हठ योग की रहस्यमयी दुनिया- योग दिवस 21 जून विशेष

yog diwas 21 june- Kissa Kahani

आज 21 जून के दिन हम लोग अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस के रूप मे मनाते है। संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा सात साल पहले आज के दिन योग दिवस मनाने का प्रचलन किया था। सभी लोग मानते है कि योग की शुरुआत और इसका उद्भव हमारे भारत देश मे ही हुआ है। महर्षि पतंजलि द्वारा दिया गया अष्टांग योग का सिद्धान्त ही इसका मूल सिद्धान्त है।

भले ही आज हम योग के केवल एक ही स्वरूप को जानते है, जिसमे केवल शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य को अच्छा बनाने के लिए प्रयोग करते है। जिसे हम योगा के नाम से जानते है। लेकिन हमारे प्राचीन ग्रन्थों और मनीषियों के कहे बचनों के अनुसार योग के कई स्वरूप होते है। जिनमे से एक सबसे प्रमुख और सबसे कठिन स्वरूप है हठ योग।

आज हम बात करेंगे इसी हठ योग की। हठ योग से तात्पर्य किसी प्रकार का कठिन व्रत का निर्णय लेना जो हमारे स्वाभाविक जीवन मे बहुत ही कठिन हो सामान्य शब्दों मे बोले तो प्राचीन तपस्या शब्द भी इसी से जुड़ा हुआ है। इसी हठ के योग के जरिये तपस्वी जन अपने इष्ट को प्रसन्न करने का काम करते थे।

आज भी हमे हठ योगी देखने को मिल जाते है। अगर हमे इन्हे देखना है तो कुम्भ मेले मे भी बहुत सारे हठ योगी कुम्भ स्नान के लिए आते है। जिनहे कुछ लोग नागा साधू तो कुछ लोग तपस्वी साधु के रूप मे जानते है।

जब कभी यदि आप का इनसे साक्षात्कार होगा तो आप इनके सम्पूर्ण मुख मण्डल पर एक लालिमा और चमक पाएंगे। इनके स्वरूप मे एक प्रकाश देखने को भी मिल जाएगा। इन्हे इनके हठ योग के व्रत के नाम से भी जाना जाता है। जैसे खड़ेश्वरी साधु जो कई वर्षों से अपना जीवन खड़े खड़े ही व्यतीत करते है। या फिर मौनी बाबा जो कि जबान होते हुए भी कुछ भी नहीं बोलते है। इसके अलावा भी बहुत सारे हठ योगी होते है जिनमे से कोई एक हाथ कई वर्षों से उठा कर रखे होते है वहीं कुछ करपात्री होते है जो अपने हथेली मे भोजन ग्रहण करते है तथा हथे ली मे एक जितना ही भोजन एक बार मे ग्रहण करते है।

हठ योग बहुत ही कठिन तप है। इसकी साधना के लिए बहुत ही संयम और नियम की आबश्यकता होती है। आज जिस योगा का हम अनुशरण करते है उसी का एक उन्नत और कठिन स्वरूप है हठ योग।

योग के कई स्वरूप है जिनमे शारीरिक मानसिक आध्यात्मिक भक्ति योग कई रूप देखने को मिलते है और योग का जो मूल उद्द्येश्य है उसके अनुसार हमारी आत्मा का उस परम सत्ता से साक्षात्कार कार करना होता है। यानि की मार्ग कई है लेकिन सबका अंतिम पड़ाव एक ही है।

अब बात करते है आज के समय मे योग के किस स्वरूप को अपनाना ज्यादा उचित होगा तो स्वामी विवेकानंद जी ने भी योग के तीन प्रमुख स्वरूपों के बारे मे बताया है जिसमे आप ज्ञान योग भक्ति योग और कर्म योग की व्याख्या की है।

गीता मे भी कर्म योग को सबसे प्रमुख बताया गया है हम सभी को समाज के द्वारा बनाए गए नियम विधि का पालन करते हुए अपने कर्म का अनुशरण करना चाहिए। साथ ही जीवन मे नैतिकता, सदाचार इत्यादि का पालन करना चाहिए।

भक्ति योग जिसे सबसे सरलतम और सफल योग मार्ग बताया गया है। जिसमे हमे अपने इष्ट और आराध्य की भकी करते हुए अपने जीवन के कर्मों का निर्वहन करना है।

हठ योग का स्वरूप केवल अपने तन को कष्ट देने मात्र से भी नहीं है बल्कि अपनी इंद्रियों पर काबू करना उनके इधर उधर भटकने पर नियंत्रण रखना भी एक प्रकार का हठ योग है। अपने खान पान अपने आवश्यकताओं पर नियंत्रण ही आज के समय मे हठ योग है।

हठ योग को इंद्रिय नियंत्रण के रूप मे हम सभी को अपने जीवन मे अपनाने की आवश्यकता है। और इन्ही नियंत्रण को मूल योग दर्शन मे 8 नियम के रूप मे बताया गया है जो कि यम नियन आसान प्राणायाम प्रत्याहार ध्यान धारणा समाधि के रूप मे जाना जाता है।

हठ योग हमे मानसिक और शारीरिक दोनों ही रूप से संयमित करता है और एक संयमित मानव का जीवन ही सबसे सफल जीवन की परिभाषा है। संयम ही योग का मूल उद्द्येश्य है। मन और शरीर पर संयम करके हम उस परम सत्ता के साक्षात्कार कर सकते है।

निष्कर्ष-

योग का मूल शाब्दिक अर्ध जुड़ाव से है। उस परम सत्ता से जुड़ाव जिसने इस समस्त सृष्टि की रचना की जो हम सभी का आदि स्वरूप है और हमारे जीवन का लक्ष्य उस तक पहुँचने का है। इसीलिए इस योग दर्शन के कई चरणों मे इसका आरंभ शारीरिक स्वास्थ्य और संयम से होते हुए मानसिक स्वास्थ्य और संयम के जरिये आत्म के परमात्मा मे विलीन होने तक है। जहां हमे परम शांति की प्राप्ति हो सकती।

महात्मा बुद्ध के द्वारा बताए गए दुख और दुख समुदाय के सिद्धान्त मे भी इस योग के जरिये हम परिनिर्वाण को प्राप्त कर सकते है और परम शांति को प्राप्त कर सकते है।

तो इस योग दिवस पर आप सभी को सुभ कामनाएँ आप सभी स्वस्थ रहे शारीरिक मानसिक और आध्यात्मिक रूप से और जीवन मे आगे बढ़ते रहे साथ ही एक 21 जून ही नहीं वर्ष के सभी दिनों की शुरुआत योग दिवस के रूप मे ही करें।

!!इति शुभम्य!!

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