्रति इतना निष्ठावान होते है कि वो अपनी छुट्टी इत्यादि भी लेने से कतराते है।

इसी लिए जब जापान मे अपने काम के प्रति तल्लीनता के कारण कुछ शारीरिक और मानसिक विकार उत्पन्न होने लगे तो वहाँ की सरकार को एक कानून लाना पड़ा कि लोगो को कुछ निर्धारित समय के लिए अपने काम से अवकाश अवश्य लेना पड़ेगा।

ऐसा अपने काम के प्रति श्रद्धा शायद ही कही और देखने को मिले। और असली विकास कोई समाज, समुदाय, देश तभी कर सकता है जब वह के नागरिकों में कर्म के प्रति श्रद्धा एवं प्रेम हो।

दिखावे से दूर-

एक मान्यता है यदि आप एक जापानी के घर मे जाएँगे तो वो खाली खाली सा होता है। उन्हे किसी भी प्रकार बिना मतलब के संग्रह करने की आदत नहीं होती है। इसका मतलब ये नहीं कि आवश्यक वस्तुएँ भी उनके घरों में नहीं होती।

लेकिन दिखावे की चीजें जिन्हे ज्यादा आवश्यकता नहीं हूटी उनके संग्रह से वो दूर होते है। पारंपरिक जापानी घरों मे तो Bed रखने की परंपरा नहीं थी। वो सोने, खाने और बैठने इत्यादि के लिए जमीन का ही प्रयोग करते है।

शालीनता-

आज भी जापान में जब वहाँ आप किसी से मिलेंगे तो वो बड़ी शालीनता के साथ आपका आदर सत्कार करते है। हर कोई एक दूसरे को बहुत ही सम्मान देता है। तथा किसी वर्ग इत्यादि मे भेद ना करते हुए हर किसी को बड़े सम्मान के साथ व्यवहार करता है।

चाहे वो Worker हो या फिर कोई Relative हर किसी के साथ बहुत ही शालीनता के साथ व्यवहार किया जाता है। तथा वहाँ हर कोई इस तरह के सम्मान की अपेक्षा रखता है।

सम्पूर्ण देश से अपनापन-

बहुत लोग इसका मतलब देशभक्ति से लगाएंगे लेकिन देश भक्ति और देश के प्रति अपनेपन के लिए मे बारीक सा अंतर है। उदाहरण के रूप में समझाने का प्रयास करते है। प्रथन यदि देश पर कोई आपदा या परेशानी आए तो देश का हर नागरिक सहयोग के लिए आगे आ जाये ये होगी देश भक्ति।

द्वितीय देश बहुत ही समृद्ध है उसमे कोई आपदा इत्यादि का डर नहीं लेकिन दैनिक रूप में देश के बारे में सोचना जैसे हम देखते है लोग रोज अपने घरों की सफाई करते है सफाई से निकले कूदे का निस्तारण अपने घर से निकालकर कहीं भी फेक देना, सार्वजनिक स्थानो की परवाह न करना और वह गंदगी करना ये समझ कर कि ये अपना नहीं।

देश मे Tax की चोरी करना इत्यादि ये लक्षण बताते है कि व्यक्ति में देश के प्रति अपनेपन की कमी है।

निष्कर्ष-

उपरोक्त तथ्यो के आधार पर हम बोल सकते है कि जापान से सीखने को बहुत कुछ है। और वैसे भी बोला गया है कहीं से कुछ अच्छा सीखने को मिले तो उसे ग्रहण कर लेना चाहिए। भारतीय सभ्यता बहुत समृद्ध है लेकिन कहीं न कहीं हम अपनी सभ्यता से विमुख होते जा रहे है।

या फिर उन सभ्यताओं का गलत अर्थ निकालने लगे है या उनमे कमियाँ ढूँढने लगे है। और इसी लिए ये लेख हमारे लिए महत्वपूर्ण बन जाता है। जिस प्रकार के अनुचरण का हम त्याग कर रहे है। उस प्रकार के अनुचरण आज भी जापानी लोग कर रहे है और उसके प्रति गर्व भी महसूस कर रहे है।

और हम ये भी नहीं कर सकते की उनके पास किसी प्रकार की कमी हो। उनकी टेक्नालजी, उनका शिक्षा पद्धति हर क्षेत्र मे वो निपुण है। और एक विकसित देश है। यानि हम कह सकते है हमारी भारतीय संस्कृति भी इसी प्रकार के जीवन अनुशरण करते थे।

लेकिन आधुनिकता के झूठे आवरण के कारण हम उन्हे भूल रहे है। जो कहीं न कहीं हमारे सम्पूर्ण विकास में बढ़ा बनती जा रही है। और जापानी सभ्यता हमे पुनः उसे ग्रहण करने के लिए प्रेरित करती है।

||इति शुभम्य||

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