आदर्श विद्यार्थी के गुण- कैसे बने Ideal Student

आदर्श विद्यार्थी

आदर्श विद्यार्थी के गुण- विद्यार्थी जीवन बहुत ही संघर्षपूर्ण जीवन होता है और इस संघर्ष रूपी जीवन का सही परिणाम मिलने पर हमे एक खुशहाल जीवन का उफार मिलता है। आज के समय मे विद्यार्थी जीवन की परिभाषा बहुत बदल चुकी है।

लेकिन पारंपरिक गुरुकुल प्रणाली के अनुसार एक विद्यार्थी को बहुत सारे नियमों और कायदों के अनुसार अपना जीवन व्यतीत करना होता था। आज हम बात करेंगे उन कुछ गुणों की जो एक विद्यार्थी को आदर्श विद्यार्थी के श्रेणी प्रदान करता है।

तथा इन गुणों से परिपूर्ण व्यक्ति अपने जीवन मे सफल अवश्य होता है। बात चाहे प्राचीन काल की हो या फिर आज के आधुनिक दौर की इन गुणों के आधार पर जीवन जीने वाला विद्यार्थी अवश्य ही सफल होता है।

सत्येन ब्रह्मचर्येण व्यायामेनाथ विद्यया।

देशभक्त्याऽत्यागेन सम्मानर्ह: सदाभव।।

उपरोक्त पंक्तियाँ महान व्यक्तित्व महामना मदन मोहन मालवीय जी हमेशा काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के छात्रो को हमेशा बोला करते थे। उनके अनुसार एक विद्यार्थी को इन गुणों को अपने अंदर समाहित कर लेना चाहिए तभी वो समाज के लिए योग्य बन सकते है।

जिस प्रकार समाज आपको कुछ न कुछ प्रदान करता है। उसी प्रकार आपका भी यही उद्द्येश्य होना चाहिए कि आप भी समाज को कुछ न कुच्छ बदले मे अवश्य दें। अब उपरोक्त पंक्तियों को विस्तार से जानने का प्रयास करना चाहिए कि इसके अनुसार एक विद्यार्थी मे क्या क्या गुण होना आवश्यक है।

सत्य-

एक विद्यार्थी मे सबसे पहला और अति आवश्यक गुण होना चाहिए कि वो सत्य का अनुशरण करे। सत्य को केवल बोलने या समझने के रूप मे ही नहीं लेना चाहिए बल्कि सत्य का मूल अर्थ है ज्ञान।

ज्ञान उसे ही कह सकते है जो कि सत्य हो और असत्य को हम ज्ञान के रूप मे नहीं मान सकते अतः यदि हम सत्य का अनुशरण करेंगे तो हमारे अंदर ज्ञान प्राप्ति की पिपाशा बनी रहेगी। सत्य ही हमे उचित और अनुचित का भी साक्षात्कार कराएगी। अतः सत्य रूपी गुण एक विद्यार्थी मे अवश्य होना चाहिए।

ब्रह्मचर्य-

प्राचीन काल के गुरुकुल परंपरा के अनुसार हम विद्याध्ययन के समय ब्रह्मचर्य का पालन अवश्य करते थे। साथ ही साथ आश्रम व्यवस्था के अनुसार एक व्यक्ति को अपने जीवन के शुरुवाती 25 वर्ष ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए व्यतीत करना चाहिए।

आज के आधुनिक दौर मे इसका पालन न के बराबर होता है। और इसके परिणाम स्वरूप हम आज कल के विद्यार्थियों मे कुंठा, निराशा इत्यादि कुवृत्ति देखने को मिलती है। एक विद्यार्थी का जीवन मे संयमित होना बहुत आवश्यक है तभी वह एकाग्रता ग्रहण कर सकता है। इसीलिए ब्रह्मचर्य एक विद्यार्थी के लिए अति आवश्यक गुण है।

व्यायाम-

कहते है न एक स्वस्थ तन और स्वस्थ मन से परिपूर्ण इंसान जीवन मे कुछ भी प्राप्त कर सकता है। स्वस्थ मन पर तो आपके विचारों का प्रभाव होता है लेकिन स्वस्थ तन के लिए आपको शारीरिक श्रम की आवश्यकता होती है।

और इसी क्रम मे एक विद्यार्थी को जीवन मे सफल होने के लिए भी स्वस्थ तन की आवश्यकता होती है। और व्यायाम से अच्छा उपाय कुछ भी नहीं अपने तन को स्वस्थ रखने के लिए।

