जनसंख्या नियंत्रण कानून और आज की जीवन शैली- देर कर दी हुजूर आते आते

jansankhya niyantran- Kissa Kahani

अभी कुछ दिनों से जनसंख्या नियंत्रण कानून पर चर्चा चल रही है, उत्तर प्रदेश राज्य ने इस कानून को लागू भी कर दिया वहीं भारत सरकार भी इस कानून को अमली जामा फहनाने की प्रक्रिया कर रही है। इसके अंतर्गत 2 से अधिक बच्चे होने की सूरत मे कई प्रमुख सरकारी योजनाओं का लाभ उनको नहीं दिया जाएगा। लेकिन प्रश्न उठता है क्या देर नहीं हो गई आज की जीवन शैली मे इसका कुछ अहमियत है भी या नहीं।

आज कल के समय मे हमारी जीवन शैली बहुत ही अधिक बदल चुकी है एकाकी जीवन के प्रति लोगो का झुकाव बढ़ने लगा है। अब परिवार की परिभाषा भी बदल कर रह गई है।

जहां एक तरह पहले के समय मे एक ही परिवार मे बहुत सारे लोग एक बड़ा परिवार रहता था वही आज पति पत्नी और उनके एक दो बच्चे ही साथ रह रहे है। जनसंख्या नियंत्रण कानून की बात जब भी आती है तो हम चीन का नाम जरूर लेते है जहां एक बच्चे का नियम लागू था लेकिन आज उन्होने भी इस कानून को समाप्त कर दिया है।

समाज मे हो रहे बदलाव को देखे तो हम पाएंगे अब रिश्ते उतने मजबूत नहीं रह गया है लोग अकेले रहना पसंद कर रहे है। live in जैसे परंपरा की ओर लोगों का लगाव बढ़ रहा है। शादी जैसे परंपरा का निर्वाहना अभी भी लोग कर रहे है लेकिन लोगो के मध्य ये बड़े बड़े celebrity इत्यादि के असमय अलग हो जाने की खबरों ने लोगो के मन पर भी असर डालना शुरू कर दिया है, अगर नहीं तो आने वाले समय मे ये असर होना शुरू हो जाएगा।

Privacy नाम का शब्द लोगो पर इतना हावी होने लगा है कि अब पति पत्नी के रिश्ते मे भी मनमुटाव आने लगा है। और जहां तक देखा जाये शिक्षित समाज मे अब दो क्या एक बच्चे को ही महत्व देते है।

ऐसा कहना गलत नहीं होगा की आने वाले समय मे लोग Live In मे रहेंगे और परिवार के नवसृजन को फिजूल मानेंगे हम जितनी प्रगति कर रहे है उस प्रकर हमारे विचार भी बदलते जा रहे है और Modern बनाने के चक्कर मे विवाह और परिवार नियोजन जैसी प्रमुख संस्थाओं को भी गलत साबित करने लगे है।

जीवन मे नए और पुराने दोनों ही स्वरूपों के लेकर चलने की आवश्यकता है। दोनों की अच्छाइयों को ग्रहण करने और बुराइयों का त्याग करने से ही एक अच्छे और सुंदर समाज का निर्माण होगा।

लोगो को खुले विचार का होना आवश्यक है पुरुष महिला दोनों का समाज और परिवार मे बराबरी की भागेदारी भी होनी चाहिए लेकिन इस खुले विचार के चक्कर मे अपनी परंपरा और प्राचीन नीतियों को पूरी तरह गलत साबित कर देना सही नहीं है।

लोग अब बच्चे पैदा करने से पहले उनकी परवरिश इत्यादि के बारे मे सोचते है। अगर जनसंख्या नियंत्रण कानून की आवश्यकता है कुछ तबके है उनके लिए ही जरूरी है लेकिन उनके विचारों को बदले बगैर इस कानून के जरिये भी कोई बदलाव नहीं आ सकता है।

हमे उन लोगो को शिक्षित करने की आवश्यकता है जो एक लड़के के चक्कर मे ज्यादा बच्चे पैदा करते है। हमारे देश मे पढे लिखे और शिक्षित लोगो भी इस तरह का सोच रखते है। और कुछ अशिक्षित लोग भी है जो ये मानते है कि जीतने बच्चे है उतने बड़े होकर गहर मे कमा कर लाएँगे।

तो अगर इन सब बातों का आकलन करे तो हमारे समाज मे अशिक्षा ही जनसख्या विस्फोट के लिए जिम्मेदार है यहाँ हम उनकी भी बात कर रहे है जिनके पास बड़ी बड़ी डिग्रियाँ तो है लेकिन सोच विकसित नहीं हो पायी है।

हमारे देश मे जहां एक तरफ लोग जनसंख्या नियंत्रण की बात आती है वहीं हमारे देश के जन प्रतिनिधि वोट बैंक को मजबूत करने के चक्कर मे कई बच्चे पैदा करने की बाते करते है तो उन्हे भी अपने विचार बदलने की आवश्यकता है।

केवल सरकारी योजनाओं से वंचित करने मात्र से इस योजना मे सफल होना बहुत ही कठिन कार्य है। हमारे उससे ऊपर उठकर लोगो को जागरूक करने की आवश्यकता है। उन्हे बेटा बेटी मे अंतर रखने के विचार को खत्म करने की आवश्यकता है। जो विवाह, परिवार नियोजन जैसी प्राचीन संस्थाएं है उन्हे भी सम्पूर्ण सम्मान देने की आवश्यकता है।

तो अगर इस कानून को सफल बनाना है या फिर इसके उद्देश्य को पूरा करना है। तो हमे कई स्वरूपों मे परिवर्तन करने की आवश्यकता है। और ये सार्थक तभी माना जाएगा जब हमारे देश मे भी चीन जैसी चिंता न उत्पन्न न हो जहां आज एकाकी जीवन को वहाँ के युवा ज्यादा महत्व देते हैं।

!!इति शुभम्य!!

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