पति पत्नी: माधुर्य से भरा एक अटूट संबंध

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पति पत्नी के संबंध को किसी पंक्ति में सीमित नहीं किया जा सकता है। यह एक विस्तार के साथ समझा जाने वाला तथ्य है। मनुष्य के जीवन में और सभी संबंध किसी न किसी रूप में उसे बाध्य रूप में धारण करने होते है। लेकिन पति पत्नी का संबंध ही एक अकेला संबंध है जिसे हम एक रूप में स्वयं स्वीकारते हैं। अगर हिन्दू संस्कृति की बात करें तो हम प्रतिज्ञाबद्ध होकर इस संबंध को स्वीकारते है और अगले सदस्य को अपने जीवन में प्रवेश करने की अनुमति देते है।

दूसरा सदस्य केवल हामरे जीवन में प्रवेश ही नहीं करता बल्कि जितना अधिकार आपका अपना अपने जीवन पर होता है उतना ही अधिकार आपके जीवन साथी का भी होता है। इसीलिए इस संबंध को एक अटूट संबंध के रूप में व्याख्यायित करते हैं। तो आइये अनुभव करते है इस अटूट बंधन के सभी पक्षों का।

पति पत्नी के संबंध का ऐतिहासिक और वर्तमान परिदृश्य

देखा जाये तो पति पत्नी के संबंध का ऐतिहासिक रूप एवं वर्तमान रूप में कोई ज्यादा परिवर्तन नहीं आया है। सच बोला जाये तो जो भी परिवर्तन देखने को मिलता है। वो केवल हमारे जीवन शैली में बदलाव एवं हमारे सामाजिक परिदृश्य में हुए बदलाओं के कारण है। पूर्व समय में भी पति पत्नी का रिश्ता दो लोगो के मिलन और समाज में नव जीवन सृजन के रूप में देखा जाता था जिसे हमारा समाज विवाह के रूप में मान्यता प्रदान करता था। आज भी लगभग इसी क्रम में पति पत्नी के रिश्तों को एक सामाजिक मान्यता प्रदान की जाती है।

पहले भी पति पत्नी को एक दूसरे का पूरक माना जाता था जो कि एक नए परिवार का निर्माण करेंगे। और आज भी यही मान्यता हमारे समाज में मानक रूप में प्रचलित है। किसी एक के बगैर इस रिश्ते की न तो कोई मान्यता है और न ही उनका उद्द्येश्य पूरा होता है। लेकिन आज के परिवेश में इन रिश्तो में कड़वाहट और (रिक्तता) खालीपन की बहुत ज्यादा देखने को मिलता है। जो की पूर्व समय में देखने को नहीं मिलता था। सिर्फ यही एक कारण आज के और पुरा काल के पति पत्नी के संबंध में अंतर प्रदर्शित करता है।

पति पत्नी के संबंध को ऊर्जावान और मधुर बनाए रखने के मानक

ऐसा नहीं है कि पति पत्नी के संबंध में जो कड़वाहट और ऊर्जा की कमी या रिक्तता देखी जाती है उसे खत्म नहीं किया जा सकता। बल्कि सिर्फ कुछ मानकों का पालन करके ही हम उसे पुनः ऊर्जावान और मधुर बना सकते है। हम केवल उनही मानकों का पालन करेंगे जो पति पत्नी दोनों के लिए सुलभ और दोनों के द्वारा ग्रहण करने योग्य हो। अगर हम किसी उपाय कि बात करना चाहते है तो सर्वप्रथम हमे किसी का पक्षपात से दूर रहना पड़ेगा तभी हम सही उपाय को ढूंढ पाएंगे। यहा भी हम मानकों को स्थापित करते समय किसी प्रकार से पक्षपात से दूर रहने का पूरा प्रयास करेंगे। तो आइये आगे बढ़ते हैं।

व्यस्त जीवन की अवहेलना एक मिथ्या- जब बात पति पत्नी के रिश्तो में कड़वाहट या किसी खालीपन की जगह होती है तो प्रायः लोग प्रथम कारण व्यस्त जीवन को ही बोलते है। तो इस मिथ्या को स्पष्ट करना चाहूँगा कि आज के समय में जो विशेष समय हम अपने जीवन साथी के साथ बिता सकते है। वो समय पुराने समय में लोगो को नहीं मिलता था घर में भी पुरुषों का स्थान अलग होता था। और दिन भर पुरुष बाहर के कामों में व्यस्त रहते थे और केवल भोजन और शयन के समय ही घर के अंदर प्रवेश करते थे। उन्हे एक संयुक्त परिवार में रहना होता था। अतः एक दूसरे के लिए खाली समय निकालना लगभग नामुमकिन होता था।

तो अगर हम कहे की आज के समय में हमे समय के अभाव में निकटता नहीं बन पाती तो इसे काल्पनिक कारण के रूप में ही माना जाएगा। दो लोगो के मध्य अगर प्रेम हो तो किसी व्यस्तता का कोई भी मतलब नहीं है। बस जरूरत है एक दूसरे की आवश्यकता महसूस होने की। और खुद बख़ुद व्यस्त जीवन में भी उनके लिए समय निकल जाएगा।

त्याग नहीं सहयोग की भावना रखे- पति पत्नी के रिश्ते में कड़वाहट का प्रमुख कारणों में से एक यह है कि जब भी हम कुछ भी अपने जीवन साथी की खुशी के लिए करते है तो उसे हम अपना त्याग समझते है। और यही से दोनों के मध्य कड़वाहट उत्पन्न होती है। हमे ऐसा कभी नहीं मानना चाहिए कि हमने अपने जीवन साथी के लिए कोई त्याग किया। बल्कि एक दूसरे के साथ सहयोग की भावना के साथ जीवन यापन करना चाहिए।

अगर दोनों में से कोई एक दूसरे से कोई इच्छा रखता है और यदि वो तर्कसंगत है तो सहयोग की भावना के साथ उसका अनुशरण करना चाहिए। जब तक हमें लगेगा की कोई कार्य हमने सहयोग की भावना से नहीं बल्कि त्याग के रूप में किया है। तब तक पति पत्नी के रिश्तों में मधुरता नहीं आ सकती।

नवसृजन के भागीदार बने- वो चाहे पति हो या पत्नी उन्हे ये मानना पड़ेगा कि उन्होने एक दूसरे का साथ नवसृजन हेतु अपनाया है। पति पत्नी दोनों को पूरे हर्ष के साथ नवसृजन का भागीदार बनना अति आवश्यक है। भारतीय संस्कृति के परिपेक्ष्य में देखा जाये तो विवाह का मूल तात्पर्य उस बंधन से है जिसमें दो जन एक दूसरे के साथ नवीन रिश्ते में प्रतिज्ञाबद्ध होकर जुडते है। जिसका अर्थ है कि वो अपनी एक नई दुनिया का निर्माण करेंगे और एक दूसरे के सहयोग के साथ नवसृजन में भागीदार बनेंगे। और नए आनंदित जीवन की ओर अग्रसर होंगे।

जब तक दोनों एक दूसरे को सम्पूर्ण रूप से अपनाएँगे नहीं तब तक किसी भी प्रकार का उपाय इनके बीच सामंजस्य स्थापित नहीं कर सकता जाहे हम जितना प्रयास करें। चूंकि दोनों पूर्व के जीवन से अलग अपनी एक दुनिया का निर्माण कर रहे है तो इस निर्माण का सबसे प्रमुख स्तम्भ एक दूसरे को अपनाना और अन्य प्रभावों से इतर सामंजस्य स्थापित करते हुए नवसृजन की ओर अग्रसर होना है। तभी हम एक मधुर और ऊर्जावान दाम्पत्य जीवन का अनुभव कर सकते हैं।

खुशी नहीं आनंद की खोज करें- दाम्पत्य जीवन का प्रमुख उद्द्येश्य पति पत्नी दोनों को एक साथ मिलकर उस आनंद की खोज करनी होती है न की खुशियों की। अब अगर बात की जाये खुशी और आनंद में अंतर की तो खुशी क्षणिक होता है एवं आनंद चिरकाल तक व्याप्त रहती है, आनंद अलौकिक होता है और खुशी भौतिक। हमे उन बातों का ध्यान देना होता है, जिन बातों के अनुशरण से हमे हमारे दांपत्य जीवन में संतुष्टि की प्राप्ति हो।

उदाहरण स्वरूप देखे तो प्रायः पति पत्नी दोनों एक दूसरे की तुलना किसी तीसरे से करते है जिसका परिणाम ऐसा होता है कि जिसकी तुलना की गई वो किसी न किसी रूप में कुंठा का शिकार हो जाता है और दोनों के मध्य कड़वाहट की शुरूआत होती है। अतः दूसरों को देखकर यदि हम तुलना करते रहेंगे तो हमारे जीवन में संतुष्टि बिलकुल भी नहीं रहेगी और उस आनंदमय जीवन से हम वंचित रहेंगे।

निष्कर्ष

पति पत्नी के संबंधो में मधुरता और ऊर्जा को बनाए रखने हेतु विषय पर हम किसी उचित निष्कर्ष पर नहीं जा सकते। इसका निष्कर्ष केवल और केवल उन दोनों के मध्य सामंजस्य से ही खोजा जा सकता। आज की जीवन शैली लोगों की प्राथमिकताएं किसी न किसी रूप में हमे प्रभावित करती हमे। सर्वप्रथम दोनों के मध्य प्रेम सद्भाव कि भावना होना आवश्यक है। उन्हे समझना होगा कि एक दूसरे के बगैर वो दोनों रिक्त हैं।

किसी प्रकार की कड़वाहट को बिलकुल भी जगह नहीं देनी चाहिए। और इसके लिए सबसे महत्वपूर्ण तत्व है एक दूसरे को अपनाने की। लेकिन आज के समय में लोगो के मध्य अपने जीवन में जिस प्रकार निजता की मांग है उसको देखते हुए हम कह सकते है कि कोई भी अपने जीवन में किसी के प्रवेश को वर्जित करते है। और मानसिक रूप से एक दूसरे को अपनाने से दूर भागते है। उपरोक्त उपायों के अतिरिक्त बहुत सारे उपाय आपको मिल जाएँगे लेकिन जब तक पति पत्नी एक दूसरे को अपने जीवन में अंगीकृत नहीं करेंगे, जब तक नए जीवन को धारण नहीं करेंगे तथा अपने दाम्पत्य जीवन में संतुष्टि की भावना नहीं रखेंगे तब तक आज के आपा धापी भरे जीवन में अपने रिश्तों में मधुरता और ऊर्जा स्थापित नहीं कर पाएंगे। बस दुनिया की नजर में केवल पति पत्नी ही बन कर रह जाएँगे जीवन साथी नहीं।

!इति शुभम्!

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