व्यायाम हमे स्वस्थ रखने के साथ साथ प्रतिदिन एक नई ऊर्जा प्रदान करता है। अतः एक विद्यार्थी को अपने जीवन मे प्रतिदिन व्यायाम को अंगीकृत कर लेना चाहिए।

विद्या-

इस गुण के बगैर एक व्यक्ति को तो विद्यार्थी कहा भी नहीं जा सकता है। लेकिन यहाँ विद्या के गुण से तात्पर्य केवल साक्षर होने मात्र से नहीं बल्कि यहाँ बात शिक्षित होने की काही जा रही है।

एक विद्यार्थी को केवल अपने विषयों मे पारंगत नहीं होना चाहिए बल्कि उसे उनको समझने, समाज और संस्कृति को समझने का भी प्रयास करते रहना चाहिए विद्याध्ययन की कोई समय सीमा नहीं हो सकती है।

बल्कि इसे निर्बाध गति से हमेशा ग्रहण करते रहना चाहिये। विद्याध्यायन एक विद्यार्थी का मूल लक्ष्य होना चाहिए तथा विद्या अध्ययन की प्रक्रिया सीमित रूप मे न होकर असीमित रूप मे होनी चाहिए।

देशभक्ति-

देश भक्ति का तात्पर्य है आप जिस समाज जिस राज्य जिस समुदाय के निवासी है उसके प्रति आपको श्रद्धा होनी चाहिए साथ ही साथ उसके हितों की रक्षा करना आपका कर्तव्य होना चाहिए हर मनुष्य किसी न किसी समाज से जुड़ा हुआ है।

और उस समाज के बिना उसका कोई भी अस्तित्व नहीं है। अतः यदि विद्यार्थी मे देश भक्ति की भावना का अभाव होगा तो तो वो अपने देश राज्य के हितों की चिंता नहीं करेगा जो कहीं न कहीं उस समाज का पतन कर देगी।

बगैर उस समाज के उस विद्यार्थी का भी कोई मूल्य या अस्तित्व नहीं। जब हम अपने अमज अपने राज्य और देश के बारे मे सोचेंगे उसके प्रति निष्ठावान बनेंगे तभी अपना भी विकास कर सकते है।

आत्मत्याग-

किसी भी व्यक्ति मे यदि त्याग की भावना विद्यमान है तो उसे उसके समाज मे श्रेष्ठ जन की श्रेणी मे रखा जाता है। उसी प्रकार एक विद्यार्थी मे अगर आत्मत्याग की भावना है तो उसे आदर्श विद्यार्थी के रूम मे देखना अतिशयोक्ति नहीं होगा।

त्याग की भावना का मूल अर्थ ही यही है कि अमुक व्यक्ति सर्व जन के हितों की बात करता है। उसमे स्वार्थ, ईर्ष्या जैसे कुवृत्ति का त्याग कर दिया है। त्याग की भावना जोड़ने का काम करती है।

त्याग की भावना से व्यक्ति का मन मस्तिष्क विस्तारित रूप मे सोचता है। उसका विवेक बहुत ही ज्यादा बढ़ जाता है। अतः एक विद्यार्थी मे यदि आत्मत्याग की भावना विद्यमान है तो उसे आदर्श विद्यार्थी के रूम मे जाना जा सकता है।

निष्कर्ष- 

उपरोक्त श्लोक के जरिये हमने जानने का प्रयास किया कि एक आदर्श विद्यार्थी के कौन कौन से गुण होते है। ये 6 गुण केवल विद्यार्थी के जीवन के लिए ही नहीं बल्कि हर मनुष्य के लिए आवश्यक।

हम ये भी कह सकते है कि ये गुण तो प्राचीन काल मे गुरुकुल परंपरा से संबन्धित है लेकिन ये नहीं भूलना चाहिए कि मालवीय जी ने इन गुणो के अनुशरण की बात उन विद्यार्थियों के लिए की जो काशी हिन्दू विश्वविद्यालय मे अध्ययनरत थे।

इन सामान्य गुणो से परिपूर्ण विद्यार्थी जीवन के सभी राह मे सफल अवश्य होता है। इसके अलावा हम दूसरे लेख के जरिये विद्यार्थी के उन लक्षणों की बात करेंगे जिसका वर्णन प्राचीन काल से होता आया है। और जो लक्षण हर विद्यार्थी मे सफल होने के लिए होना अति आवश्यक है।

||इति शुभम्य||

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