फाल्गुन, फगुआ, रंगभरी एकादशी: होली का आगाज और अंदाज

भारतीय संस्कृति में होली एक महत्वपूर्ण त्योहार के रूप में पहचाना जाता है। चाहे कोई भी धर्म संप्रदाय का व्यक्ति हो होली के त्योहार से हर कोई परिचित है। उपरोक्त शीर्षक यह बताने की कोसिस की जा रही है कि किस प्रकार होली के त्योहार का आगाज होता है। होली के त्योहार से संबन्धित बहुत ही लोक कहानियों हमारे समाज में प्रचलित है। और सबके अपने अपने उचित तर्क है कि किस प्रकार से होली के त्योहार का आगाज हुआ।। साधारण रूप से व्याख्या की जाये तो होली का त्योहार फाल्गुन मास के पुर्णिमा तिथि को होलिका दहन के द्वारा आयोजित किया जाता है। और अगले दिन धुलेंदी के रूप मे रंगो के साथ बहुत ही हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। तो आइये जानते है किस प्रकार होली के त्योहार का आगाज किया जाता है। और किस प्रकार प्रसिद्ध स्थानो पर होली का त्योहार आयोजित किया जाता है।

होली की ऐतिहासिकता

वैसे तो होली त्योहार के ऐतिहासिकता के संबंध में कई कहानियाँ उपलब्ध है कि किस प्रकार होली का त्योहार मनाने कि शुरुवात हुई। परंतु सबसे महत्वपूर्ण किस्सा इस प्रकार से है। हिरण्यकश्यप और हिरण्याक्ष नाम के दो असुर जिंका पृथ्वी प र बहुत आतंक रहता है। पृथ्वी पर जब भी पाप बढ़ जाता है तो पृथ्वी गौ का रूप धारण कर स्वयं भगवान हरि से अपने उद्धार हेतु प्रार्थना करती है। जिसके परिणाम स्वरूप स्वयं हरि सुकर का रूप धरण कर हरिण्याक्ष का वाढ कर पृथ्वी कि प्रार्थना को यथार्थ करते है। इस कारण से हिरण्यकश्यप प्रभु हरि को अपना शत्रु मानने लगता है। और अपने साम्राज्य में हरि वंदना की रोक लगा देता है।

लेकिन वहीं दूसरी तरफ स्वयं हिरण्यकश्यप का पुत्र प्रह्लाद हरि का परम भक्त होता है वह हर क्षण श्री हरि का ध्यान और वंदना करता रहता है। इस बात से हिरण्यकश्यप बहुत हो क्रुद्ध हो जाता है और अपनी बहन जिसका नाम होलिका रहता है उसके साथ प्रह्लाद को अग्नि चीता में जीवित भस्म करने का प्रयास करता है। चूंकि होलिका को वरदान प्राप्त रहता है की एक प्रकार का कवच उसे सभी प्रकार की अग्नि से उसका बचाव करेगा उसी वरदान के अभिमान में होलिका, प्रह्लाद को लेकर अग्नि चीता में बैठ जाती है। परंतु श्री हरि कि कृपा के उस अग्नि चीता में होलिका भस्म हो जाती है एवं परम भक्त प्रह्लाद का बाल भी बांका नहीं होता। इस चमत्कार से प्रसन्न हो वहाँ की जनता उस दिन को बड़े ही हर्षोल्लास से मानना शुरू कर देती है। और तभी से फाल्गुन पुर्णिमा के दिन होलिका दहन के उपरांत होली के त्योहार को मनाया जाता है।

फाल्गुन और फगुआ: उत्साह का मिश्रण

होली का त्योहार हिन्दू पंचांग के अंतिम मास फाल्गुन मास मे मनाया जाता है इसलिए पूरे माह होली के उत्साह भरे आयोजनों को फगुआ के रूप में भी जाना जाता है। एवं होली में गाये जाने वाले एक गायन शैली को फगुआ गायन के रूप में जाना जाता है। होली के लेकर भारतीय संस्कृति मेन इतनी विभिभता देखने को मिलती है जिसे एक लेख मेन समाहित नहीं किया जा सकता है। फिर भी कुछ प्रमुख फगुआ आयोजनों को हम जानने का प्रयास करेंगे।

1. बरसाने और वृन्दावन का फाग आयोजन

होली की बात आए ओर बरसाने एवं वृन्दावन की होली की बात न आए हो ही नहीं सकता। बरसाने की लट्ठ मार होली तो विश्व प्रसिद्ध है। दूर दूर देशो से लोग बरसाने की होली देखने के लिए आते है। बरसाने की होली बहुत ही अलग शैली में मनाई जाती है। इसमे पुरुष वर्ग एक ढाल रूपी वस्तु अपने सिर पर लेकर अपने पैरों के पंजे पर बैठ जाते है एवं महिला वर्ग उनपर लट्ठ से वार करती है साथ ही साथ फगुआ गाँ एवं रंगो की फुहार होती रहती है। वृन्दावन में सभी कृष्ण भक्त बहुत दूर दूर से सप्ताह भर चलने वाले इस रंगो के कार्यक्रम को देखने के लिए आते है।

