इस जन्माष्टमी सीखे श्री कृष्ण के लीलाओं मे छिपे जीवन रहस्य- जन्माष्टमी 2020

janmashtami 2020

प्रत्येक वर्ष के भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को जन्माष्टमी पर्व के रूप मे बड़े ही हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। इस वर्ष भी 11 और 12 अगस्त 2020 को जन्माष्टमी 2020 के पर्व को मनाया जाएगा। हर वर्ष हम इसके बारे मे बहुत सारे लेख पढ़ते है और लगभग सभी लेखो में बताया जाता है जन्माष्टमी का व्रत कैसे किया जाये। कैसे श्री कृष्ण की पूजा की जाये जिससे घर में सुख समृद्धि आए इत्यादि इत्यादि। लेकिन क्या इसी लिए हम जन्माष्टमी का त्योहार मानते है। या व्रत इत्यादि रखते है। तो आज हम इस लेख मे जानने का प्रयास करेंगे क्यों हम जन्माष्टमी मानते है। तथा इसका उद्द्येश्य क्या है।

जन्माष्टमी पर्व का सही अर्थ- पूरे वर्ष बहुत सारे लोगो के जन्मदिन आते है लेकिन क्या कभी सोचा कि हम कुछ खास महापुरुषों और देवी देवताओं का जन्मदिवस क्यों मानते है। उसी प्रकार क्या हमने कभी सोचा कि हम जन्माष्टमी का त्योहार क्यों मानते है। हमे मालूम है कि आप सभी लोग बोलेंगे कि इस दिन प्रभु श्री कृष्ण का जन्म हुआ था। लेकिन केवल जन्म होने मात्र से नहीं बल्कि उनके जीवन से हमे बहुत कुछ सीखने को मिलता है। उनके जरिये हम जीवन आदर्शों को समझते है। उन्होने हमे हमारे जीवन का सही उद्द्येश्य बताया इसीलिए उनके जन्मदिवस को हम त्योहार के रूप मे मानते है। एक बार के लिए हम किसी नास्तिक व्यक्ति की भी बात करे या फिर किसी विज्ञानवादी पुरुष की लेकिन जीवन का सही अर्थ दर्शाने वाले पुरुष को सभी सम्मान के साथ मानेंगे। और श्री कृष्ण का जीवन लीला इसका जीता जागता उदाहरण है।

जन्माष्टमी पर्व का सही उद्द्येश्य- किसी भी धार्मिक पर्व या त्योहार को हम केवल कुछ व्रत या नियम के आधार पर पालन करते हुए मानते है। लेकिन क्या हमारा उद्द्येश्य उस पर्व को व्रत करते हुए और केवल उत्साह मानते हुए बिताना मात्र है। तो उत्तर होगा नहीं किसी भी व्रत त्योहार मे बहुत सारी अच्छी बाते निहित होती है। उनका कुछ उद्द्येश्य होता है जिनका अपने जीवन मे अनुशरण करना ही उस त्योहार का सही रूप मे मनाना माना जा सकता है। उसी प्रकार जन्माष्टमी पर्व का सही उद्द्येश्य श्री कृष्ण की जीवन लीला से कुछ  सीखना और अपने जीवन मे उसका अनुशरण करना ही हमारा उद्द्येश्य होना चाहिए। तो आइये हम बात करते है कुछ खास गुणो की जो कृष्ण की जीवन लीला से हमे सीखने को मिलती है।

शांत स्वभाव- श्री कृष्ण का जेवण लीला जब हम देखते है तो उनके जन्म लेने के साथ ही बहुत सारी विपदाएं आयी। चाहे कारागार से निकलकर उफान भर्ती हुई यमुना नदी को पार करने को या फिर पूरे बाल्य काल मे विभिन्न असुरों का सामना करने से हो कहीं भी हमे श्री कृष्ण के स्वभाव मे कोई विचलन देखने को नहीं मिलता है। उनका शांत स्वभाव और मुसकुराता चेहरा ही सभी जगह वर्णित दिखाया जाता है। पूतना का संहार हो। कालिया नाग से संघर्ष हर जगह श्री कृष्ण का शांत और मुसकुराता चेहरा उनके मनोभाव मे देखने को मिला है।

