मानव और अन्य जीवों में भिन्नता तथा उनके गुण दोष

मानव और अन्य जीवों में भिन्नता तथा उनके गुण दोष- हमारे पृथ्वी पर जीवों को कई श्रेणियों में विभक्त किया गया है। जो जीवाणु, कीटाणु से लेकर अन्य पशु पक्षी और मनुष्य जैसे श्रेणियों में बंटे हुए है। लेकिन अगर देखा जाये तो मनुष्य इन सभी जीवों से बहुत ही भिन्न और अलग जीवन शैली का जीने वाला प्राणी है। मनुष्य में ऐसे कई गुण दोष होते है जो केवल मनुष्य में ही पाया जाता है। अन्य जीव जिस प्रकार प्रकृति के नियमों के अनुसार ही जीवन यापन करते है वही मनुष्य अपने नियम स्वयं बनाता है। तथा अपने विधि विधानों का निर्माण भी स्वयं ही करता है। तो हम इस लेख के द्वारा हम जानने का प्रयास करेंगे कि किस प्रकार मनुष्य का स्वभाव और प्रकृति अन्य जीवों से भिन्न है।

विवेकशील और चिंतनशील (बुद्धिमता)- मानव ही एक ऐसा प्राणी है जिसमे तर्क, सोचने, और समझने की शक्ति होती है। मनुष्य अपने विवेकशील और चिंतनशील स्वभाव के कारण ही प्रकृति द्वारा निर्मित शाश्वत नियमो के अनुसार नहीं बल्कि अपने बनाए नीति और विधानों के अनुसार जीवन यापन करता है। मनुष्य मे तर्क शक्ति ही उसे अच्छे बुरे में अंतर का ज्ञान प्रदान करती है। तर्क शक्ति और चिंतनशील होने के कारण ही मनुष्य अपने जीवन शैली में परिवर्तन करता रहता है। लेकिन जब मनुष्य इस बुद्धिमता का दुरुप्रयोग करता है तो वह अपने को और समाज को विनाश की ओर ले जाता है।

शाश्वत प्रकृति का न होना- मनुष्य हर देश काल परिस्थिति के अनुसार जिस प्रकार भिन्न भिन्न प्रकार की जीवनशैली जीता है उससे सिद्ध होता है मानव की प्रकृति सम्पूर्ण पृथ्वी पर एक समान नहीं रहती है। जिस प्रकार एक पशु जैसे सिंह चाहे भारत के जंगलों में निवास करता हो या फिर अफ्रीका के जंगलों में उसकी प्रकृति और जीवन शैली हमेशा एक समान रहती है। जबकि उसके इतर मनुष्य अपने स्थानीय महोल और प्रकृति के अनुरूप जीवन शैली का अनुसरण करता है। इसीलिए इसकी प्रकृति शाश्वत न होते हुए परिवर्तनशील है।

शासन का गुण- मनुष्य इस धरती पर अकेला ऐसा प्राणी है जो शासन और सत्ता युक्त समाज पर संचालित होता है। मनुष्य हमेशा अपने से कमजोर जीवों (पशु पक्षियों) पर शासन करता है और तो और मनुष्य अपने से कमजोर मनुष्य पर भी अपनी सत्ता बना कर रखता है। सिर्फ किस्सो कहानियों में हम सिंह को जंगल का राजा के रूप में देखते है परंतु ये केवल भाय होता है क्योंकि वो अन्य जानवरों का शिकार करता है। लेकिन प्रत्यक्ष रूप में एक सिंह जंगल के अन्य जीवों पर सत्ता स्थापित नहीं करता। लेकिन मनुष्य ही एक ऐसा जीव है जो अन्य जीवों और अन्य मनुष्य पर प्रत्यक्ष रूप में शासन स्थापित करता है।

आलस्य का दोष और आविष्कार का गुण- धरती पर बहुत से जीव ऐसे है जिन्हे हम आलसी जीवों के श्रेणी में रखते है। लेकिन मनुष्य में आलस्य की प्रकृति उसे और चिंतनशील बनती है जिससे वो नए निर्माण और आविष्कार करते है। मनुष्य में आलस्य एक ऐसी प्रकृति जो उसे श्रम न करने को प्रेरित करता है। अन्य जीवों में आलस्य उन जीवों की प्रकृति होती है। अन्य जीव आलसी के कारण अपने नैतिक कर्म करना नहीं छोडते अथवा अपने नैतिक कर्म हेतु किसी उक्ति का प्रयोग नहीं करते।