2. काशी की रंगभरी एकादशी एवं ठेलुआ सम्मेलन

विभिन्न शैली में होली के आयोजन की बात करे तो बरसाने की होली के बाद द्वितीय प्रमुख स्थान काशी (बनारस) का आता है। यहाँ फाल्गुन मास कि एकादशी के दिन काशी विश्वनाथ बाबा के द्वारे रंगभरी एकादशी का आयोजन करने के साथ ही फाग महोत्सव की शुरुआत हो जाती है। रंगभरी एकादशी आयोजन के बाद समस्त काशी में एक अलग ही अंदाज में रंग उत्सव का आयोजन शुरू हो जाता है। इस उत्सव की शुरुआत ठंडाई निर्माण एवं छनाई (पीने) के उपरांत विभिन्न रंगारंग एवं फगुआ गाँ किया जाता है।

विभिन्न स्थानो पर मूलतः बनारस के अस्सी घाट पर ठेलुआ सम्मेलन का आयोजन होता है। जहा बड़े बड़े हास्य कवियों का सम्मेलन होता है। और विभिन्न रूप में वो हासी काव्य का पाठ करते है। इस ठेलुआ सम्मेलन का विवरण विस्तार से देना उचित नहीं होगा जब तक इसको खुद से अनुभव न किया जाये। इस प्रकार से काशी में होली या रंगोत्सव बड़े ही धूमधाम से मनाया जाता है।

3. देश के अन्य हिस्सों में होली अथवा फाग महोत्सव का आयोजन

देश में कोई भी ऐसा हिस्सा नहीं है जहां होली महोत्सव का आयोजन न होता हो सभी साथ मिलकर इस त्योहार को बड़े हर्षोल्लास के साथ मानते है। वैसे तो विभिन्न क्षेत्रों में होली के आयोजन पर उस क्षेत्र विशेष का प्रभाव अवश्य होता है। लेकिन होली का आयोजन मानक रूप में इस प्रकार से होता है जिसमे लोग होलिका दहन के दूसरे दिन रंगो के साथ खेलते है। एक दूसरे को अबीर गुलाल लगते है और संगीत इत्यादि के साथ होली के त्योहार को जीवंत बनाते है। और शाम को विभिन्न प्रकार नए नए कपड़े इत्यादि पहन कर एक दूसरे से गले मिलते है और लोगो में प्रेम एवं हर्ष का उत्सर्जन करते है। तथा इस त्योहार को और भी अधिक भव्य बनाने के लिए लोग एक दूसरे को गुजिया, नमकीन इत्यादि ग्रहण करने को प्रस्तुत करते है, जिसका निर्माण समस्त परिवार के सदस्य मिलजुल कर एक साथ घर पर ही करते हैं।

होली का महत्व और प्रासंगिकता

होली प्रेम और सद्भाव का त्योहार है। लगभग सभी समाज में होली जैसे त्योहार का आयोजन अवश्य होना चाहिए जिसका उद्द्येश्य लोगो के बीच गिले सिकवे मिटा कर उनके मध्य प्रेम और सद्भाव का संचरण करना है। होली में रंगो से खेलना इस चीज का द्योतक है, कि अगर कोई व्यक्ति किसी अन्य को लेकर अपने मन में किसी प्रकार का द्वेष या घृणा का भाव रखता है। तो उस द्वेष या घृणा के रंग को अन्य रंगो के द्वारा हटाया जा सके। और इसके बाद शाम के वक्त स्वच्छ जल से स्नान के बाद दिन भर कि गंदगी कि सफाई के साथ साथ अपने मन की भी सफाई कर ले और अच्छे कपड़े से मतलब एक नया रूप में अपने शत्रु, प्रतिद्वंदी को प्रेम एवं सद्भाव के साथ मित्र के रूप में ग्रहण करे।

उपरोक्त तथ्यों को पढ़ने के बाद मुझे नहीं लगता होली, फाग अथवा फगुआ के महोत्सव का महत्व सिद्ध करने की आवश्यकता है। बल्कि मै ये बोलूँगा कि जिन स्थानो पर होली महोत्सव का आयोजन नहीं होता उन स्थानो पर भी होली जैसे एक त्योहार का आयोजन अवश्य करना चाहिए।

!इति शुभम्!

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