साधारण जीवन- श्री कृष्ण वृष्णि राजवंश के राजा वासुदेव के पुत्र थे और उनका पालन पोषण यदुवंशी राजा नन्द के द्वारा हुआ। सारी सुख सुविधाए होने के बावजूद। श्री कृष्ण ने हमेशा साधारण जीवन जीने को महत्व दिया। वृन्दावन गाँव के ग्वाल बाल के साथ खेलकुद करते हुए उनकी बाल लीलाएं प्रसिद्ध है। उनही ग्वाल बाल के साथ रोज गायें चरने जाना उनके साथ एक साधारण मनुष्य के अनुरूप ही जीवन व्यतीत किया कहीं भी उन्होने अपने धन वैभव का दिखावा नहीं किया और साधारण जीवन को सही जीवन जीने के रूप मे प्रदर्शित किया।

जन कल्याण की भावना- श्री कृष्ण ने हमेशा जन कल्याण की भावना को ध्यान मे रखकर जीवन जीने की काला सिखायी है। जब भी वृन्दावन के निवासियों को कोई भी परेशानी आई उन्होने उनका साथ दिया और उनकी परेशानियों का हरण भी किया। उदाहरण के तौर पर जब इंद्र देव के नाराजगी पर वृन्दावन मे मूसलाधार बारिस रूकने का नाम नहीं ले रही थी। तो श्री कृष्ण ने गोवर्धन पर्वत को अपनी उंगली पर उठाकर समस्त ग्राम वासियों को शरण प्रदान की और इन्द्र देव के अहंकार को समाप्त किया।

सम्बन्धों को महत्व- श्री कृष्ण से सदैव सम्बन्धों को पूर्ण महत्व दिया उन्होने किसी प्रकार का अहम न रखते हुए अपने संबंधो को सही रूप मे महत्व दिया। गरीब सुदामा की मित्रता को कभी नहीं भुलावा भले ही वो द्वारका नागरी के राजा के रूप मे थे लेकिन सुदामा की सहायता एक मित्र के रूप मे किया। तीनों लोको को केवल तीन मुट्ठी चावल के बदले मे दे दिया। ऐसे संबंधो को निभाने का गुण हम श्री कृष्ण के जीवन लीला से सीखने को मिलती है।

सबको अपना माना- प्रसंग है कि एक समय नरकासुर नमक राक्षस का प्रकोप बहुत ही अधिक था और देव लोक के सभी देवी देवता ने उससे अपनी रक्षा की मांग की। जिसके फलस्वरूप श्री कृष्ण ने अपनी पत्नी सत्यभामा के सहयोग से नरकासुर का वध किया और उसके कैद मे रह रही 16000 कन्याओं को छुड़ाया और जब उन्होने श्री कृष्ण से शरण की मांग की क्योंकि समाज उनका बहिष्कार कर सकता था तो स्वयं श्री कृष्ण ने उन्हे अपना शरण प्रदान किया और उन्हे अपनी पटरानी घोषित किया। इस प्रकार से श्री कृष्ण ने सभी को अपना मानते हुए उनका उद्धार किया।

ज्ञान का भंडार- कहते है आज तक जीतने भी अवतार हुए उनमे से केवल श्री कृष्ण ने ही 16 विद्याएँ ग्रहण की थी। साथ ही गीता का उपदेश सम्पूर्ण जीवन का मार्गदर्शन करती है। और गीता का उपदेश स्वयं श्री कृष्ण ने अपने श्री मुख से प्रदान की थी। और उनके उपदेश मे इतना ज्ञान भंडार है जो हमारे जीवन के सभी पल मे हमे सही मार्गदर्शन करती है। जो आज के वर्तमान समय मे भी हमारे लिए उपयोगी है। गीता के द्वारा हम रोज कुछ न कुछ सीख सकते है। और अपने जीवन के स्वरूप को सही मार्ग पर ले जा सकते है।

निष्कर्ष

हम हर वर्ष जन्माष्टमी का पर्व मानते है। और लगभग हर वर्ष इनकी तिथियों मे मतभेद रहता है। लेकिन इस वर्ष हम प्रयास करे कि इन तिथियों के भ्रम मे न रहते हुए। केवल सच्चे मन से श्री कृष्ण की आराधना करे और व्रत के रूप मे श्री कृष्ण के जीवन आदर्शों और इनके ज्ञान भंडार को अपने जीवन मे धरण करने का प्रयास करें। सभी इच्छों का त्याग करते हुए एक आदर्शवादी जीवन का अनुशरण करने का व्रत का पालन करे।

||इति शुभम्य||

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