जबकि मनुष्य अपने दैनिक कृत्यों एवं कर्मो में श्रम से बचने के लिए आलस्य का गुलाम हो जाता है। तथा कर्मो को करने हेतु बगैर श्रम युक्ति कि खोज करता है। जिससे उसमे आविष्कार का गुण देखने को मिलता है। अतः कह सकते है कि मनुष्य में आलस्य के दोष के कारण आविष्कार का गुण उत्पन्न हुआ। बहुत सारे लोग जीवन रक्षक चिकित्सा के आविष्कारों को आलस्य की उपज नहीं मानेंगे। परंतु अप्रत्यक्ष रूप में देखा जाये तो मनुष्य को चिकित्सा के नवीन आविष्कारों की आवश्यकता भी आलस्य के कारण पड़ी।

प्रकृति के विपरीत जीवन शैली- संसार में सभी जीव केवल मानव को छोडकर प्रकृति के अनुरूप अपनी जीवन शैली को अपनाते है। जबकि मनुष्य की जीवन शैली हमेशा प्रकृति के विपरीत होती है। ये भी कह सकते है अन्य जीवों की तरह मनुष्य प्रकृति पर निर्भर तो है लेकिन उसके परिवर्तन चक्र के अनुसार उसका जीवन जीने की शैली निर्भर नहीं करती। उदाहरण के रूप में मनुष्य वस्त्र धारण करता है, मनुष्य भोजन को अपने अनुरूप पका कर ग्रहण करता है, वो प्रकृति द्वारा बदलते ऋतुओं के विपरीत संसाधनो का प्रयोग करता है। वर्तमान समय में तो मनुष्य का सम्पूर्ण जीवन प्रकृति के अनुरूप न होते हुए पूरी तरह से विपरीत होता है। जबकि अन्य जीव आज भी प्रकृति के अनुरूप जीवन निर्वाह करते है।

परिवर्तनशील जीवन- मनुष्य का जीवन परिवर्तन शील है। अगर मानव जीवन के इतिहास को हम ध्यान से देखे तो मानव का जीवन हमेशा परिवर्तन शील रहा है। जहा किसी जीव में परिवर्तन प्रकृति में परिवर्तन के कारण होता है। जैसे डार्विनवाद के अनुसार एक जिराफ की गर्दन लंबी प्रकृति में परिवर्तन के कारण हुई। लेकिन दूसरी तरफ मानव में कोई भी परिवर्तन प्रकृति के कारण नहीं हुआ। बल्कि मनुष्य द्वारा किए गए परिवर्तन के कारण प्रकृति के स्वरूप में परिवर्तन देखने को मिला है। जिसका उदाहरण आज हमें जलवायु और मौसम के परिवर्तन के रूप में देखने को मिल रहा है।

मनुष्य और अन्य जीव में भिन्नता की दार्शनिक और धार्मिक मान्यता- धर्म दर्शन की अवधारणा के अनुसार मनुष्य ही एक ऐसा जीव है जो आस्तिक और परमार्थ का जीवन जीते हुए इस संसार की मोह माया से मुक्त हो सकता है। तथा इस बंधन से अपनी आत्मा को मुक्त कर उस परम सत्ता को प्राप्त कर सकता है। संसार के किसी अन्य जीव में ऐसी शक्ति नहीं पायी जाती है बल्कि एक आत्मा अन्य सभी जीवों कि योनियों को जीते हुए अंत में मनुष्य का रूप धारण करता है तथा इसी रूप में वो इतना सामर्थ्य रखता है कि वो अपनी आत्मा को जन्म मरण के बंधन से मुक्त कर उस परमात्मा को प्राप्त कर सके।

निष्कर्ष

मानव जीवन अन्य जीवों से भिन्न होता है उपरोक्त तथ्यों से ये बात सिद्ध होती है। और ये भिन्नता हमारे लिए वरदान और अभिशाप दोनों रूप में देखि जा सकती है। जो गुण मनुष्य मे पाये जाते है उनमे से बहुत सारे गुण केवल मानव में ही पाये जाते है अन्य किसी भी जीव में नहीं। अगर इंसान इन गुणो का सदुपयोग करे तो मानव इस संसार के स्वरूप को और भी सुंदर और सुखमय बना सकते है। लेकिन मनुष्य सबसे बड़ा गुण विवेकशीलता अथवा तर्क की शक्ति ही मानव में लोभ, और स्वार्थ की भावना उत्पन्न होती है जो की उसके बुद्धि को विकास की ओर न ले जाकर विनाश की ओर ले जाती है।

!इति शुभम्!

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *